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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

४३८ झाँसी की रानी

बहुत नहीं गई है। घण्टे आध घण्टे के लिये यह दरबार रसीला रंगीला हो जाय । बुला लाओ ।' तात्या ने माथे का पसीना पोछा । बोला, 'जो आज्ञा, परन्तु रानी साहब—' नवाब -- 'क्यो किन्तु परन्तु क्या ?' रावसाहब—'रानी साहब पूजा मे होगी। बुला भी लाओ ।' तात्या गया । उस मडली का सरूर और बढा । तात्या ने जूही को एकान्त में बुलाया । जूही बहुत प्रसन्न थी । जूही—'सरदार साहब, आपने क्यो कष्ट किया ?' तात्या—'एक बात कहने आया हू ।' जूही--'मै उस बात को सुनने के लिये बरसो से तरस रही हूँ।' तात्या--'एक प्रार्थना करने के लिये आया हूँ।' जूही—'मेरे सरदार मुझमे प्रार्थना करे ! जिस एक शब्द के सुनने के लिये बरसो तपस्या की, अपने तन और मन की रक्षा की, उस एक शब्द के सुनने के लिये, आपकी जूही के भाग्य का आज उदय हुआ, परन्तु--' तात्या—'परन्तु क्या जूही ?' जूही--'परन्तु सरदार साहब, मेरी रानी का स्वराज्य सग्राम पहले सफल हो और मे आपकी जन्म सगिनी बनकर रहूँ । बहुत दिनो से इस बात को कहने के लिये संकल्प पर सकल्प किये, परन्तु आज लाज सकोच त्याग कर कह पा रही हूँ। आपने अवसर देने की कृपा की।' पेशवा के प्रधान सेनापति का सिर नीचा पड़ गया। कुछ क्षण में हिम्मत बाँध कर बोला, मेरी प्रार्थना यह है। मेरी प्रार्थना--' जूही ने टोककर कहा, 'आपके मुँह से प्रार्थना का शब्द नही सुहाता । आज्ञा हो, आपकी जूही का सिर चरणो में पहुँचेगा, परन्तु जिस शर्त का निवेदन कर चुकी हू, वह अटल है।'

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तात्या का दिल धडका । उसने धडकन दबाई । मुट्ठी बाधी और हिम्मत को कडा किया । तात्या—'अभी तो केवल यह प्रार्थना है कि आप रावसाहब के शिविर में चले, वहा बादा के नवाब साहब, मदनपूर और बानपूर के राजा साहब बैठे हुये हैं । आपके नृत्यगान का रसास्वादन करना चाहते हैं ।' जूही—'ओह, यह बात ! यह प्रार्थना ! सरदार साहब, मैं आपको मन ही मन अपना हृदय भेट कर चुकी हूँ, परन्तु आपको इतना स्मरण रहे कि मैं झासी की रानी की सिपाही हूँ और किसी राजा या नवाब से अपने को कम नही समझती । ये लोग समझते होगे कि मै वेश्या पुत्री हू । परन्तु वेश्या नही हू, और न नाचने गाने का पेशा करती हू । मेरा प्रस्ताव उस मण्डली में किसने किया, सरदार साहब ? और आपके मुँह से यह प्रस्ताव निकला कैसे ?' तात्या—'मैने नही किया जूही । आप मेरा विश्वास करो । मै राव- साहब की आज्ञा को देवता की आज्ञा के समान समझता हू । उन्ही के कहने से आपके पास आने का साहस किया ।' जूही—'आप आप कहकर मेरा अपमान मत कीजिये । मै आपके लिये तुम हूँ । उन लोगो से कह दीजिये कि मैं उनके लिये उस रानी की कर्नल हूँ, जो जनरल रोज के परदादो को कब्र में हिला डालने की हिम्मत और तरक़ीब रखती है ।' तात्या चला गया । जब तक वह पेशवा के सामने पहुचा तब तक भङ्ग ने अपना गहरा रङ्ग चढा दिया था । वे लोग अपनी धुन को इस बीच में भूल गये थे और किसी दूसरी धुन को पकड लिया था । इसलिये तात्या को बात बनाने की ज़रूरत नही पडी । जूही रानी के शिविर में लौट आई । रानी गीता के परायण से उसी समय फारिग हुई थी । रानी ने साधारण प्रश्न किया, 'कहा हो आई जूही ?'

४४० झांसो की रानी जूही ने भर्राये हुये स्वर में उसास लेकर उत्तर दिया, 'सरदार साहब आये थे।' रानी—'कौन सरदार साहब ? यहा तो मुझको सब सरदार ही दिखते हैं। ससार की किसी भी सेना की ऐसी अस्त-व्यस्त स्थिति न होगी जो मुझको इस सेना की दिखलाई पड रही है।' कोई भी एक ऐसा नही जिसकी सब कोई माने।' जूही—'सरदार तात्या साहब आये थे।' रानी—'क्या कहते थे ?' जूही—'कहते थे कि श्रीमन्त रावसाहब पेशवा नृत्यगान के लिये बुला रहे हैं। महफिल बादा, बानपूर और शाहगढ के रईसो की है।' रानी—'हाँ ! यह मौज ! तूने क्या उत्तर दिया ?' जूही—'मैने कह दिया सरदार कि मै रानी साहब की कर्नल हूँ, नाचने गाने वाली नही।' रानी—'जूही तूने अपने योग्य ही उत्तर दिया। दो एक दिन में ही कोच में लडाई होने वाली है। और इन लोगों का यह हाल है ! जी चाहता है कि इसी समय इनको कुछ खरी खोटी सुनाऊँ, परन्तु अवसर उपयुक्त नही है। किसी समय कहना अवश्य पडेगा। और कुछ•••दण्ड•••

लक्ष्मीबाई ४४१ [ ८१ ] दूसरे दिन समाचार मिला कि लुहारी के किले का पतन हो गया और रोज कोच के ग्रसने के लिये आ रहा है । पेशवा इत्यादि की सेना को अपने अग्रभाग का सुदृढ और सुसगठित प्रबन्ध करके लड़ने का अभ्यास सा पड गया था। रोज जानता था कि इनकी सेना का पृष्ठ भाग उतना व्यवस्थित नही रहता । इसलिये उसने विरोधी सेना पर आक्रमण करने के लिये अपनी सेना के तीन भाग किये । दो को कोच की सेना के पीछे दायें वायें भेज दिया और एक को सामने ले चला । पेशवा की सेना को उसके केवल सामने वाले दस्ते का पता लगा और उसी से तात्या को भिडा दिया । लक्ष्मीबाई को पीछे की ओर रक्खा । दोनो ओर से बिकट युद्ध हुआ । बँधे इशारे पर रोज के पीछे वाले दस्तो ने धावा किया और उनकी तोपो के प्रहार से कोच की सेना बुरी मार खाकर भागी। तात्या और लक्ष्मीबाई ने अपने कौशल से उसको रोज के व्यूह से बचा निकाला । रोज ने कोच को ले लिया । आठ तोपें हाथ आईं और बहुत सी युद्ध सामग्री । रोज को बहुत आश्चर्य इस वात पर था कि सबके सब सरदार और वाकी सेना तथा सामान किस हिकमत से और कौन निकाल ले गया । उसका सन्देह वार वार झाँसी की रानी और तात्या टोपे पर जाता था । तात्या कोच से निकल कर कालपी नही गया ।, वह अपने पिता के पास चला आया । उसने उस समय, पेशवा की भी कदाचित् केवल उस समय, अनसुनी करदी । पेशवा ने अपनी सेना के साथ कालपी में आकर दम लिया । शायद उस रात भङ्ग नहीं छनी । दूसरे दिन पेशवा ने आगे की योजना बनाने के लिये सरदारो का दरवार किया । रानी भी दरवार में थी ।

४४२ झाँसी की रानी . रावसाहब ने कोच की हार का किसी पर भी दोषारोपण नही किया और बचकर निकल आने के चातुर्य पर प्रशंसा बरसाई। इसके उपरान्त आगे की योजना की बात छिड़ी। रानी अपने आसन से उठी। कमर से तलवार निकाल कर पेशवा के सामने मूठ की ओर से रखदी और आसन पर बैठ कर बोली, 'आप के पूर्वजो ने यह तलवार हम लोगो को दी थी। भगवान की दया से मेरे पूर्वजो ने और मैने भी इसका उचित उपयोग किया। परन्तु अब आप की कृपा से यह तलवार वञ्चित हो गई है इसलिये इसे वापिस लीजिये।' दरबार में उपस्थित सब सरदार स्तम्भित रह गये। रावसाहब ने कहा, 'आपके पुरखो ने और आपने स्वराज्य की स्थापना के लिये जो कुछ किया है वह चिरस्मरणीय है। आपने झाँसी में अङ्गरेज़ो का जैसा करारा मुकाबला किया वह अवर्णनीय है। कोच से हमारी सेना और युद्ध सामग्री को बचाकर ले आने मे आपका बहुत बडा हिस्सा है। आप सरीखा निपुण सेनापति शायद ही कोई हो। आप जो, योजना बतलावे हम लोग शिरोधार्य करेगे। आप इन सब रणशूर रईसो को अपना सहयोग देने की कृपा कीजिये और अपने स्वराज्य के प्रण का स्मरण करिये।' रानी बोली, 'कोच की लडाई में आपका प्रबन्ध बहुत रद्दी था। सेना में कोई व्यवस्था नही है। अङ्गरेजी सेना अपनी अच्छी व्यवस्था के कारण ही विजय प्राप्त करती है। •हमारे सैनिक शूरवीरी और पराक्रम में अङ्गरेजो से बडे चढे हैं, परन्तु व्यवस्था और दूरदर्शी योजना की कमी के कारण उनका शौर्य विफल हो जाता है। झासी की सहायता के लिये आपकी इतनी बड़ी सेना आई, परन्तु अव्यवस्था के कारण हार खाकर, लौट गई। जब तक आप अपनी सेना का अच्छा प्रबन्ध नही करेंगे और संयम से काम न लेंगे, युद्ध में यश प्राप्त न होगा। अव्यवस्था का कारण है एक व्यक्ति को मुख्याधिकारी न मानना और अपनी अपनी मनचाही योजना को काम में लाना तथा समय को व्यर्थ बातो में नष्ट करना।'

लक्ष्मीबाई ४४३ रावसाहब तलवार को लेकर उठा । रानी के सामने विनम्र भाव से खडा हुआ । 'आप कृपापूर्वक तलवार ग्रहण करे,' रावसाहब ने कहा, 'आपकी सम्मति बिलकुल उचित है और मानी जायगी ।' रानी ने तलवार ले ली और म्यान मे डाल ली । उपस्थित सरदारो ने रावसाहब को प्रधान सेनापति नियुक्त किया । उसने स्वीकृत कर लिया । सरदारो ने रानी को प्रधान सेनापति न बना- कर इतिहास में अपनी पराजय पेशगी लिख दी । परन्तु योजना बनाने के लिये रानी से अनुरोध किया । रानी ने योजना बतलाई । उसके अनु- सार मोर्चे बनाये गये । तोपें रक्खी गईं । गोलन्दाज नियुक्त और सरदार विभक्त किये गये । रानी को लालकुर्ती वाले ढाई सौ सवार दिये गये और वाम पार्श्व की रक्षा का भार ।

४४४ झांसी की रानी [ ८२ ] रानी ने निर्देशन किया था : 'जो सरदार जिस मोर्चे को बांधे हो वही डटकर लड़े, किसी प्रलोभन या उत्तेजन में आकर ,अपने स्थान को छोड़कर अङ्गरेजी सेना के ऊपर न झपटे। जब रिसाले या पैदल पल्टन को आदेश हो तभी वह बतलाई हुई दिशा में हमला करे।' रावसाहब ने समर्थन करते हुये कहा था, 'ऐसा ही होगा; ऐसा ही हो। सब लोग गांठ बांध लेना।' रावसाहब सहज सन्तोषी और परम महत्वाकांक्षी था। यदि नाना साहब लखनऊ के जय-पराजय के क्रमावर्त में न फँसा होता और कालपी में होता तो वह, लक्ष्मीबाई और तात्या, रोज़ सरीखे अत्यन्त योग्य और रणकुशल सेनापति के लिये भी काफी से अधिक प्रबल बैठते। परन्तु रावसाहब की लोकप्रियता, उसकी उदारता, शिथिलता और सहजवर्ती स्वभाव के कारण थी, न कि योग्यता के कारण। वह प्रधान सेनापति की आज्ञाओं का विधिवत पालन करा ही नही सकता था। इस कार्य के लिये तो रानी का सा तेजस्वी और तपस्वी व्यक्तित्व ही ठीक बैठ सकता था। रोज़ को इस मोर्चाबन्दी का पता आसानी से लग गया। उसने अवगत कर लिया कि जहा मोर्चादारो से उनका ठिया छुटवाया कि गडबड़ फैल जायगी। कोच की मार और रानी की भर्त्सना के कारण पेशवाई सेना अंग्रेज़ो को मार मिटाने के लिये दास पीस रही थी, अपनी वासना को सहायता पहुँचाने के लिये सेना ने भग भी खूब पी। रानी का निषेध न चला। रोज का एक छोटा सा दस्ता हल्का तोपखाना लिये आगे आया। कालपी की सेना ने समझा कि रोज़ की सम्पूर्ण सेना आ गई। ठिया छोड़ छोड़कर उस पर दौड़ पड़े। गोलाबारी हुई। असमय मार काट शुरू हो गई। रानी ने मना करवाया, परन्तु राव नियन्त्रण न कर सका। रोज ने मौका ताककर इर्द गिर्द वाले अपने दस्तो द्वारा गोलाबारी शुरू कर दी और कालपी की सेना का ठिये छोड़ देने के कारण अविलम्ब सर्वनाश

लक्ष्मीबाई ४४५

होने लगा रईस सेनापतियो ने भागने का विचार किया । रानी ने डाटना- फटकारना व्यर्थ समझकर उनको धैर्य धराया, कहा, 'अब जहा हो वही बने रहो, भगदड मत मचायो मै इनके तोपखानो को बन्द करती हू । जिस समय तोपखाने बन्द हो जाये, दो पार्श्वो से घुडसवार और बीच में पैदल बन्दूकची भेजना ।' रानी को केवल ढाईसौ सवार दिये गये थे । ये सवार अपने नेता को पहिचान गये थे और उन लोगो की उनके प्रति अपार भक्ति थी । रानी ने इन लोगो के पाच भाग किये और एक एक को देशमुख, गुलमुहम्मद, रघुनाथसिंह, जूही और अपने अधीन रखा । मुन्दर उनके साथ उनकी नायवी में रही । रानी ने यमुना के एक टीले की ओट से दूरबीन लगाकर रण क्षेत्र का निरीक्षण, कुछ क्षण किया । वे रोज के कमजोर बाजू को ताड गई । रानी ने अपने पाचो दस्तो को रोज के 'दाहिनी पार्श्व की ओर कुछ दूर जाकर घुमाया, और फिर टूट पडी । जैसे चिडियो के ऊपर बाज ? यह आक्रमण अग्रेजो को तूफान की तरह लगा और वे एक दम पीछे हटे । अंग्रेज अफसर और सिपाही कट कट कर गिरने लगे । रानी ने ऐसे शौर्य, ऐसे विवेक और ऐसे कौशल के साथ युद्ध किया कि अग्रेजो का तोपखाना थोडी देर के लिये बिलकुल बन्द हो गया । गोलन्दाज उस तूफानी हमले से स्तब्ध रह गये । रानी तोप के मुहानी पर बीस फीट के फासले तक मारती काटती पहुच गयी ।। अब कान्पी की सेना आगे बढी। परन्तु सैनिक इतनी भग पिये हुये थे कि आज्ञाओ का ठीक ठीक पालन ही नही कर सकते थे । केवल रानी का एक अद्भुत पराक्रम इन सैनिको के नशे को और उनके सरदारो की मूर्खता को ढक रहा था—] रानी ने अपने घोडे की लगाम मुह में दाबी और दोनो हाथो से तलवारो के वज्रपात करने लगी । पेशवा—सेना बहादुरी के साथ लडने लगी । जो अंग्रेज गोलन्दाज रानी और उनके दस्तो द्वारा काटने से बचे, वे मैदान छोड़कर भागे । ब्रिगेडियर स्टुअर्ट ने देखा कि बाजी खिसकी ।

४४६ झाँसी की रानी तुरन्त वह हलके तोपखाने लिये पीछे से आगे आया। गोलाबारी की भागते हुये गोलन्दाजो को उत्साहित किया। रोज एक जगह ऊँट-तोपखाना लिये डटा था। अपनी सेना की भगदढ का समाचार पाते ही वह इस तोपखाने को लेकर दौडा आया और छोटे गोलो की बौछार पर बौछार की। कालपी की सेना तितर-बितर होने लगी अपने दस्ते को लेकर रानी ने रोज के निरोध का प्रयत्न किया, परन्तु भगेड़ी सिपाहियो को भंग ने भागने की सुझाई। उनके पैर उखड़ गये। विवश होकर, रानी को अपने दस्ते रणभूमि से हटाने पडे। अपेक्षाकृत उनके सैनिक कम हताहत हुये। जो बचे उनको लेकर रानी पेशवा की छावनी में लौट आईं। दो दिन और मारकाट हुई, परन्तु उसको लड़ाई नही कह सकते। पेशवा की सेना के काफी सिपाही अन्तिम विजय से निराश होकर अपने अपने गाँवो को भाग गये। दो दिन पेशवा ने लष्टम-पष्टम गोलाबारी अंग्रेजो से बदली। इस सेना में अधिकतर लुटेरे और बदमाश रह गये थे। जैसे ही उन्होने देखा कि पेशवा हारे, कालपी की लूट शुरू कर दी और शकर की दूकानो की पहले घात लगाई। पेशवा ने कालपी छोडी। थोडी सी सेना उनके साथ लग गई। रानी अपने पाँच दलपतियो तथा अपनी बची बचाई छोटी लालकुर्ती सेना सहित निकल गईं। यह हारा थका दल गोपालपुर में, जो ग्वालियर के नैऋत्य में ४६ मील की दूरी पर था, जा टिका। कोच की पराजय के उपरान्त तात्या अपने पिता के पास जालौन चला आया था। कालपी के पराभव का वृत्तान्त सुनकर उसको ग्लानि हुई और वह पेशवा के पास गोपालपुरा पहुँच गया। बादा का नवाब भी इधर-उधर भटकता हुआ गोपालपुरा आ गया। राजा मर्दनसिंह और राजा बखतवली इसके उपरान्त लड़ाई के नक्शे में फिर नही आते। कुछ समय बाद राजा

लक्ष्मीबाई ४४७ बखतवली को अङ्गरेज़ो ने कैद करके लाहौर भेज दिया । मर्दनसिंह भी कैद हो गया । रोज़ को कालपी में पेशवा की बहुत बहुमूल्य युद्ध सामग्री मिली । पन्द्रह तोपे, सातसौ मन बारूद, असंख्य बन्दूक और तलवारें और नये तर्ज़ के हथियार ढालने-बनाने की विलायती मशीने हाथ लगी । रोज़ को यह विजय चौबीस मई के दिन मिली । यही दिवस विक्टोरिया के जन्म का था । इसलिये अङ्गरेज़ो ने धूमधाम के साथ कालपी पर अपना झण्डा चढ़ाया और कतल तथा लूट से पाई हुई शकर के प्रमाद से जश्न मनाये । और तीन दिन कालपी को मुस्तैदी के साथ लूटा । जनरल रोज़ ने नर्मदा के उत्तर भाग को कालपी तक अपने अधीन कर लिया । नर्मदा के उत्तरपूर्वीय भाग को दबाता हुआ करवी, महोबा, वादा इत्यादि को लूटता-कुचलता विटलाक रोज़ से कालपी में आ मिला । राजपूताने की ओर से कर्नल स्मिथ अपनी सेना लिये हुये आगरा, ग्वालियर की दिशा में आ रहा था । 'बलवाइयो' के पकड़े जाने के लिये गाव गाव में इनामी इसतहार बांटे जा रहे थे । रावसाहब के पास रईस और सरदार काफी थे, परन्तु सेना बहुत कम थी । तोपें नही थी, सामान नही बचा था । और व्यवस्था तो कभी भी न थी । दिन भर लू चली । रात को भी काफी गरम हवा चल रही थी तारे धूल की पतली चादर से ढके हुये थे । गोपालपुरा के एक बगीचे में रावसाहब, तात्या, वादा के नवाव इत्यादि आगे की योजना के आकार- प्रकार बना-विगाड रहे थे । रात अन्धेरी थी । पास में कोई उजाला न था । इसलिये किसके चेहरे पर क्या गुज़र रही थी, कोई नही देख सकता था । रानी लक्ष्मीबाई अपने शिविर में थी । उस दरबार में न थी । रावसाहब ने कहा, 'किसी प्रकार नागपूर की ओर पहुच पावें तो शीघ्र सैन्य संग्रह हो । इन्दौर की छावनी से भी सहायता मिले ।'

४४८ झाँसी की रानी बांदा के नवाब ने अपनी घबराहट प्रकट की, 'हैदराबाद के निज़ाम के मारे नागपूर के पड़ौस में ठहर पाना दूभर हो जायगा।' तात्या बोला, 'निज़ाम का कोई भय नही। वहा की जनता तुरन्त हमारा साथ देगी।' रावसाहब—'वहा से महाराष्ट्र सरक जाने मे बड़ा सुभीता रहेगा। पहाडियां, किले, घाटियाँ और नदिया बारगी और भूबँधी-दोनो प्रकार की लड़ाइयो के लिये बहुत उपयोगी हैं।' नवाब—'परन्तु वहा तक पहुचेगे कैसे?' तात्या—'पहुँचाने का जिम्मा मै लेता हू।' नवाब—'जासूसो से जो खबरे मिली हैं, उनसे हर हालत मे इस नतीजे पर पहुँचने के लिये विवश हूँ कि हम लोग विजडे में फँस गये हैं।' रावसाहब—'अवध की तरफ चलना ज़्यादा अच्छा होगा। अवध पास है। मार्ग सीधा है। वहा की जनता अदम्य है। लखनऊ का पतन हो गया तो क्या हुआ। नाना साहब अभी वहा हैं। बेगम साहब भी हैं। तात्या—'अवध में हम लोग बहुत काम कर सकते है। एक बाधा अवश्य है।' रावसाहब—'वह क्या?' तात्या—'उस प्रदेश में किले बहुत कम हैं।' नवाब—'एक बडी बाधा और है। अङ्गरेज़ो की बेशुमार पलटने अवध मे फैल गई हैं, और ज्यादा कलकत्ते से आ रही हैं।' एक सरदार—'मेरी समझ में तो यह आता है कि छोटी छोटी टुकडियो में बट कर, इधर उधर फैल जाओ और अङ्गरेजी इलाके की लूटमार शुरू करदो।' दूसरा सरदार—'और नये नये लोगो को इन टुकड़ियो में भर्ती करते जाओ। एक दिन काफी बडी सेना बिना परेशानी के अपने पास हो जावेगी तब हम लोग अङ्गरेज़ो को चित कर देगे।' तात्या—'इसमें कितने दिन लगेगे?'

रावसाहब—'समय की चिन्ता क्या है ? अंग्रेजी सेना में फिर कोई बलवा होगा। तोपें हाथ आ जायेगी और काम बन जायगा।' नवाब—'लेकिन तोपे अब हिन्दुस्थानी फौज के हाथ में कभी नही आवेगी। तोपखानो को अँग्रेज़ अपने हाथ में रखने लगे हैं।' एक सरदार—'परन्तु जनता के पास तो हथियार हैं।' नवाब—'जब तक आप फौज इकट्ठी करेगे तब तक अँग्रेज़ लोग सारी जनता के हथियार अपने मालखाने में रखवा लेंगे।' रावसाहब—'कही कालपी फिर वापिस मिल जाय तो सब दिक्कतें दूर हो जायें।' नवाब—'हम तो चाहते हैं कि दिल्ली और लखनऊ भी हाथ में आ जायें, मगर चाहने से होता क्या है ?' सरदार—'मेरा कहना मानिये। टुकडियो में बटकर लूटमार शुरू कर दीजिये।' तात्या—'जनता साथ न देगी।' रावसाहब—'तुम अवध के लडाको को भर्ती करके यहा ले आओ।' तात्या—'जो आज्ञा।' नवाब—'लेकिन इसमें तो वक्त लगेगा, और, तब तक हम आप क्या करेगे ?' रावसाहब—'तो फिर राजा बखतबल्ली और राजा मर्दनसिंह को बुन्देलखण्डी सेना सहित फिर बुलवाओ।' नवाब—'उनको हमारा साथ देना होता तो गोपालपुरा में आज कभी के आ जाते।' रावसाहब—'तब फिर क्या किया जाय ?' सरदार—'राजपूताने की तरफ चलिये। वहा की छावनियो ने अभी तक कुछ नही किया है।' तात्या—'वहा की छावनिया बहुत करके अपना साथ देगी।'

४५० ,झाँसी की रानी रावसाहब—'मेरा मन दक्षिण भारत के लिये बहुत बोलता है।' नवाब—'परन्तु वहां तक पहुँचे कैसे ?' तात्या—'मैं पहले ही निवेदन कर चुका हूँ कि पहुंचा मैं दूँगा।' नवाब—'मै भी जरा पहले अर्ज कर चुका हूँ कि झांसी, सागर, सीहोर वगैरह मे बहुत सी अग्रेजी फौज है और हम यहाँ पिंजड़े मे फँस गये हैं।' सरदार—'तब फिर अग्रैजो के हाथ अपने को सौंप दिया जाय ?' नवाब—'वह तो मैने हरगिज नही कहा।' रावसाहब—'तब फिर किसी अग्रेजी छावनी पर एकदम टूट पड़े' और उसको चीरते हुये आगे बढकर भाग्य की परीक्षा करे। नवाब—'परन्तु बिना बडी तोपो की मदद के छावनी के ऊपर हमला करना मौत के मुँह में जाना है।' रावसाहब—'यदि तात्या महाराष्ट्र में जाकर जनता को जाग्रत करदे तो अग्रेज़ वहा उलझ जायँगे और तब हम सरपट महाराष्ट्र में. 'पहुँच सकते हैं।' नवाब—'लेकिन फिर वही सवाल उठता है कि तब तक हम लोग यहा क्या करे ?' तात्या—'रानी साहब की राय ली जाय।' रावसाहब—'मै रानी साहब की राय की बहुत कदर करता हू। वे बहुत अच्छी सैनिक हैं और लडाई के मैदान में विजय भी प्राप्त करा सकती हैं, परन्तु स्त्री हैं और जितना ससार हम लोगो ने नापा है उतना उन्होने नही।' नवाब—'इस पर भी उन्होने दस महीने खूबी के साथ झाँसी का राज्य किया। ऐसा कि प्रजा उन पर कुरवान हो गई।' रावसाहव—'यह सब ठीक है, बिलकुल ठीक है। सलाह लेने में कोई हर्ज नही। मानना न मानना अपने हाथ में है।' तात्या—'उनको सबेरे लिवा लाऊँ ?'

लक्ष्मीबाई ४५१ सरदार—'सवेरे ज़रा वाद । सवेरा होने में बहुत देर भी नही है । वे अपने भजन-पूजन से निवृत्त हो जायेंगी, तब तक , अपुन लोग ज़रा नशा-पत्ता करेंगे । कई दिन से नही छनी है । कही से कोई अच्छी सलाह न मिली तो विजया भवानी सिर पर चढकर सब कुछ बोल-बता देगी ।' रायसाहब—'बड़ा अच्छा है । अभी अंग्रेज हम लोगो से काफी दूर हैं । हवा पर बैठकर तो आये नही जाते । परतु भाई गहरी न छने । नही तो रानीसाहब कुछ ज्यादा डाट-फटकार करेगी ।' इस तरह रात भर यह विवाद जारी रहा, परन्तु ये लोग किसी भी निश्चय पर न पहुँच सके । प्रत काल के उपरान्त तात्या रानी को लिवा लाया । तात्या ने उनको रात के अधिवेशन का संक्षेप में वृतान्त सुना दिया था । लोग भग पीकर निवृत हो गये थे, हुक्के गुडगुडा रहे थे कि वे आ गई । लोग उनका अदब करते थे, इसलिये हुक्के हटा दिये गये । पेशवाई सेना की आधोगति का उनको पता था । तो भी उन्होने अपने क्षोभ को दबाकर परिस्थिति को भली भाति समझने के लिये प्रश्न किये जो उत्तर मिले उनका निचोड वही था जो रात की बैठक में वादा के नवाब ने बतलाया था—'हम लोग पिंजडे मे फंस गये हैं ।' रानी ने कहा, 'अव तक हम लोग जहा जहा अंग्रेजों से जम कर लड पाये, वहा वहा किलो का आश्रय लेकर । फिर किसी मजबूत किले को हाथ में करना चाहिये । तोपे सहज ही ढल जायगी । काम चालू हो जायगा ।' रावसाहब—'परन्तु झाँसी और कालपी के किले तो फिर नही मिल सकते-कम से कम अभी हाल हाथ नही आसकते ।' रानी—'इनको कुछ दिनो विचार से अलग रखिये । तात्या—नरवर का किला बहुत अच्छा है । निकट सिन्ध नदी है । आसपास पहाड जगल है ।

४५२ झांसी की रानी

नवाब--'करेरा का भी किला अच्छा है।' रानी--'न।' रावसाहब--'तब फिर कौनसा किला?' रानी—'ग्वालियर का। वही यहा से अत्यन्त निकट है।' रावसाहब—'ग्वालियर का किला !' नवाब--'ग्वालियर का !' रानी—'हां ग्वालियर का। ग्वालियर की वस्तुस्थिति का पुनः अनुसन्धान करके तुरन्त ग्वालियर पर आक्रमण कर देना चाहिये। राजा और वहां के दो तीन सरदार अँग्रेज कम्पनी के पक्षपाती हैं। परन्तु सेना और जनता नही है। सेना यदि हमारा पक्ष प्रबलता के साथ न भी पकड़ेगी तो ढुलमुल अवश्य रहेगी। ग्वालियर में बनी बनाई सजी सजाईं, बढ़िया तोपें, गोले, गोली, सैकड़ो मन बारूद और अन्य प्रकार की युद्ध सामग्री तथा अटूट कोष है।' नवाब—'लेकिन...' रावसाहब—'हां, परन्तु ..' रानी—'किन्तु, परन्तु, कुछ नही । बिना किले के कोई भी प्रयास आत्मवध के समान होगा, और सिवाय ग्वालियर के किले के हमारे लिये सब किले इस समय स्वप्न हैं।' रावसाहब—'बात तो ठीक कह रही है बाईसाहब, आप भी सोचिये नावब साहव। क्यो तात्या ?' नवाब—मै रानी साहब की राय को मानने के लिये तैयार हूँ। लेकिन ग्वालियर की सेना या कुछ सरदारो को, चढाई के पहले मिला लेना चाहिये।' तात्या—'वहां का हाल मुझको मालूम है। माहुरकर, बलवन्तराव और दिनकरराव दीवान के सिवाय और सब सरदार स्वराज्य-स्थापना के पक्ष में हैं। सेना का काफी अंश हमारा साथ देगा।'

लक्ष्मीबाई ४५३ रानी—'एक बार फिर जाओ। शीघ्र जाओ और पूरा पता लगा कर शीघ्र आओ।' रावसाहब—'शीघ्रता के लिये तो तात्या शेरो का शेर है।' आज्ञा पाकर तात्या तुरन्त ग्वालियर की ओर रवाना हुआ।

४५४। झाँसी की रानी [ ८३ ] सन्ध्या होते ही रानी थोड़ी देर के लिये ध्यान मग्न हुईं। ध्यान के उपरान्त वे शिविर के बाहर निकली थी कि रामचन्द्र, देशमुख, रघुनाथ- सिंह और गुलमुहम्मद आ गये। रानी के पास उस समय लालकुर्ती वाले केवल दो सौ सवार रह गये थे। हिन्दू और मुसलमान। इस रिसाले के प्रधान सेनाध्यक्ष रानी थी और उनके अधीन यूथपति ये तीन पुरुष और वे दो स्त्रिया-जिनमें मुन्दर तो रानी के साथ छाया की तरह रहती थी। यह छोटी सी सेना उनकी परम भक्त थी और सयम निष्ठा रघुनाथसिंह ने कहा, 'सरकार दीवान जवाहरसिंह अपने इलाके के बाहर नही निकल पा रहे हैं। उन्होने 'कुछ सेना इकट्ठी की थी। कम्पनी के दस्ते उनको पछिया रहे हैं। वे अब इस ओर शायद ही आ सके।' गुलमुहम्मद बोला, 'सरकार अम अपने मुलक पहुँच पाये तो इतना पठान लाये कि दुश्मनो को कच्चा चबा जाये।' देशमुख ने कहा, 'सिपाही आगे के हुकुम की प्रतीक्षा कर रहे हैं।' रानी बोली, 'प्रधान सेनापति रावसाहब पेशवा हैं। मै इस समय कुछ नही बतला सकती। परन्तु शीघ्र कुछ होगा, यह कह सकती हूँ।' देशमुख—'अपना रिसाला लडने के लिये उकता रहा है।' रानी—'यह सैनिक का एक दोष है, गुण नही। उकताना नही चाहिये। उनको समय पर भोजन, आराम, वेतन मिलता जा रहा है ?' उन तीनो ने हा में उत्तर दिया। रानी ने कहा, 'किसी समय भी, तनिक सी भी कमी जान पड़े, मुझसे तुरन्त कहना। मेरे पास अभी बहुत से हीरे जवाहर हैं। तुम लोगो को और तुम्हारे रिसाले को किसी प्रकार का कष्ट न हो, मैं यही चाहती हूँ।' 'कभी नही हो सकता,' कह कर वे लोग चले गये। भोजन करने के उपरान्त रानी ने शयन किया। मुन्दर पैर दबाने लगी।

लक्ष्मीबाई ४५५ रानी ने पैर खींचकर कहा, 'तेरी यह आदत न जानें क्यो नही जाती । मेरा शरीर नही दूख रहा है । उस दिन नही दूखा जब झाँसी' से कालपी आई थी । आज तो कोई परिश्रम ही नही किया है।' 'हां, नही जाती', मुन्दर ने हठपूर्वक और इठला कर कहा, 'चाहे जैसी पीडा सिर पर आ जाय आप कभी कहती थोडे ही हैं।' मुन्दर पैर दाबने लगी । 'तो तू क्या जन्म भर मेरे पैर दावा करेगी ?' 'जी हां, जन्म भर ।' 'रिशाले की कर्नल होकर ।' 'जी हां, जब एक दिन जनरल हो जाऊँगी, तब भी इन पैरो का दावना नही छोडूंगी ।' 'पैरो के दबाने वाले जनरल का नाम सुनकर लोग क्या कहेगे ?' 'जिन लोगो को यह न मालूम होगा कि इन चरणो की धूल में जनरल बनाने का गुण है वे भले ही कुछ कहे !' 'कदाचित् ऐसा हो, परन्तु मेरी वाणी में यह गुण नही है । इन लोगो को सम्मति देती हूँ । हाँ—हाँ कर देते हैं, परन्तु करते मनमानी हैं । कालपी का युद्ध क्या हारने योग्य था ?' 'इनमें कोई रण-पण्डित है ही नही ।' 'एक है—तात्या टोपे, परन्तु उसकी चलती नही और वह अवश्य- कता से अधिक आज्ञानुवर्ती है । प्रतिवाद करना जानता ही नही ।' 'वे कालपी के युद्ध में नही थे । घर चले गये थे ।' 'उस समय उसको क्षोभ हो गया था। कारण को उघारना व्यर्थ है ! तू जानती है, यदि इन असख्य सेनापतियो में गाँठ की कोई बुद्धि होती तो इनके व्यसन न खटकते, परन्तु व्यसनी हैं और मूर्ख हैं।' 'यही बात जूही कहती है । अपने अन्य सरदार भी कहते हैं।'

४५६ झांसी की रानी

'गुलमुहम्मद बात करने में जैसा लट्ठ जान पड़ता है वैसा वास्तव में नहीं है। वह चतुर और वीर दल नायक है। वैसे ही देशमुख और रघुनाथसिंह हैं।' 'हाँ सरकार।' 'एक बात बतला सुन्दर।' 'आज्ञा सरकार।' 'तू संसार में सबसे अधिक किसको चाहती है। सच सच कहना।' 'सच कहती हूँ। भगवान जानते हैं—मैं आपको सबसे अधिक चाहती हूँ।' 'मेरे उपरान्त किसको?' सुन्दर ने उनके पैर पकड़ लिये। सिर नीचा कर लिया। 'और कौन है सरकार?' 'नाम बतलाऊँ?' 'नहीं।' 'सुन्दर, तू विवाह करना।' 'जब सरकार स्वराज्य स्थापित कर चुकेगी तब।' 'स्वराज्य तो देर सबेर स्थापित होगा ही। तू विवाह के लिये क्यो रुके?' 'वह जीवन का मुख्य कार्य नहीं है।' 'यह तेरी इच्छा पर निर्भर है, परन्तु मेरी अनुमति है। 'असम्भव सरकार। मेरा प्रण है।' 'जूही ने भी प्रण किया है। उस पर मुझको दया आती है।' 'उसने मरणपर्यन्त कौमार्य व्रत का प्रण किया है।' 'असम्भव नहीं है।' 'मैं सरकार से एक बात पूछना चाहती हूँ।' 'पूछ।' 'जितनी निर्भय आप हैं, क्या कोई और भी हो सकता है?'

लक्ष्मीबाई ४५७ ‘अवश्य । कुछ कठिन नही ।’ ‘सो कैसे ?’ ‘सहज ही । काफी शारीरिक श्रम कर, सहज ही ध्यान और विश्वास से सहज हो जायगा । मुन्दर गद्गद् हो गई । कुछ क्षण चुप रहने के बाद यकायक बोली, ‘बाई साहब, मे आपके समक्ष मर जाऊँ, तो मुझे बडा सुख होगा । मोतीबाई की सी मृत्यु की श्राराधना करती हू ।’ ‘जो बात मैने बतलाई वह इससे कही बढकर है ।’