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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 459

४४६ झाँसी की रानी तुरन्त वह हलके तोपखाने लिये पीछे से आगे आया। गोलाबारी की भागते हुये गोलन्दाजो को उत्साहित किया। रोज एक जगह ऊँट-तोपखाना लिये डटा था। अपनी सेना की भगदढ का समाचार पाते ही वह इस तोपखाने को लेकर दौडा आया और छोटे गोलो की बौछार पर बौछार की। कालपी की सेना तितर-बितर होने लगी अपने दस्ते को लेकर रानी ने रोज के निरोध का प्रयत्न किया, परन्तु भगेड़ी सिपाहियो को भंग ने भागने की सुझाई। उनके पैर उखड़ गये। विवश होकर, रानी को अपने दस्ते रणभूमि से हटाने पडे। अपेक्षाकृत उनके सैनिक कम हताहत हुये। जो बचे उनको लेकर रानी पेशवा की छावनी में लौट आईं। दो दिन और मारकाट हुई, परन्तु उसको लड़ाई नही कह सकते। पेशवा की सेना के काफी सिपाही अन्तिम विजय से निराश होकर अपने अपने गाँवो को भाग गये। दो दिन पेशवा ने लष्टम-पष्टम गोलाबारी अंग्रेजो से बदली। इस सेना में अधिकतर लुटेरे और बदमाश रह गये थे। जैसे ही उन्होने देखा कि पेशवा हारे, कालपी की लूट शुरू कर दी और शकर की दूकानो की पहले घात लगाई। पेशवा ने कालपी छोडी। थोडी सी सेना उनके साथ लग गई। रानी अपने पाँच दलपतियो तथा अपनी बची बचाई छोटी लालकुर्ती सेना सहित निकल गईं। यह हारा थका दल गोपालपुर में, जो ग्वालियर के नैऋत्य में ४६ मील की दूरी पर था, जा टिका। कोच की पराजय के उपरान्त तात्या अपने पिता के पास जालौन चला आया था। कालपी के पराभव का वृत्तान्त सुनकर उसको ग्लानि हुई और वह पेशवा के पास गोपालपुरा पहुँच गया। बादा का नवाब भी इधर-उधर भटकता हुआ गोपालपुरा आ गया। राजा मर्दनसिंह और राजा बखतवली इसके उपरान्त लड़ाई के नक्शे में फिर नही आते। कुछ समय बाद राजा