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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

४४६ झाँसी की रानी तुरन्त वह हलके तोपखाने लिये पीछे से आगे आया। गोलाबारी की भागते हुये गोलन्दाजो को उत्साहित किया। रोज एक जगह ऊँट-तोपखाना लिये डटा था। अपनी सेना की भगदढ का समाचार पाते ही वह इस तोपखाने को लेकर दौडा आया और छोटे गोलो की बौछार पर बौछार की। कालपी की सेना तितर-बितर होने लगी अपने दस्ते को लेकर रानी ने रोज के निरोध का प्रयत्न किया, परन्तु भगेड़ी सिपाहियो को भंग ने भागने की सुझाई। उनके पैर उखड़ गये। विवश होकर, रानी को अपने दस्ते रणभूमि से हटाने पडे। अपेक्षाकृत उनके सैनिक कम हताहत हुये। जो बचे उनको लेकर रानी पेशवा की छावनी में लौट आईं। दो दिन और मारकाट हुई, परन्तु उसको लड़ाई नही कह सकते। पेशवा की सेना के काफी सिपाही अन्तिम विजय से निराश होकर अपने अपने गाँवो को भाग गये। दो दिन पेशवा ने लष्टम-पष्टम गोलाबारी अंग्रेजो से बदली। इस सेना में अधिकतर लुटेरे और बदमाश रह गये थे। जैसे ही उन्होने देखा कि पेशवा हारे, कालपी की लूट शुरू कर दी और शकर की दूकानो की पहले घात लगाई। पेशवा ने कालपी छोडी। थोडी सी सेना उनके साथ लग गई। रानी अपने पाँच दलपतियो तथा अपनी बची बचाई छोटी लालकुर्ती सेना सहित निकल गईं। यह हारा थका दल गोपालपुर में, जो ग्वालियर के नैऋत्य में ४६ मील की दूरी पर था, जा टिका। कोच की पराजय के उपरान्त तात्या अपने पिता के पास जालौन चला आया था। कालपी के पराभव का वृत्तान्त सुनकर उसको ग्लानि हुई और वह पेशवा के पास गोपालपुरा पहुँच गया। बादा का नवाब भी इधर-उधर भटकता हुआ गोपालपुरा आ गया। राजा मर्दनसिंह और राजा बखतवली इसके उपरान्त लड़ाई के नक्शे में फिर नही आते। कुछ समय बाद राजा

लक्ष्मीबाई ४४७ बखतवली को अङ्गरेज़ो ने कैद करके लाहौर भेज दिया । मर्दनसिंह भी कैद हो गया । रोज़ को कालपी में पेशवा की बहुत बहुमूल्य युद्ध सामग्री मिली । पन्द्रह तोपे, सातसौ मन बारूद, असंख्य बन्दूक और तलवारें और नये तर्ज़ के हथियार ढालने-बनाने की विलायती मशीने हाथ लगी । रोज़ को यह विजय चौबीस मई के दिन मिली । यही दिवस विक्टोरिया के जन्म का था । इसलिये अङ्गरेज़ो ने धूमधाम के साथ कालपी पर अपना झण्डा चढ़ाया और कतल तथा लूट से पाई हुई शकर के प्रमाद से जश्न मनाये । और तीन दिन कालपी को मुस्तैदी के साथ लूटा । जनरल रोज़ ने नर्मदा के उत्तर भाग को कालपी तक अपने अधीन कर लिया । नर्मदा के उत्तरपूर्वीय भाग को दबाता हुआ करवी, महोबा, वादा इत्यादि को लूटता-कुचलता विटलाक रोज़ से कालपी में आ मिला । राजपूताने की ओर से कर्नल स्मिथ अपनी सेना लिये हुये आगरा, ग्वालियर की दिशा में आ रहा था । 'बलवाइयो' के पकड़े जाने के लिये गाव गाव में इनामी इसतहार बांटे जा रहे थे । रावसाहब के पास रईस और सरदार काफी थे, परन्तु सेना बहुत कम थी । तोपें नही थी, सामान नही बचा था । और व्यवस्था तो कभी भी न थी । दिन भर लू चली । रात को भी काफी गरम हवा चल रही थी तारे धूल की पतली चादर से ढके हुये थे । गोपालपुरा के एक बगीचे में रावसाहब, तात्या, वादा के नवाव इत्यादि आगे की योजना के आकार- प्रकार बना-विगाड रहे थे । रात अन्धेरी थी । पास में कोई उजाला न था । इसलिये किसके चेहरे पर क्या गुज़र रही थी, कोई नही देख सकता था । रानी लक्ष्मीबाई अपने शिविर में थी । उस दरबार में न थी । रावसाहब ने कहा, 'किसी प्रकार नागपूर की ओर पहुच पावें तो शीघ्र सैन्य संग्रह हो । इन्दौर की छावनी से भी सहायता मिले ।'

४४८ झाँसी की रानी बांदा के नवाब ने अपनी घबराहट प्रकट की, 'हैदराबाद के निज़ाम के मारे नागपूर के पड़ौस में ठहर पाना दूभर हो जायगा।' तात्या बोला, 'निज़ाम का कोई भय नही। वहा की जनता तुरन्त हमारा साथ देगी।' रावसाहब—'वहा से महाराष्ट्र सरक जाने मे बड़ा सुभीता रहेगा। पहाडियां, किले, घाटियाँ और नदिया बारगी और भूबँधी-दोनो प्रकार की लड़ाइयो के लिये बहुत उपयोगी हैं।' नवाब—'परन्तु वहा तक पहुचेगे कैसे?' तात्या—'पहुँचाने का जिम्मा मै लेता हू।' नवाब—'जासूसो से जो खबरे मिली हैं, उनसे हर हालत मे इस नतीजे पर पहुँचने के लिये विवश हूँ कि हम लोग विजडे में फँस गये हैं।' रावसाहब—'अवध की तरफ चलना ज़्यादा अच्छा होगा। अवध पास है। मार्ग सीधा है। वहा की जनता अदम्य है। लखनऊ का पतन हो गया तो क्या हुआ। नाना साहब अभी वहा हैं। बेगम साहब भी हैं। तात्या—'अवध में हम लोग बहुत काम कर सकते है। एक बाधा अवश्य है।' रावसाहब—'वह क्या?' तात्या—'उस प्रदेश में किले बहुत कम हैं।' नवाब—'एक बडी बाधा और है। अङ्गरेज़ो की बेशुमार पलटने अवध मे फैल गई हैं, और ज्यादा कलकत्ते से आ रही हैं।' एक सरदार—'मेरी समझ में तो यह आता है कि छोटी छोटी टुकडियो में बट कर, इधर उधर फैल जाओ और अङ्गरेजी इलाके की लूटमार शुरू करदो।' दूसरा सरदार—'और नये नये लोगो को इन टुकड़ियो में भर्ती करते जाओ। एक दिन काफी बडी सेना बिना परेशानी के अपने पास हो जावेगी तब हम लोग अङ्गरेज़ो को चित कर देगे।' तात्या—'इसमें कितने दिन लगेगे?'

रावसाहब—'समय की चिन्ता क्या है ? अंग्रेजी सेना में फिर कोई बलवा होगा। तोपें हाथ आ जायेगी और काम बन जायगा।' नवाब—'लेकिन तोपे अब हिन्दुस्थानी फौज के हाथ में कभी नही आवेगी। तोपखानो को अँग्रेज़ अपने हाथ में रखने लगे हैं।' एक सरदार—'परन्तु जनता के पास तो हथियार हैं।' नवाब—'जब तक आप फौज इकट्ठी करेगे तब तक अँग्रेज़ लोग सारी जनता के हथियार अपने मालखाने में रखवा लेंगे।' रावसाहब—'कही कालपी फिर वापिस मिल जाय तो सब दिक्कतें दूर हो जायें।' नवाब—'हम तो चाहते हैं कि दिल्ली और लखनऊ भी हाथ में आ जायें, मगर चाहने से होता क्या है ?' सरदार—'मेरा कहना मानिये। टुकडियो में बटकर लूटमार शुरू कर दीजिये।' तात्या—'जनता साथ न देगी।' रावसाहब—'तुम अवध के लडाको को भर्ती करके यहा ले आओ।' तात्या—'जो आज्ञा।' नवाब—'लेकिन इसमें तो वक्त लगेगा, और, तब तक हम आप क्या करेगे ?' रावसाहब—'तो फिर राजा बखतबल्ली और राजा मर्दनसिंह को बुन्देलखण्डी सेना सहित फिर बुलवाओ।' नवाब—'उनको हमारा साथ देना होता तो गोपालपुरा में आज कभी के आ जाते।' रावसाहब—'तब फिर क्या किया जाय ?' सरदार—'राजपूताने की तरफ चलिये। वहा की छावनियो ने अभी तक कुछ नही किया है।' तात्या—'वहा की छावनिया बहुत करके अपना साथ देगी।'

४५० ,झाँसी की रानी रावसाहब—'मेरा मन दक्षिण भारत के लिये बहुत बोलता है।' नवाब—'परन्तु वहां तक पहुँचे कैसे ?' तात्या—'मैं पहले ही निवेदन कर चुका हूँ कि पहुंचा मैं दूँगा।' नवाब—'मै भी जरा पहले अर्ज कर चुका हूँ कि झांसी, सागर, सीहोर वगैरह मे बहुत सी अग्रेजी फौज है और हम यहाँ पिंजड़े मे फँस गये हैं।' सरदार—'तब फिर अग्रैजो के हाथ अपने को सौंप दिया जाय ?' नवाब—'वह तो मैने हरगिज नही कहा।' रावसाहब—'तब फिर किसी अग्रेजी छावनी पर एकदम टूट पड़े' और उसको चीरते हुये आगे बढकर भाग्य की परीक्षा करे। नवाब—'परन्तु बिना बडी तोपो की मदद के छावनी के ऊपर हमला करना मौत के मुँह में जाना है।' रावसाहब—'यदि तात्या महाराष्ट्र में जाकर जनता को जाग्रत करदे तो अग्रेज़ वहा उलझ जायँगे और तब हम सरपट महाराष्ट्र में. 'पहुँच सकते हैं।' नवाब—'लेकिन फिर वही सवाल उठता है कि तब तक हम लोग यहा क्या करे ?' तात्या—'रानी साहब की राय ली जाय।' रावसाहब—'मै रानी साहब की राय की बहुत कदर करता हू। वे बहुत अच्छी सैनिक हैं और लडाई के मैदान में विजय भी प्राप्त करा सकती हैं, परन्तु स्त्री हैं और जितना ससार हम लोगो ने नापा है उतना उन्होने नही।' नवाब—'इस पर भी उन्होने दस महीने खूबी के साथ झाँसी का राज्य किया। ऐसा कि प्रजा उन पर कुरवान हो गई।' रावसाहव—'यह सब ठीक है, बिलकुल ठीक है। सलाह लेने में कोई हर्ज नही। मानना न मानना अपने हाथ में है।' तात्या—'उनको सबेरे लिवा लाऊँ ?'

लक्ष्मीबाई ४५१ सरदार—'सवेरे ज़रा वाद । सवेरा होने में बहुत देर भी नही है । वे अपने भजन-पूजन से निवृत्त हो जायेंगी, तब तक , अपुन लोग ज़रा नशा-पत्ता करेंगे । कई दिन से नही छनी है । कही से कोई अच्छी सलाह न मिली तो विजया भवानी सिर पर चढकर सब कुछ बोल-बता देगी ।' रायसाहब—'बड़ा अच्छा है । अभी अंग्रेज हम लोगो से काफी दूर हैं । हवा पर बैठकर तो आये नही जाते । परतु भाई गहरी न छने । नही तो रानीसाहब कुछ ज्यादा डाट-फटकार करेगी ।' इस तरह रात भर यह विवाद जारी रहा, परन्तु ये लोग किसी भी निश्चय पर न पहुँच सके । प्रत काल के उपरान्त तात्या रानी को लिवा लाया । तात्या ने उनको रात के अधिवेशन का संक्षेप में वृतान्त सुना दिया था । लोग भग पीकर निवृत हो गये थे, हुक्के गुडगुडा रहे थे कि वे आ गई । लोग उनका अदब करते थे, इसलिये हुक्के हटा दिये गये । पेशवाई सेना की आधोगति का उनको पता था । तो भी उन्होने अपने क्षोभ को दबाकर परिस्थिति को भली भाति समझने के लिये प्रश्न किये जो उत्तर मिले उनका निचोड वही था जो रात की बैठक में वादा के नवाब ने बतलाया था—'हम लोग पिंजडे मे फंस गये हैं ।' रानी ने कहा, 'अव तक हम लोग जहा जहा अंग्रेजों से जम कर लड पाये, वहा वहा किलो का आश्रय लेकर । फिर किसी मजबूत किले को हाथ में करना चाहिये । तोपे सहज ही ढल जायगी । काम चालू हो जायगा ।' रावसाहब—'परन्तु झाँसी और कालपी के किले तो फिर नही मिल सकते-कम से कम अभी हाल हाथ नही आसकते ।' रानी—'इनको कुछ दिनो विचार से अलग रखिये । तात्या—नरवर का किला बहुत अच्छा है । निकट सिन्ध नदी है । आसपास पहाड जगल है ।

४५२ झांसी की रानी

नवाब--'करेरा का भी किला अच्छा है।' रानी--'न।' रावसाहब--'तब फिर कौनसा किला?' रानी—'ग्वालियर का। वही यहा से अत्यन्त निकट है।' रावसाहब—'ग्वालियर का किला !' नवाब--'ग्वालियर का !' रानी—'हां ग्वालियर का। ग्वालियर की वस्तुस्थिति का पुनः अनुसन्धान करके तुरन्त ग्वालियर पर आक्रमण कर देना चाहिये। राजा और वहां के दो तीन सरदार अँग्रेज कम्पनी के पक्षपाती हैं। परन्तु सेना और जनता नही है। सेना यदि हमारा पक्ष प्रबलता के साथ न भी पकड़ेगी तो ढुलमुल अवश्य रहेगी। ग्वालियर में बनी बनाई सजी सजाईं, बढ़िया तोपें, गोले, गोली, सैकड़ो मन बारूद और अन्य प्रकार की युद्ध सामग्री तथा अटूट कोष है।' नवाब—'लेकिन...' रावसाहब—'हां, परन्तु ..' रानी—'किन्तु, परन्तु, कुछ नही । बिना किले के कोई भी प्रयास आत्मवध के समान होगा, और सिवाय ग्वालियर के किले के हमारे लिये सब किले इस समय स्वप्न हैं।' रावसाहब—'बात तो ठीक कह रही है बाईसाहब, आप भी सोचिये नावब साहव। क्यो तात्या ?' नवाब—मै रानी साहब की राय को मानने के लिये तैयार हूँ। लेकिन ग्वालियर की सेना या कुछ सरदारो को, चढाई के पहले मिला लेना चाहिये।' तात्या—'वहां का हाल मुझको मालूम है। माहुरकर, बलवन्तराव और दिनकरराव दीवान के सिवाय और सब सरदार स्वराज्य-स्थापना के पक्ष में हैं। सेना का काफी अंश हमारा साथ देगा।'

लक्ष्मीबाई ४५३ रानी—'एक बार फिर जाओ। शीघ्र जाओ और पूरा पता लगा कर शीघ्र आओ।' रावसाहब—'शीघ्रता के लिये तो तात्या शेरो का शेर है।' आज्ञा पाकर तात्या तुरन्त ग्वालियर की ओर रवाना हुआ।

४५४। झाँसी की रानी [ ८३ ] सन्ध्या होते ही रानी थोड़ी देर के लिये ध्यान मग्न हुईं। ध्यान के उपरान्त वे शिविर के बाहर निकली थी कि रामचन्द्र, देशमुख, रघुनाथ- सिंह और गुलमुहम्मद आ गये। रानी के पास उस समय लालकुर्ती वाले केवल दो सौ सवार रह गये थे। हिन्दू और मुसलमान। इस रिसाले के प्रधान सेनाध्यक्ष रानी थी और उनके अधीन यूथपति ये तीन पुरुष और वे दो स्त्रिया-जिनमें मुन्दर तो रानी के साथ छाया की तरह रहती थी। यह छोटी सी सेना उनकी परम भक्त थी और सयम निष्ठा रघुनाथसिंह ने कहा, 'सरकार दीवान जवाहरसिंह अपने इलाके के बाहर नही निकल पा रहे हैं। उन्होने 'कुछ सेना इकट्ठी की थी। कम्पनी के दस्ते उनको पछिया रहे हैं। वे अब इस ओर शायद ही आ सके।' गुलमुहम्मद बोला, 'सरकार अम अपने मुलक पहुँच पाये तो इतना पठान लाये कि दुश्मनो को कच्चा चबा जाये।' देशमुख ने कहा, 'सिपाही आगे के हुकुम की प्रतीक्षा कर रहे हैं।' रानी बोली, 'प्रधान सेनापति रावसाहब पेशवा हैं। मै इस समय कुछ नही बतला सकती। परन्तु शीघ्र कुछ होगा, यह कह सकती हूँ।' देशमुख—'अपना रिसाला लडने के लिये उकता रहा है।' रानी—'यह सैनिक का एक दोष है, गुण नही। उकताना नही चाहिये। उनको समय पर भोजन, आराम, वेतन मिलता जा रहा है ?' उन तीनो ने हा में उत्तर दिया। रानी ने कहा, 'किसी समय भी, तनिक सी भी कमी जान पड़े, मुझसे तुरन्त कहना। मेरे पास अभी बहुत से हीरे जवाहर हैं। तुम लोगो को और तुम्हारे रिसाले को किसी प्रकार का कष्ट न हो, मैं यही चाहती हूँ।' 'कभी नही हो सकता,' कह कर वे लोग चले गये। भोजन करने के उपरान्त रानी ने शयन किया। मुन्दर पैर दबाने लगी।

लक्ष्मीबाई ४५५ रानी ने पैर खींचकर कहा, 'तेरी यह आदत न जानें क्यो नही जाती । मेरा शरीर नही दूख रहा है । उस दिन नही दूखा जब झाँसी' से कालपी आई थी । आज तो कोई परिश्रम ही नही किया है।' 'हां, नही जाती', मुन्दर ने हठपूर्वक और इठला कर कहा, 'चाहे जैसी पीडा सिर पर आ जाय आप कभी कहती थोडे ही हैं।' मुन्दर पैर दाबने लगी । 'तो तू क्या जन्म भर मेरे पैर दावा करेगी ?' 'जी हां, जन्म भर ।' 'रिशाले की कर्नल होकर ।' 'जी हां, जब एक दिन जनरल हो जाऊँगी, तब भी इन पैरो का दावना नही छोडूंगी ।' 'पैरो के दबाने वाले जनरल का नाम सुनकर लोग क्या कहेगे ?' 'जिन लोगो को यह न मालूम होगा कि इन चरणो की धूल में जनरल बनाने का गुण है वे भले ही कुछ कहे !' 'कदाचित् ऐसा हो, परन्तु मेरी वाणी में यह गुण नही है । इन लोगो को सम्मति देती हूँ । हाँ—हाँ कर देते हैं, परन्तु करते मनमानी हैं । कालपी का युद्ध क्या हारने योग्य था ?' 'इनमें कोई रण-पण्डित है ही नही ।' 'एक है—तात्या टोपे, परन्तु उसकी चलती नही और वह अवश्य- कता से अधिक आज्ञानुवर्ती है । प्रतिवाद करना जानता ही नही ।' 'वे कालपी के युद्ध में नही थे । घर चले गये थे ।' 'उस समय उसको क्षोभ हो गया था। कारण को उघारना व्यर्थ है ! तू जानती है, यदि इन असख्य सेनापतियो में गाँठ की कोई बुद्धि होती तो इनके व्यसन न खटकते, परन्तु व्यसनी हैं और मूर्ख हैं।' 'यही बात जूही कहती है । अपने अन्य सरदार भी कहते हैं।'

४५६ झांसी की रानी

'गुलमुहम्मद बात करने में जैसा लट्ठ जान पड़ता है वैसा वास्तव में नहीं है। वह चतुर और वीर दल नायक है। वैसे ही देशमुख और रघुनाथसिंह हैं।' 'हाँ सरकार।' 'एक बात बतला सुन्दर।' 'आज्ञा सरकार।' 'तू संसार में सबसे अधिक किसको चाहती है। सच सच कहना।' 'सच कहती हूँ। भगवान जानते हैं—मैं आपको सबसे अधिक चाहती हूँ।' 'मेरे उपरान्त किसको?' सुन्दर ने उनके पैर पकड़ लिये। सिर नीचा कर लिया। 'और कौन है सरकार?' 'नाम बतलाऊँ?' 'नहीं।' 'सुन्दर, तू विवाह करना।' 'जब सरकार स्वराज्य स्थापित कर चुकेगी तब।' 'स्वराज्य तो देर सबेर स्थापित होगा ही। तू विवाह के लिये क्यो रुके?' 'वह जीवन का मुख्य कार्य नहीं है।' 'यह तेरी इच्छा पर निर्भर है, परन्तु मेरी अनुमति है। 'असम्भव सरकार। मेरा प्रण है।' 'जूही ने भी प्रण किया है। उस पर मुझको दया आती है।' 'उसने मरणपर्यन्त कौमार्य व्रत का प्रण किया है।' 'असम्भव नहीं है।' 'मैं सरकार से एक बात पूछना चाहती हूँ।' 'पूछ।' 'जितनी निर्भय आप हैं, क्या कोई और भी हो सकता है?'

लक्ष्मीबाई ४५७ ‘अवश्य । कुछ कठिन नही ।’ ‘सो कैसे ?’ ‘सहज ही । काफी शारीरिक श्रम कर, सहज ही ध्यान और विश्वास से सहज हो जायगा । मुन्दर गद्गद् हो गई । कुछ क्षण चुप रहने के बाद यकायक बोली, ‘बाई साहब, मे आपके समक्ष मर जाऊँ, तो मुझे बडा सुख होगा । मोतीबाई की सी मृत्यु की श्राराधना करती हू ।’ ‘जो बात मैने बतलाई वह इससे कही बढकर है ।’

४५८ झांसी की रानी

[ ८४ ]

सन् १८४४ मे अंग्रेजों ने सिन्धिया की सेना को, जो होलकर सिन्धिया के परस्पर युद्धो के कारण पहले ही क्षीण हो चुकी थी, पराजित किया था। तब से ग्वालियर को केवल दस सहस्र सिपाही रखने का अधिकार रह गया था और तब से लगातार अंग्रेज रेजीडेंट ग्वालियर का शासन सूत्र अपने हाथ में रखे रहा था। सन् १८५३ में जयाजीराव को शासनाधिकार मिल गये, परन्तु सूत्र रेजीडेट के ही हाथ में रहा। बची खुची सलाह सम्मति के लिये आगरा में लैफ्टिनेट गवर्नर था ही। ग्वालियर में सिन्धिया की दस सहस्र सेना के अतिरिक्त, पोषिक एक अंग्रेजी सेना भी थी। इस पोष्य (सबसीडियरी) सेना ने भी सन् ५७ के विद्रोह में भाग लिया। तांत्या यहा आया-जाया करता ही था। यह सेना तात्या के साथ कानपुर पहुच गई, परन्तु इस सेना ने जयाजीराव और दीवान दिनकराव के कौशल के कारण ग्वालियर स्थित अंग्रेजों का कुछ भी नही बिगाड पाया और वे सुरक्षित आगरा पहुँचा दिये गये, जयाजीराव ने किसी प्रकार अपनी सेना को शान्त रक्खा। यदि ग्वालियर राज्य अंग्रेजों के विरुद्ध हो जाता, तो निजाम और सिक्ख राजाओ के कम्पनी-भक्त रहते हुये भी, अंग्रेजी राज्य हिन्दुस्थान में किसी प्रकार भी नही टिक सकता था। ग्वालियर कोई बड़ा प्रबल राज्य नही था, परन्तु ग्वालियर के विरुद्ध होते ही, अंग्रेजी राज्य के खिलाफ स्वराज्य का सक्रामक गुण इतनी प्रचडता और वेग के साथ आसपास के राज्यो, विन्ध्य खण्ड और दक्षिण भारत में फैलता कि अंग्रेजी राज्य उससे बच ही नही सकता था। जब तात्या ग्वालियर पहुँचा तब उसने वहा की सेना के एक बडे अङ्ग और अधिकतर सरदारो को रानी तथा पेशवा के बहुत कुछ अनुकूल पाया। सिन्धिया सरकार को पेशवाई सेना के गोपालपूर में आ जमने की सूचना मिल गई थी। गवर्नर जनरल को तुरन्त समाचार दिया गया और अपनी दृढ तथा प्रबल राजभक्ति का पक्का आश्वासन।

लक्ष्मीबाई ४५६ गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग ने इग्लैंड को तार दिया, 'यदि सिन्धिया बलवाइयो में शामिल हो जाय तो मुझको कल ही बँधना बोरिया बाघकर यहा से चल देना पडेगा ।'* तात्या ने रावसाहब इत्यादि को ग्वालियर का हाल दूसरे दिन लौटकर सुनाया । रानी ने तुरन्त श्राक्रमण कर देने की सलाह दी । रावसाहब ने सिन्धिया सरकार को एक पत्र लिखा जिसका तात्पर्य यह था कि हम दक्षिण की ओर स्वराज्य-स्थापना के प्रयत्न में जा रहे हैं। श्राप हमारे पुराने नाते का स्मारण करिये और हमें सहायता दीजिये । दिनकरराव ने जो उत्तर दिया, वह गोल मटोल था । न उसमें हामी थी और न इनकार । दिनकरराव ने रेजीडेट को सूचना भेज दी । पेशवा की सेना कालपी के युद्ध के चार दिन बाद ग्वालियर राज्य में धस गई। सिन्धिया सरकार का एक अफसर चारसौ पैदल और डेढसौ घुड सवार लेकर रोकने के लिये पहुँच गया । वह जरा सी डाट फटकार में ही पीछे हट आया। दो दिन बाद रावसाहब की सेना ग्वालियर से नौ मील की दूरी पर एक गाव के पास ठहर गई । रावसाहब ने सिन्धिया को एक पत्र फिर सहायता के लिए लिखा । इस पर ग्वालियर की राजसभा में विवाद हुआ । राजा का इरादा था 'बलवाइयों' पर तुरन्त हल्ला बोल देने का । दीवान की नीति थी ह्यूरोज के आने तक 'बलवाइयो' को किसी बहाने अटकाये रहना । और अपनी सेना को किसी प्रकार काबू में रखना । राजा ने नही माना और पहली जून को मुरार के पूर्व बहादुरपुर गाव के निकट पेशवा का मुकाबला करने के लिये छ हज़ार पैदल, बारह सो भड़कीले सवार और आठ आधुनिक बडी तोपें लेकर मोर्चा जा पकड़ा । प्रात काल होते ही सिन्धिया ने पेशवा की ओर गोले फेकने शुरू कर दिये । जब तक सिर पर गोले नही पड़े, रावसाहब और तात्या ने भी समझा कि ग्वालियर की तोपे पेशवा को 'If the Scindhia joins the mutiny I shall have to pack off-morrow'

४६० झाँसी की रानी अगवानी के लिये सलामी दाग रही है ! उस क्षण पेशवा की सेना में लडाई की कोई तैयारी न थी । रानी की आज्ञा पर रघुनाथसिंह ने तुरन्त तैयार हो जाने का बिगुल भी बजाया, परन्तु उस नक्कारखाने में इस तूती की आवाज को कौन सुनता था ? जब सिन्धिया के गोलन्दाजो ने पेशवा की छावनी पर ताक ताक कर गोलाबारी की, तब भगदड मच गई। परन्तु रानी, उसके दलपति और सवार पहले से कमर कसे तैयार थे । तात्या टोपे को छावनी का बरकाव करने के लिये कहकर रानी लक्ष्मीबाई सिन्धिया सरकार की सेना पर केवल दो सौ सवार लेकर टूट पडी । कुछ गोलन्दाज मारे गये, कुछ तोपें छोडकर भागे । तात्या ने तुरन्त अपनी छावनी के दो भाग करके उसको गतिवान किया और उसे एक ओर हटा ले गया — वह इस विद्या में अत्यन्त निपुण था । लक्ष्मीबाई के पराक्रम को, और तात्या की दोनो टुकडियो को दूसरी दिशा से आता हुआ देखकर, सिन्धिया के वे छह हजार पैदल मैदान खाली कर गये, परन्तु बारह सौ भडकीले सवारो का सपाटा पडा । थोडी देर तक तलवार चली और खूब चली, परन्तु वे रानी के सवारो की टक्कर को न झेल सके; कटने और भागने लगे । जयाजीराव को तुरन्त मैदान छोड़कर भागना पडा । पहले राजमहल का रास्ता पकडा, फिर वह और दिनकरराव, दो एक विश्वसनीय सरदारो को लेकर धोलपूर होते हुये आगरा पहुंचे । वहा किले में उन लोगो को शरण मिली ।

लक्ष्मीबाई ४६१ [ ८५ ] राजा के आगरा चले जाने पर रानियां नरवर के किले में चली गई । पेशवाई सेना ने हर्ष और गर्व के साथ नगर में प्रवेश किया । ग्वालियर की बिखरी हुई फौज एकत्र हो गई, उसने पेशवा को तोपों की सलामी दी और उसकी अधीनता में आगई । पेशवा बड़े ठाट के साथ माङ्गलिक वाद्य बजवाता हुआ, सिंधिया के राजमहल में पहुंचा और वहीं डेरा डाला । रानी लक्ष्मीबाई ने अपना शिविर नौलखा बाग़ में रक्खा । पेशवा के साथी सरदार शहर के भिन्न भिन्न महलों में जा उतरे । तात्या के दस्ते के लिये किले वालों ने फाटक खोल दिये । बहुत सी सामग्री हाथ आगई । किले पर पेशवा का झण्डा फहराने लगा । सिन्धिया का खजाना कब्जे में आ गया । अब पेशवा के बराबर था ही कौन ? पेशवाई सेना के कम्पनी-विद्रोही भाग ने रेजीडेन्सी में आग लगाई और उसका माल-असबाब लूट लिया । दीवान दिनकरराव सरदार बलवन्तराव और सरदार माहुरकर की हवेलियों को भी, जो अङ्गरेजों के पक्षपाती थे, खाक कर दिया । एक बार मन का बन्धेज उठा कि फिर उसमें सीमाओं की पहिचान न रही - शहर का लूटना भी आरम्भ कर दिया । परन्तु पेशवा को ठीक समय पर मालूम हो गया । उसने तात्या को भेजकर यह लूटमार बन्द करवा दी । ग्वालियर के दरबारी पेशवा के अनुकूल थे और जनता का मन उसके साथ था । विजय के हर्ष और गर्व ने उसकी छाती और दिमाग को फुला दिया था, इसलिये कायदे के साथ सिंहासनारूढ होने का निश्चय किया । ज्योतिषियों ने मुहूर्त शोध दिया । पेशवा की स्वराज्य- कामना अपने निज के उत्थान के रूप में पलट गई । तीसरी जून को फूलबाग़ में एक विशाल दरबार किया गया । पेशवा ने राजसी कपड़े पहिने । कानों में मोतियों के चौकड़े, गले में मोती-जवाहरों के कंठे । शान के साथ चोबदारों के प्रणाम लेता हुआ,

४६२ झाँसी की रानी

मङ्गलध्वनि के साथ सिंहासनारूढ हो गया । सरदारो ने ताजीम दी । पेशवा ने उनका अभिनन्दन किया और खिलते बख्शी । अष्टप्रधान और एक प्रधान मन्त्री मुकर्रर किये । तात्या टोपे को प्रधान सेनापति । अपने फौजियो को बीस लाख रुपया इनाम बाटा । असंख्य ब्राह्मणो के भोजन का प्रबन्ध करवाया सहस्रो व्यक्तियो को तो रसोई बनाने के लिये ही नियुक्त करना पडा । भङ्ग-बूटी और शकर बादाम की पूरी योजना कार्यान्वित हुई ! आनन्द के इस तूफान में यदि कोई नही पडा तो लक्ष्मीबाई और उनके पाच नायक—उनकी लालकुर्ती सेना अवश्य इनाम की भागी बनी । ग्वालियर का गायन-वादन शताब्दियो से प्रसिद्ध रहा है । इसलिये उसका अखण्ड उपयोग किया जाने लगा । नृत्य और गायन से दिन और रात ओतप्रोत हो गये । ग्वालियर की ऐसी कोई भी नर्तकी और गायिका न थी जिसको अपने कलाकौशल के दिखलाने का काफी अवसर और समय न मिला हो । कवि सम्मेलन और मुशायरे भी हुये जिनमें कवि- कल्पना ने शब्दो के पुल बाघ बाघकर, जिमीन आसमान एक कर दिये । कोई पेशवा की तुलना रामचन्द्र जी के साथ कर रहा था और कोई इन्द्र के साथ । दूसरी ओर भाडो की नकले जारी थी, जिनसे परिहास और अट्टहास के फव्वारे छूट रहे थे । रानी किसी उत्सव मे शामिल नही होती थी । इस वैराग्य वृत्ति के कारण उनको उत्सवो में बुलाया ही नही जाता था । तात्या के मन के कोने में से एक दबी हुई वासना उभड पडी और वह भी अपने स्वामी पेशवा के साथ नृत्य-गान के रस में डूब गया । नृत्य-गान के एक बडे उत्सव में रानी के सरदारो को हठपूर्वक बुलाया गया । रानी ने अनुमति दे दी । मुन्दर नही गई । बाकी गये । उत्सव में ग्वालियर की चुनी हुई प्रसिद्ध नर्तकियां और गायिकाये बुलाई गई । गायन के साथ साथ नृत्य भी हुआ ।

पेशवा ने आज्ञा दी, 'गायन और नृत्य के साथ पूरा हाव-भाव तो दिखलाओ।' उन्होंने ब्योरे के साथ विविध प्रकार का हावभाव प्रदर्शन आरम्भ किया। जूही मन लगा कर देख रही थी। गायन के तोडो को वह सूक्ष्मता के साथ जांच रही थी। ताल की परनो के साथ उसके पैर की उङ्गलिया घूम जाती थी और सम पर सिर हिल जाता था। एक जगह नर्तकी पखावजी के विलक्षण कौशल के कारण क्षण के एक अंश के पहले ही सम पर घुंघरू ठुमका गई। जूही ने त्योरी बदल कर मुह बिचकाया। तात्या ध्यान के साथ नर्तकी के सुन्दर रूप, कलापूर्ण नृत्य, मनमोही हावभाव प्रदर्शन पर आंख गडाये था। जूही ने तात्या के इस ध्यान को परखा। एक बडी ग्लानि उसके मन मे उठी। देशमुख, रघुनाथसिंह और गुलमुहम्मद पास पास बैठे। गुलमुहम्मद ने धीरे से कहा, 'बाई यह सब बडा अजीब है। हमारे यहाँ तो ऐसा कोई नई नाचता।' देशमुख — 'ग्वालियर इन बातो के लिये मशहूर है।' गुलमुहम्मद — 'लेकिन अगर अङ्गरेज़ इस वक्त आ जाय तो।' देशमुख — 'तो सबको भागना पडेगा।' रघुनाथसिंह — 'और बचेगा कोई नही।' गुलमुहम्मद — 'बहुत देख लिया। हमारा तो पेट भर गया। हमारा रानी सो गया होगा। छावनी अकेला है। चल्लबी बाई।' जूही ने सुन लिया। चलने के प्रस्ताव का समर्थन किया। पेशवा से माफी मागी। इजाजत ली। तात्या ने जूही की ओर देखा। उसने एक करारी त्योरी ली और अभिमान के साथ सिर फेर लिया। ये सब वहा से अपनी छावनी चले आये। थोडे क्षण के लिये उत्सव बन्द हो गया। बीच के इस विक्षेप के कारण रसियो को बहुत बुरा लगा।

४६४ झाँसी की रानी किसी ने पूछा, 'ये लालकुर्ती वाले कौन थे ?' ^ पेशवा ने धीरे से कहा, 'कुछ बात नही। अपने ही लोग हैं। बुन्देल- खण्ड के केन्द्र झासी के हैं। ज़रा गँवार हैं।' तात्या को रानी की याद आ गई और वह काप गया, परन्तु उसने कहा कुछ नही---कह भी क्या सकता था ? उत्सव रात भर होता रहा। सवेरे खूब भंग छनी। डटकर लड्डुओं का और श्रीखंड का भोजन हुआ और फिर दिन भर सोना और रात को नाचरंग। जब जग फुरसत मिलीं तो पूछताछ हो गई कि ब्राह्मण भोजन यथाविधि चल रहा है और सेना भी खूब आनन्द मना रही है या नही। बस यही अबाध क्रम। लड्डू और श्रीखंड खाते खाते बहुत ब्राह्मण बीमार पड गये। उनमें से एक नारायण शास्त्री था। छोटी ने उसकी इतनी सेवा सुश्रूषा की कि वह शीघ्र अच्छा हो गया। गाठ में थोड़ासा पैसा कर लेने की इच्छा से छोटी ने भी पेशवा के दरबार मे नृत्य करने का निश्चय किया। नारायण ने मना किया, 'में अच्छी तरह चलने फिरने योग्य होते ही बहुत धन कमा लूँगा। तुम इन सरदारो के उत्सव में नाचने मत जाओ। ये लोग बडे कुरुचिपूर्ण हैं।' छोटी ने प्रश्न किया, 'मुझ पर आपको क्या भरोसा नही है ?' नारायण—'भरोसा तो पूरा है छोटी, परन्तु यह काम जघन्य है।' छोटी—'जब पलटनो में नाचती गाती थी, तब वह काम श्रेष्ठ था।' नारायण—'उसका मतलब ऊँचा था।' छोटी—'पास मे रुपया पैसा कुछ नही था। आप चलने फिरने लायक कुछ देर में हो पावेंगे। मे आज के ही नाच में काफी पैसा ले आऊँगी। मन ऊँचा बना रहे तो कोई काम नीचा नही।' शास्त्री को छोटी का हठ निभाना पडा। छोटी सुन्दर वेश में पेशवा के उत्सव में पहुच गई और उसका नाच गाना हुआ।

लक्ष्मीबाई ४६५ गाना उसका बहुत साधारण श्रेणी का था । उसकी विशेषता केवल उसका सुरीला और मधुर कण्ठ थी । नृत्य भी उसका एक बधे हुये प्रकार का था । लय ज़रूर बहुत द्रुत थी । सुन्दर थी, इसलिये उसको टोका नही गया । उसके सीधे साधे गाने और नाचने पर रावसाहब मुग्ध हो गया । अच्छा पुरस्कार दिया । बोला, 'तुम क्या यही की रहने वाली हो ? तुम्हारा नृत्य शास्त्रीय ढङ्ग का न होने पर भी निराला है । तुम बराबर नाचने आया करो ।' छोटी ने उत्तर दिया, 'सरकार मै झाँसी की रहने वाली हू । लश्कर में कुछ समय से हूँ ।' तात्या छोटी को बडी देर से देख रहा था । पहिचानने की चेष्टा कर रहा था । अब उसको भ्रम न रहा । तात्या ने रावसाहब से कहा, 'यह जाति की मेहतरानी है श्रीमन्त ।' पेशवा—'मेहतरानी !' तात्या—'सरकार ।' पेशवा—'तो भी क्या हुआ ? उसके पास विद्या है । नाचती क्या है, जादू डालती है ।' तात्या—'यह नारायण शास्त्री के साथ झाँसी से भागी थी ।' पेशवा—'नारायण शास्त्री के साथ ! ब्राह्मण को पतित करके !!' रावसाहब का कला-प्रेम समाप्त हो गया । क्रुद्ध स्वर में बोला, 'तूने यहाँ आने की कैसे हिम्मत की ?' छोटी—'जैसे पलटनो में जाने की, देश का कार्य करने की करती थी ।' पेशवा ने तात्या की ओर देखा । तात्या ने कहा, 'पल्टनो में जागृति फैलाने का काम तो इसने ग्वालियर में बहुत किया है ।' पेशवा—'तो क्या हुआ ? अब जो कुछ कर रही है और जो कुछ इसने झाँसी में किया, वह दण्डनीय है ।