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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 467

४५४। झाँसी की रानी [ ८३ ] सन्ध्या होते ही रानी थोड़ी देर के लिये ध्यान मग्न हुईं। ध्यान के उपरान्त वे शिविर के बाहर निकली थी कि रामचन्द्र, देशमुख, रघुनाथ- सिंह और गुलमुहम्मद आ गये। रानी के पास उस समय लालकुर्ती वाले केवल दो सौ सवार रह गये थे। हिन्दू और मुसलमान। इस रिसाले के प्रधान सेनाध्यक्ष रानी थी और उनके अधीन यूथपति ये तीन पुरुष और वे दो स्त्रिया-जिनमें मुन्दर तो रानी के साथ छाया की तरह रहती थी। यह छोटी सी सेना उनकी परम भक्त थी और सयम निष्ठा रघुनाथसिंह ने कहा, 'सरकार दीवान जवाहरसिंह अपने इलाके के बाहर नही निकल पा रहे हैं। उन्होने 'कुछ सेना इकट्ठी की थी। कम्पनी के दस्ते उनको पछिया रहे हैं। वे अब इस ओर शायद ही आ सके।' गुलमुहम्मद बोला, 'सरकार अम अपने मुलक पहुँच पाये तो इतना पठान लाये कि दुश्मनो को कच्चा चबा जाये।' देशमुख ने कहा, 'सिपाही आगे के हुकुम की प्रतीक्षा कर रहे हैं।' रानी बोली, 'प्रधान सेनापति रावसाहब पेशवा हैं। मै इस समय कुछ नही बतला सकती। परन्तु शीघ्र कुछ होगा, यह कह सकती हूँ।' देशमुख—'अपना रिसाला लडने के लिये उकता रहा है।' रानी—'यह सैनिक का एक दोष है, गुण नही। उकताना नही चाहिये। उनको समय पर भोजन, आराम, वेतन मिलता जा रहा है ?' उन तीनो ने हा में उत्तर दिया। रानी ने कहा, 'किसी समय भी, तनिक सी भी कमी जान पड़े, मुझसे तुरन्त कहना। मेरे पास अभी बहुत से हीरे जवाहर हैं। तुम लोगो को और तुम्हारे रिसाले को किसी प्रकार का कष्ट न हो, मैं यही चाहती हूँ।' 'कभी नही हो सकता,' कह कर वे लोग चले गये। भोजन करने के उपरान्त रानी ने शयन किया। मुन्दर पैर दबाने लगी।