भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 468, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 468

लक्ष्मीबाई ४५५ रानी ने पैर खींचकर कहा, 'तेरी यह आदत न जानें क्यो नही जाती । मेरा शरीर नही दूख रहा है । उस दिन नही दूखा जब झाँसी' से कालपी आई थी । आज तो कोई परिश्रम ही नही किया है।' 'हां, नही जाती', मुन्दर ने हठपूर्वक और इठला कर कहा, 'चाहे जैसी पीडा सिर पर आ जाय आप कभी कहती थोडे ही हैं।' मुन्दर पैर दाबने लगी । 'तो तू क्या जन्म भर मेरे पैर दावा करेगी ?' 'जी हां, जन्म भर ।' 'रिशाले की कर्नल होकर ।' 'जी हां, जब एक दिन जनरल हो जाऊँगी, तब भी इन पैरो का दावना नही छोडूंगी ।' 'पैरो के दबाने वाले जनरल का नाम सुनकर लोग क्या कहेगे ?' 'जिन लोगो को यह न मालूम होगा कि इन चरणो की धूल में जनरल बनाने का गुण है वे भले ही कुछ कहे !' 'कदाचित् ऐसा हो, परन्तु मेरी वाणी में यह गुण नही है । इन लोगो को सम्मति देती हूँ । हाँ—हाँ कर देते हैं, परन्तु करते मनमानी हैं । कालपी का युद्ध क्या हारने योग्य था ?' 'इनमें कोई रण-पण्डित है ही नही ।' 'एक है—तात्या टोपे, परन्तु उसकी चलती नही और वह अवश्य- कता से अधिक आज्ञानुवर्ती है । प्रतिवाद करना जानता ही नही ।' 'वे कालपी के युद्ध में नही थे । घर चले गये थे ।' 'उस समय उसको क्षोभ हो गया था। कारण को उघारना व्यर्थ है ! तू जानती है, यदि इन असख्य सेनापतियो में गाँठ की कोई बुद्धि होती तो इनके व्यसन न खटकते, परन्तु व्यसनी हैं और मूर्ख हैं।' 'यही बात जूही कहती है । अपने अन्य सरदार भी कहते हैं।'