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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 477

४६४ झाँसी की रानी किसी ने पूछा, 'ये लालकुर्ती वाले कौन थे ?' ^ पेशवा ने धीरे से कहा, 'कुछ बात नही। अपने ही लोग हैं। बुन्देल- खण्ड के केन्द्र झासी के हैं। ज़रा गँवार हैं।' तात्या को रानी की याद आ गई और वह काप गया, परन्तु उसने कहा कुछ नही---कह भी क्या सकता था ? उत्सव रात भर होता रहा। सवेरे खूब भंग छनी। डटकर लड्डुओं का और श्रीखंड का भोजन हुआ और फिर दिन भर सोना और रात को नाचरंग। जब जग फुरसत मिलीं तो पूछताछ हो गई कि ब्राह्मण भोजन यथाविधि चल रहा है और सेना भी खूब आनन्द मना रही है या नही। बस यही अबाध क्रम। लड्डू और श्रीखंड खाते खाते बहुत ब्राह्मण बीमार पड गये। उनमें से एक नारायण शास्त्री था। छोटी ने उसकी इतनी सेवा सुश्रूषा की कि वह शीघ्र अच्छा हो गया। गाठ में थोड़ासा पैसा कर लेने की इच्छा से छोटी ने भी पेशवा के दरबार मे नृत्य करने का निश्चय किया। नारायण ने मना किया, 'में अच्छी तरह चलने फिरने योग्य होते ही बहुत धन कमा लूँगा। तुम इन सरदारो के उत्सव में नाचने मत जाओ। ये लोग बडे कुरुचिपूर्ण हैं।' छोटी ने प्रश्न किया, 'मुझ पर आपको क्या भरोसा नही है ?' नारायण—'भरोसा तो पूरा है छोटी, परन्तु यह काम जघन्य है।' छोटी—'जब पलटनो में नाचती गाती थी, तब वह काम श्रेष्ठ था।' नारायण—'उसका मतलब ऊँचा था।' छोटी—'पास मे रुपया पैसा कुछ नही था। आप चलने फिरने लायक कुछ देर में हो पावेंगे। मे आज के ही नाच में काफी पैसा ले आऊँगी। मन ऊँचा बना रहे तो कोई काम नीचा नही।' शास्त्री को छोटी का हठ निभाना पडा। छोटी सुन्दर वेश में पेशवा के उत्सव में पहुच गई और उसका नाच गाना हुआ।