भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 478

लक्ष्मीबाई ४६५ गाना उसका बहुत साधारण श्रेणी का था । उसकी विशेषता केवल उसका सुरीला और मधुर कण्ठ थी । नृत्य भी उसका एक बधे हुये प्रकार का था । लय ज़रूर बहुत द्रुत थी । सुन्दर थी, इसलिये उसको टोका नही गया । उसके सीधे साधे गाने और नाचने पर रावसाहब मुग्ध हो गया । अच्छा पुरस्कार दिया । बोला, 'तुम क्या यही की रहने वाली हो ? तुम्हारा नृत्य शास्त्रीय ढङ्ग का न होने पर भी निराला है । तुम बराबर नाचने आया करो ।' छोटी ने उत्तर दिया, 'सरकार मै झाँसी की रहने वाली हू । लश्कर में कुछ समय से हूँ ।' तात्या छोटी को बडी देर से देख रहा था । पहिचानने की चेष्टा कर रहा था । अब उसको भ्रम न रहा । तात्या ने रावसाहब से कहा, 'यह जाति की मेहतरानी है श्रीमन्त ।' पेशवा—'मेहतरानी !' तात्या—'सरकार ।' पेशवा—'तो भी क्या हुआ ? उसके पास विद्या है । नाचती क्या है, जादू डालती है ।' तात्या—'यह नारायण शास्त्री के साथ झाँसी से भागी थी ।' पेशवा—'नारायण शास्त्री के साथ ! ब्राह्मण को पतित करके !!' रावसाहब का कला-प्रेम समाप्त हो गया । क्रुद्ध स्वर में बोला, 'तूने यहाँ आने की कैसे हिम्मत की ?' छोटी—'जैसे पलटनो में जाने की, देश का कार्य करने की करती थी ।' पेशवा ने तात्या की ओर देखा । तात्या ने कहा, 'पल्टनो में जागृति फैलाने का काम तो इसने ग्वालियर में बहुत किया है ।' पेशवा—'तो क्या हुआ ? अब जो कुछ कर रही है और जो कुछ इसने झाँसी में किया, वह दण्डनीय है ।