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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४६६ झाँसी की रानी छोटी ने अदम्य भाव से कहा, 'मुझको दण्ड और इनाम जो कुछ मिलना था, पा चुकी।' पेशवा--'तू ग्वालियर में नही रह सकती। यहाँ मेरा राज्य है। तुरन्त खाली कर।' छोटी--'कहा जाऊँ?' पेशवा--'चाहे जहा। अङ्गरेजो के राज्य में।' छोटी--'जाती हूँ। परन्तु अङ्गरेजो के राज्य मे नही जाऊँगी, क्योकि वे लोग हमको क्षमा नही करेगे।' छोटी चली आई। नारायण को पुरस्कार के रुपये दिये और सब हाल सुनाया। पहले तो उसको बहुत क्षोभ आया। बोला, 'इन अपवित्र रुपयो को नही लूँगा। चलो छोटी, ऐसी जगह चले जहा पेशवा का अत्याचार पीछा न कर सके।' छोटी ने कहा, 'रुपये अपवित्र नही हैं। पसीना बहाकर लाई हू। पेशवा का राज्य सारे संसार मे नही है।' नारायण--'परन्तु जातपात का राज्य तो है।' छोटी--'आप कहा करते हैं कि वैष्णव हो जाने पर जातपात का भूत भाग जाता है।' नारायण--'मै गलत नही कहता हूँ। चलो। यही वेश हमारी रक्षा करेगा।' वे दोनो चले गये, और फिर पेशवा को उनका पता नही लगा। उधर रोज को पहली जून के दिन ही, खबर मिल गई कि 'बलवाई' ग्वालियर की ओर बढते जा रहे हैं। कालपी की जीत के उपरान्त वह छुट्टी लेकर बम्बई जा रहा था। इस खबर के पाते ही उसने अपनी छुट्टी काट दी और जगह जगह से दलपतियो को ग्वालियर की ओर बढने का आग्रह-समाचार भेज दिया। चार जून को उसे समाचार मिला कि

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