झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 476, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंपेशवा ने आज्ञा दी, 'गायन और नृत्य के साथ पूरा हाव-भाव तो दिखलाओ।' उन्होंने ब्योरे के साथ विविध प्रकार का हावभाव प्रदर्शन आरम्भ किया। जूही मन लगा कर देख रही थी। गायन के तोडो को वह सूक्ष्मता के साथ जांच रही थी। ताल की परनो के साथ उसके पैर की उङ्गलिया घूम जाती थी और सम पर सिर हिल जाता था। एक जगह नर्तकी पखावजी के विलक्षण कौशल के कारण क्षण के एक अंश के पहले ही सम पर घुंघरू ठुमका गई। जूही ने त्योरी बदल कर मुह बिचकाया। तात्या ध्यान के साथ नर्तकी के सुन्दर रूप, कलापूर्ण नृत्य, मनमोही हावभाव प्रदर्शन पर आंख गडाये था। जूही ने तात्या के इस ध्यान को परखा। एक बडी ग्लानि उसके मन मे उठी। देशमुख, रघुनाथसिंह और गुलमुहम्मद पास पास बैठे। गुलमुहम्मद ने धीरे से कहा, 'बाई यह सब बडा अजीब है। हमारे यहाँ तो ऐसा कोई नई नाचता।' देशमुख — 'ग्वालियर इन बातो के लिये मशहूर है।' गुलमुहम्मद — 'लेकिन अगर अङ्गरेज़ इस वक्त आ जाय तो।' देशमुख — 'तो सबको भागना पडेगा।' रघुनाथसिंह — 'और बचेगा कोई नही।' गुलमुहम्मद — 'बहुत देख लिया। हमारा तो पेट भर गया। हमारा रानी सो गया होगा। छावनी अकेला है। चल्लबी बाई।' जूही ने सुन लिया। चलने के प्रस्ताव का समर्थन किया। पेशवा से माफी मागी। इजाजत ली। तात्या ने जूही की ओर देखा। उसने एक करारी त्योरी ली और अभिमान के साथ सिर फेर लिया। ये सब वहा से अपनी छावनी चले आये। थोडे क्षण के लिये उत्सव बन्द हो गया। बीच के इस विक्षेप के कारण रसियो को बहुत बुरा लगा।