भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४६२ झाँसी की रानी

मङ्गलध्वनि के साथ सिंहासनारूढ हो गया । सरदारो ने ताजीम दी । पेशवा ने उनका अभिनन्दन किया और खिलते बख्शी । अष्टप्रधान और एक प्रधान मन्त्री मुकर्रर किये । तात्या टोपे को प्रधान सेनापति । अपने फौजियो को बीस लाख रुपया इनाम बाटा । असंख्य ब्राह्मणो के भोजन का प्रबन्ध करवाया सहस्रो व्यक्तियो को तो रसोई बनाने के लिये ही नियुक्त करना पडा । भङ्ग-बूटी और शकर बादाम की पूरी योजना कार्यान्वित हुई ! आनन्द के इस तूफान में यदि कोई नही पडा तो लक्ष्मीबाई और उनके पाच नायक—उनकी लालकुर्ती सेना अवश्य इनाम की भागी बनी । ग्वालियर का गायन-वादन शताब्दियो से प्रसिद्ध रहा है । इसलिये उसका अखण्ड उपयोग किया जाने लगा । नृत्य और गायन से दिन और रात ओतप्रोत हो गये । ग्वालियर की ऐसी कोई भी नर्तकी और गायिका न थी जिसको अपने कलाकौशल के दिखलाने का काफी अवसर और समय न मिला हो । कवि सम्मेलन और मुशायरे भी हुये जिनमें कवि- कल्पना ने शब्दो के पुल बाघ बाघकर, जिमीन आसमान एक कर दिये । कोई पेशवा की तुलना रामचन्द्र जी के साथ कर रहा था और कोई इन्द्र के साथ । दूसरी ओर भाडो की नकले जारी थी, जिनसे परिहास और अट्टहास के फव्वारे छूट रहे थे । रानी किसी उत्सव मे शामिल नही होती थी । इस वैराग्य वृत्ति के कारण उनको उत्सवो में बुलाया ही नही जाता था । तात्या के मन के कोने में से एक दबी हुई वासना उभड पडी और वह भी अपने स्वामी पेशवा के साथ नृत्य-गान के रस में डूब गया । नृत्य-गान के एक बडे उत्सव में रानी के सरदारो को हठपूर्वक बुलाया गया । रानी ने अनुमति दे दी । मुन्दर नही गई । बाकी गये । उत्सव में ग्वालियर की चुनी हुई प्रसिद्ध नर्तकियां और गायिकाये बुलाई गई । गायन के साथ साथ नृत्य भी हुआ ।