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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 474

लक्ष्मीबाई ४६१ [ ८५ ] राजा के आगरा चले जाने पर रानियां नरवर के किले में चली गई । पेशवाई सेना ने हर्ष और गर्व के साथ नगर में प्रवेश किया । ग्वालियर की बिखरी हुई फौज एकत्र हो गई, उसने पेशवा को तोपों की सलामी दी और उसकी अधीनता में आगई । पेशवा बड़े ठाट के साथ माङ्गलिक वाद्य बजवाता हुआ, सिंधिया के राजमहल में पहुंचा और वहीं डेरा डाला । रानी लक्ष्मीबाई ने अपना शिविर नौलखा बाग़ में रक्खा । पेशवा के साथी सरदार शहर के भिन्न भिन्न महलों में जा उतरे । तात्या के दस्ते के लिये किले वालों ने फाटक खोल दिये । बहुत सी सामग्री हाथ आगई । किले पर पेशवा का झण्डा फहराने लगा । सिन्धिया का खजाना कब्जे में आ गया । अब पेशवा के बराबर था ही कौन ? पेशवाई सेना के कम्पनी-विद्रोही भाग ने रेजीडेन्सी में आग लगाई और उसका माल-असबाब लूट लिया । दीवान दिनकरराव सरदार बलवन्तराव और सरदार माहुरकर की हवेलियों को भी, जो अङ्गरेजों के पक्षपाती थे, खाक कर दिया । एक बार मन का बन्धेज उठा कि फिर उसमें सीमाओं की पहिचान न रही - शहर का लूटना भी आरम्भ कर दिया । परन्तु पेशवा को ठीक समय पर मालूम हो गया । उसने तात्या को भेजकर यह लूटमार बन्द करवा दी । ग्वालियर के दरबारी पेशवा के अनुकूल थे और जनता का मन उसके साथ था । विजय के हर्ष और गर्व ने उसकी छाती और दिमाग को फुला दिया था, इसलिये कायदे के साथ सिंहासनारूढ होने का निश्चय किया । ज्योतिषियों ने मुहूर्त शोध दिया । पेशवा की स्वराज्य- कामना अपने निज के उत्थान के रूप में पलट गई । तीसरी जून को फूलबाग़ में एक विशाल दरबार किया गया । पेशवा ने राजसी कपड़े पहिने । कानों में मोतियों के चौकड़े, गले में मोती-जवाहरों के कंठे । शान के साथ चोबदारों के प्रणाम लेता हुआ,