झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
लक्ष्मीबाई ४६१ [ ८५ ] राजा के आगरा चले जाने पर रानियां नरवर के किले में चली गई । पेशवाई सेना ने हर्ष और गर्व के साथ नगर में प्रवेश किया । ग्वालियर की बिखरी हुई फौज एकत्र हो गई, उसने पेशवा को तोपों की सलामी दी और उसकी अधीनता में आगई । पेशवा बड़े ठाट के साथ माङ्गलिक वाद्य बजवाता हुआ, सिंधिया के राजमहल में पहुंचा और वहीं डेरा डाला । रानी लक्ष्मीबाई ने अपना शिविर नौलखा बाग़ में रक्खा । पेशवा के साथी सरदार शहर के भिन्न भिन्न महलों में जा उतरे । तात्या के दस्ते के लिये किले वालों ने फाटक खोल दिये । बहुत सी सामग्री हाथ आगई । किले पर पेशवा का झण्डा फहराने लगा । सिन्धिया का खजाना कब्जे में आ गया । अब पेशवा के बराबर था ही कौन ? पेशवाई सेना के कम्पनी-विद्रोही भाग ने रेजीडेन्सी में आग लगाई और उसका माल-असबाब लूट लिया । दीवान दिनकरराव सरदार बलवन्तराव और सरदार माहुरकर की हवेलियों को भी, जो अङ्गरेजों के पक्षपाती थे, खाक कर दिया । एक बार मन का बन्धेज उठा कि फिर उसमें सीमाओं की पहिचान न रही - शहर का लूटना भी आरम्भ कर दिया । परन्तु पेशवा को ठीक समय पर मालूम हो गया । उसने तात्या को भेजकर यह लूटमार बन्द करवा दी । ग्वालियर के दरबारी पेशवा के अनुकूल थे और जनता का मन उसके साथ था । विजय के हर्ष और गर्व ने उसकी छाती और दिमाग को फुला दिया था, इसलिये कायदे के साथ सिंहासनारूढ होने का निश्चय किया । ज्योतिषियों ने मुहूर्त शोध दिया । पेशवा की स्वराज्य- कामना अपने निज के उत्थान के रूप में पलट गई । तीसरी जून को फूलबाग़ में एक विशाल दरबार किया गया । पेशवा ने राजसी कपड़े पहिने । कानों में मोतियों के चौकड़े, गले में मोती-जवाहरों के कंठे । शान के साथ चोबदारों के प्रणाम लेता हुआ,
४६२ झाँसी की रानी
मङ्गलध्वनि के साथ सिंहासनारूढ हो गया । सरदारो ने ताजीम दी । पेशवा ने उनका अभिनन्दन किया और खिलते बख्शी । अष्टप्रधान और एक प्रधान मन्त्री मुकर्रर किये । तात्या टोपे को प्रधान सेनापति । अपने फौजियो को बीस लाख रुपया इनाम बाटा । असंख्य ब्राह्मणो के भोजन का प्रबन्ध करवाया सहस्रो व्यक्तियो को तो रसोई बनाने के लिये ही नियुक्त करना पडा । भङ्ग-बूटी और शकर बादाम की पूरी योजना कार्यान्वित हुई ! आनन्द के इस तूफान में यदि कोई नही पडा तो लक्ष्मीबाई और उनके पाच नायक—उनकी लालकुर्ती सेना अवश्य इनाम की भागी बनी । ग्वालियर का गायन-वादन शताब्दियो से प्रसिद्ध रहा है । इसलिये उसका अखण्ड उपयोग किया जाने लगा । नृत्य और गायन से दिन और रात ओतप्रोत हो गये । ग्वालियर की ऐसी कोई भी नर्तकी और गायिका न थी जिसको अपने कलाकौशल के दिखलाने का काफी अवसर और समय न मिला हो । कवि सम्मेलन और मुशायरे भी हुये जिनमें कवि- कल्पना ने शब्दो के पुल बाघ बाघकर, जिमीन आसमान एक कर दिये । कोई पेशवा की तुलना रामचन्द्र जी के साथ कर रहा था और कोई इन्द्र के साथ । दूसरी ओर भाडो की नकले जारी थी, जिनसे परिहास और अट्टहास के फव्वारे छूट रहे थे । रानी किसी उत्सव मे शामिल नही होती थी । इस वैराग्य वृत्ति के कारण उनको उत्सवो में बुलाया ही नही जाता था । तात्या के मन के कोने में से एक दबी हुई वासना उभड पडी और वह भी अपने स्वामी पेशवा के साथ नृत्य-गान के रस में डूब गया । नृत्य-गान के एक बडे उत्सव में रानी के सरदारो को हठपूर्वक बुलाया गया । रानी ने अनुमति दे दी । मुन्दर नही गई । बाकी गये । उत्सव में ग्वालियर की चुनी हुई प्रसिद्ध नर्तकियां और गायिकाये बुलाई गई । गायन के साथ साथ नृत्य भी हुआ ।
पेशवा ने आज्ञा दी, 'गायन और नृत्य के साथ पूरा हाव-भाव तो दिखलाओ।' उन्होंने ब्योरे के साथ विविध प्रकार का हावभाव प्रदर्शन आरम्भ किया। जूही मन लगा कर देख रही थी। गायन के तोडो को वह सूक्ष्मता के साथ जांच रही थी। ताल की परनो के साथ उसके पैर की उङ्गलिया घूम जाती थी और सम पर सिर हिल जाता था। एक जगह नर्तकी पखावजी के विलक्षण कौशल के कारण क्षण के एक अंश के पहले ही सम पर घुंघरू ठुमका गई। जूही ने त्योरी बदल कर मुह बिचकाया। तात्या ध्यान के साथ नर्तकी के सुन्दर रूप, कलापूर्ण नृत्य, मनमोही हावभाव प्रदर्शन पर आंख गडाये था। जूही ने तात्या के इस ध्यान को परखा। एक बडी ग्लानि उसके मन मे उठी। देशमुख, रघुनाथसिंह और गुलमुहम्मद पास पास बैठे। गुलमुहम्मद ने धीरे से कहा, 'बाई यह सब बडा अजीब है। हमारे यहाँ तो ऐसा कोई नई नाचता।' देशमुख — 'ग्वालियर इन बातो के लिये मशहूर है।' गुलमुहम्मद — 'लेकिन अगर अङ्गरेज़ इस वक्त आ जाय तो।' देशमुख — 'तो सबको भागना पडेगा।' रघुनाथसिंह — 'और बचेगा कोई नही।' गुलमुहम्मद — 'बहुत देख लिया। हमारा तो पेट भर गया। हमारा रानी सो गया होगा। छावनी अकेला है। चल्लबी बाई।' जूही ने सुन लिया। चलने के प्रस्ताव का समर्थन किया। पेशवा से माफी मागी। इजाजत ली। तात्या ने जूही की ओर देखा। उसने एक करारी त्योरी ली और अभिमान के साथ सिर फेर लिया। ये सब वहा से अपनी छावनी चले आये। थोडे क्षण के लिये उत्सव बन्द हो गया। बीच के इस विक्षेप के कारण रसियो को बहुत बुरा लगा।
४६४ झाँसी की रानी किसी ने पूछा, 'ये लालकुर्ती वाले कौन थे ?' ^ पेशवा ने धीरे से कहा, 'कुछ बात नही। अपने ही लोग हैं। बुन्देल- खण्ड के केन्द्र झासी के हैं। ज़रा गँवार हैं।' तात्या को रानी की याद आ गई और वह काप गया, परन्तु उसने कहा कुछ नही---कह भी क्या सकता था ? उत्सव रात भर होता रहा। सवेरे खूब भंग छनी। डटकर लड्डुओं का और श्रीखंड का भोजन हुआ और फिर दिन भर सोना और रात को नाचरंग। जब जग फुरसत मिलीं तो पूछताछ हो गई कि ब्राह्मण भोजन यथाविधि चल रहा है और सेना भी खूब आनन्द मना रही है या नही। बस यही अबाध क्रम। लड्डू और श्रीखंड खाते खाते बहुत ब्राह्मण बीमार पड गये। उनमें से एक नारायण शास्त्री था। छोटी ने उसकी इतनी सेवा सुश्रूषा की कि वह शीघ्र अच्छा हो गया। गाठ में थोड़ासा पैसा कर लेने की इच्छा से छोटी ने भी पेशवा के दरबार मे नृत्य करने का निश्चय किया। नारायण ने मना किया, 'में अच्छी तरह चलने फिरने योग्य होते ही बहुत धन कमा लूँगा। तुम इन सरदारो के उत्सव में नाचने मत जाओ। ये लोग बडे कुरुचिपूर्ण हैं।' छोटी ने प्रश्न किया, 'मुझ पर आपको क्या भरोसा नही है ?' नारायण—'भरोसा तो पूरा है छोटी, परन्तु यह काम जघन्य है।' छोटी—'जब पलटनो में नाचती गाती थी, तब वह काम श्रेष्ठ था।' नारायण—'उसका मतलब ऊँचा था।' छोटी—'पास मे रुपया पैसा कुछ नही था। आप चलने फिरने लायक कुछ देर में हो पावेंगे। मे आज के ही नाच में काफी पैसा ले आऊँगी। मन ऊँचा बना रहे तो कोई काम नीचा नही।' शास्त्री को छोटी का हठ निभाना पडा। छोटी सुन्दर वेश में पेशवा के उत्सव में पहुच गई और उसका नाच गाना हुआ।
लक्ष्मीबाई ४६५ गाना उसका बहुत साधारण श्रेणी का था । उसकी विशेषता केवल उसका सुरीला और मधुर कण्ठ थी । नृत्य भी उसका एक बधे हुये प्रकार का था । लय ज़रूर बहुत द्रुत थी । सुन्दर थी, इसलिये उसको टोका नही गया । उसके सीधे साधे गाने और नाचने पर रावसाहब मुग्ध हो गया । अच्छा पुरस्कार दिया । बोला, 'तुम क्या यही की रहने वाली हो ? तुम्हारा नृत्य शास्त्रीय ढङ्ग का न होने पर भी निराला है । तुम बराबर नाचने आया करो ।' छोटी ने उत्तर दिया, 'सरकार मै झाँसी की रहने वाली हू । लश्कर में कुछ समय से हूँ ।' तात्या छोटी को बडी देर से देख रहा था । पहिचानने की चेष्टा कर रहा था । अब उसको भ्रम न रहा । तात्या ने रावसाहब से कहा, 'यह जाति की मेहतरानी है श्रीमन्त ।' पेशवा—'मेहतरानी !' तात्या—'सरकार ।' पेशवा—'तो भी क्या हुआ ? उसके पास विद्या है । नाचती क्या है, जादू डालती है ।' तात्या—'यह नारायण शास्त्री के साथ झाँसी से भागी थी ।' पेशवा—'नारायण शास्त्री के साथ ! ब्राह्मण को पतित करके !!' रावसाहब का कला-प्रेम समाप्त हो गया । क्रुद्ध स्वर में बोला, 'तूने यहाँ आने की कैसे हिम्मत की ?' छोटी—'जैसे पलटनो में जाने की, देश का कार्य करने की करती थी ।' पेशवा ने तात्या की ओर देखा । तात्या ने कहा, 'पल्टनो में जागृति फैलाने का काम तो इसने ग्वालियर में बहुत किया है ।' पेशवा—'तो क्या हुआ ? अब जो कुछ कर रही है और जो कुछ इसने झाँसी में किया, वह दण्डनीय है ।
४६६ झाँसी की रानी छोटी ने अदम्य भाव से कहा, 'मुझको दण्ड और इनाम जो कुछ मिलना था, पा चुकी।' पेशवा--'तू ग्वालियर में नही रह सकती। यहाँ मेरा राज्य है। तुरन्त खाली कर।' छोटी--'कहा जाऊँ?' पेशवा--'चाहे जहा। अङ्गरेजो के राज्य में।' छोटी--'जाती हूँ। परन्तु अङ्गरेजो के राज्य मे नही जाऊँगी, क्योकि वे लोग हमको क्षमा नही करेगे।' छोटी चली आई। नारायण को पुरस्कार के रुपये दिये और सब हाल सुनाया। पहले तो उसको बहुत क्षोभ आया। बोला, 'इन अपवित्र रुपयो को नही लूँगा। चलो छोटी, ऐसी जगह चले जहा पेशवा का अत्याचार पीछा न कर सके।' छोटी ने कहा, 'रुपये अपवित्र नही हैं। पसीना बहाकर लाई हू। पेशवा का राज्य सारे संसार मे नही है।' नारायण--'परन्तु जातपात का राज्य तो है।' छोटी--'आप कहा करते हैं कि वैष्णव हो जाने पर जातपात का भूत भाग जाता है।' नारायण--'मै गलत नही कहता हूँ। चलो। यही वेश हमारी रक्षा करेगा।' वे दोनो चले गये, और फिर पेशवा को उनका पता नही लगा। उधर रोज को पहली जून के दिन ही, खबर मिल गई कि 'बलवाई' ग्वालियर की ओर बढते जा रहे हैं। कालपी की जीत के उपरान्त वह छुट्टी लेकर बम्बई जा रहा था। इस खबर के पाते ही उसने अपनी छुट्टी काट दी और जगह जगह से दलपतियो को ग्वालियर की ओर बढने का आग्रह-समाचार भेज दिया। चार जून को उसे समाचार मिला कि
लक्ष्मीबाई ४६७ ग्वालियर का पतन हो गया और राजा तथा दिनकरराव आगरा भाग गये । सन्नाटे में आ गया । कालपी की इतनी बडी और बुरी पराजय के उपरान्त भी ग्वालियर हस्तगत करने का विचार और साहस कौन कर सकता था ? कौन इतना बडा मन्सूबा गाठ सकता था ? किसमें इतना बडा हौसला था ? रोज़ ने सोचा, 'झाँसी की रानी के सिवाय और कोई नही हो सकता । जब तक रानी को नही पकडा या मारा तब तक हिन्दुस्थान में हमारे राज्य की खैरियत नही ।' दृढ़ता के साथ रोज़ अपने काम में जुट गया ।
४६८ झांसी की रानी
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इन उत्सवो का प्रतिरोध करने के लिये रानी ने पेशवा से भेट करने का प्रयत्न किया, परन्तु वहाँ नाच से छुट्टी मिली तो भग और निद्रा, और भग निद्रा से निस्तार पाया तो नाचरग । तात्या इस नाचरंग में डूब तो गया ही, उसको यह घमड भी हो गया कि कोई भी अङ्गरेज जनरल उसका मुकाबला नही कर सकता । निदान एक दिन तीसरे पहर रानी को ऐश्वर्य प्रमत्त पेशवा से थोडी देर की भेट प्राप्त हो गई । रानी उदास थी और क्षुब्ध । पेशवा सोकर उठा था । रात की खुमारी और सवेरे की भग की छाया अब भी शेष थी । आंखे लाल थी और शरीर अङ्गड़ाइयां चाहता था । अभिवादन के बाद उसने रानी से कहा, 'बड़ी गरमी पड रही है । न दिन चैन, न रात ।' 'कभी कभी बदली हो जाती है दस, पाच दिन मे वर्षा हो उठेगी ।' 'अभी तो नक्षत्र तप रहे हैं।' 'परन्तु इन्ही दिनो में छत्रपति और पत प्रधान सबसे अधिक पराक्रम दिखलाया करते थे ।' 'आपने भी तो इन्ही दिनो वह कर दिखलाया जो ग्वालियर के महा- राज और अङ्गरेज कभी न भूलेगे ।' 'और इन्ही दिनो हमारे आपके ऊपर विपद के वे बादल उठ रहे हैं, जो थोडे दिनो में कष्टो की मूसलाधार वरसावेगे ।' 'हमारी सेना डटकर लडेगी । तब तक पानी बरस पडेगा । नदी नाले ऐसे चढेगे कि दुश्मन हमारा कुछ भी न कर सकेगे ।' 'ये ही नदी नाले हम लोगो को भी निरुपाय और असमर्थ कर डालेगे । सेना में वैसे ही काफी अव्यवस्था है । फिर तो वह अकर्मण्य होकर निस्तेज ही हो जायगी ।' 'अपने पास इतना वडा किला तो है, वाईसाहब ।' 'और यदि किला छिन गया तो ?'
लक्ष्मीबाई ४६६ 'तब निस्सन्देह हम लोग सब व्यर्थ हो जायेगे।' अङ्गरेजो की पलटने सब दिशाओ से अपने ऊपर टूटने के लिये आ रही हैं। थोडा-सा ही समय रह गया है। अपनी सेना को छावनी-बन्द कीजिये। कायदा वर्तिये। किले मे बन्द होकर लडने की बात मत सोचिये। अंग्रेजी फौज का आगे बढकर सामना कीजिये। और सबसे प्रथम सिन्धिया की इस सेना को अपने सरदारो में बाटकर कडा अनुशासन जारी कर दीजिये।' 'हो जायगा बाईसाहब, सब हो जायगा। इस समय भी कुछ आवश्यक काम ही हो रहा है। धर्म की नीव पर ही सब कुछ टिकता है। धर्म ही विजय का कारण होता है। इसलिये धर्म कराया जा रहा है। ब्राह्मण भोजन से विजय का आशीर्वाद मिलेगा। दूर दूर के ब्राह्मण, भोजन और दक्षिणा के लिये उमडे चले आ रहे हैं। इनका आशीर्वाद क्या विफल जायगा ?' 'में नही कहती कि ब्राह्मण भोजन मत करवाइये, परन्तु सेना के सुप्रबन्ध और आगे बढकर अग्रेज़ो से मोर्चे ले लेने के सगठन को उतना ही महत्व तो दीजिये।' 'आप हैं। तात्या है। वादा के नवाब साहब हैं। आप लोगो के रहते अंग्रेज हमारा क्या बिगाड सकते हैं ?' अँग्रेज अत्यन्त चालाक और उद्योग शील हैं। जो समय आप नाच रग को देते हैं, उस समय को वे लोग अपनी योजनाओ के सृजन में व्यस्त करते हैं।' 'अपनी योजनाये तो बनी बनाई रक्खी हैं। और क्या करना है ? एक बात शेष थी, वह हो गई। जनता और फौज राजा के सिवाय और किसी का नायकत्व ग्रहण नही करती, सो मैने पेशवाई स्वीकार कर ली है। जब तक ऐसा न करता तब तक जनसामान्य मुझको एक साधारण जन समझता और हम लोगो के नायकत्व को मानता ही नही।' 'आप में ये बडे परिवर्तन देखकर मुझको अचम्भा होता है।'
४७० झांसी की रानी कौन से परिवर्तन ?' 'भग, नाच रग, दिन में दीर्घ निद्रा ।' 'बाईसाहब, पेशवाई स्वीकार करने के बाद उत्सवो का, दरबारो का करना अनिवार्य हो गया । अन्यथा लोग कहते, ये कैसे राजाओ के राजा, जो चुपचाप सिंहासन पर बैठकर, चुपचाप महल में जा बैठे । यहा के सरदार नृत्यगान के लालची हैं । उनका मन भरना आवश्यक था । करना पड़ा । इन सरदारो की सहानुभूति के बिना काम नही बनता ।' 'कितने दिन और चलेगा यह सब ?' 'बस थोड़े दिन, बहुत थोडे दिन । परन्तु ब्राह्मण भोजन दान पुण्य निरन्तर जारी रहेगा । धर्म के आशीर्वाद से जो स्वराज्य स्थापित होगा वह अक्षय होगा । छत्रपति भी कर्मकांड को बहुत मानते थे, सो आप भी जानती हैं, और धर्म के विषय में आपसे बात करने का मै अधिकारी ही क्या हूँ ?' 'धर्म की गति को तो महात्मा लोग ही जानते हैं । मै तो केवल यह कह सकती हू कि ब्राह्मण भोजन दान पूण्य इत्यादि के साथ सेना का तुरन्त अच्छा प्रबन्ध करिये । उन्हे कुछ काम दीजिये और उत्सव इत्यादि तुरन्त बन्द कर दीजिये ।'
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रानी के समझाने पर भी रावसाहब न मानो । भङ्ग और नाचरङ्ग का वही क्रम जारी रहा । लड्डुओं और श्रीखण्ड के लिये इतनी शकर खर्च होने लगी कि सिपाहियो को भंग के लिये उसका मिलना दुर्लभ हो गया । श्रीखण्ड के लिये दही की इतनी मांग हो गई कि मट्ठा अप्राप्य हो गया । ब्राह्मण भोजन और दान-पुन्य की आड में बेहिसाब भिखमंगी बढ गई । कोई प्रतिवन्ध या प्रबन्ध न था, इसलिये अनेक सिपाही भी इस मुफ्तखोरी में सन गये । रानी लक्ष्मीबाई ने देखा कि जब वे अपने किले में घिर गई थी तब स्वतन्त्र थी, और ग्वालियर में स्वच्छन्द होते हुये भी उनकी दशा एक कैदी की सी है । रानी का स्वभाव था कि वे जहा जाती थी, उसके चौगिर्द का बारीकी के साथ निरीक्षण करती थी । इस निरीक्षण से उनको युद्ध के लिये मोर्चे बनाने में बडी सुविधा होती थी । उनकी रणनीति में इस क्रिया का विशेष स्थान था । उन्होने देखा कि ग्वालियर का किला और पश्चिम-दक्षिण की पहाडिया ग्वालियर की बस्ती और लश्कर के नगर की अच्छी रक्षा कर सकती हैं । पूर्व की ओर पहाडियो का सिलसिला लश्कर से लगभग दो मील पड़ता था—यह भी रक्षा का साधन हो सकता था, परन्तु उत्तर- पूर्व में मुरार की ओर दिशा खुली पडी थी । उसको ढकने के लिये सोनरेखा नाम का केवल एक नाला था, जो लश्कर को तीन ओर से घेर कर कतराता हुआ मुरार की ओर चला गया था । परन्तु यह कोई बडा साधन न था, उल्टे कुछ अडचन डाल सकता था । इसके सिवाय दक्षिणवर्ती पहाडियो का क्रम, जिसके अगले भाग पर दुर्गा का मन्दिर था, शत्रुओ के लिये भी लाभदायक हो सकता था, और, पूर्व की ओर की पहाडिया यदि शत्रु की तोपो के लिये मिल जायें तो लश्कर का नगर और
४७२ झांसी की रानी ग्वालियर तथा मुरार की बस्तिया पूरे सङ्कट में आ जायें। उनकी इच्छा थी कि यदि पेशवा की सेना के दस्ते सब ओर से बढती हुई आने वाली अंग्रेजी सेनाओ का आगे जाकर मुकाबला न करे तो कम से कम इन पहाडियो पर यथास्थान तोपखाने तो लगा लें। परन्तु वहाँ भङ्ग की तरङ्ग और श्रीखण्ड की अखण्डता में उनकी सुनता ही कौन था ? इस निरीक्षण के सिलसिले में उनको एक बाबा गङ्गादास का पता चला। इनकी कुटी सोन रेखा नाले से उत्तर की ओर कुछ दूरी पर हटकर थी—किले के दक्षिणी छोर से पूर्व की दिशा में। बाबा गङ्गादास की कुटी फूस और लकड़ी छान-छप्पर की थी। निरीक्षण करते करते रानी को प्यास लगी। बाबा ने पानी पिलाया। उस समय उनको मालूम हुआ कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई हैं। उन्होने बाबा की आँखो में शान्ति का एक अद्भुत आकर्षण देखा। पेशवा के अनसुनी कर देने के दिन से उनका मन खिन्न सा रहने लगा था। निरीक्षण करती थी, लडाई के नक्शे बनाती थी, अपने सिपाहियो की कवायद-परेड करती थी, और समय पर पूजन ध्यान करती थी, परन्तु मन का अनमनापन नही जाता था। सन्ध्या होने में विलम्ब था। लू तेज चल रही थी। रानी मुन्दर के साथ स्त्री-वेश में बाबा गङ्गादास की कुटी पर पहुँची। घोडे एक पेड से बाध दिये गये। बाबा के सामने पहुच कर नमस्कार किया। बाबा ने आसन दिया। ठण्डा पानी पिलाया। रानी ने कहा, 'मै आपसे कुछ पूछने आई हू। मेरा मन अशान्त है। आपके उत्तर से शान्ति मिलने की आशा है।' बाबा बोले, 'मैं रामभजन के सिवाय और कुछ जानता ही नही हूँ।' रानी—'आप ब्राह्मण-भोजन में गये?' बाबा—'नही गया। यही बहुत खाने को मिल जाता है।' रानी—'इसीलिये आपके पास आई। आप टाल नही सकेगे।
लक्ष्मीबाई ४७३
बतलाना होगा । आपने अकेले अपने मन को शान्त कर लिया तो क्या हुआ ? हम लोगो को भी शान्ति दीजिये ।' बाबा—'पूछो बेटी । यदि समझ में आ जायगा तो बतला दूंगा ।' रानी—'यहा थोडे दिनो में युद्ध होने वाला है । आपकी कुटी का स्थान रक्षित नही है । किसी सुरक्षित स्थान में चले जाइये ।' बाबा—'सुरक्षित है । बात पूछो ।' रानी —'इस देश को स्वराज्य कैसे प्राप्त होगा ?' बाबा—'इस प्रश्न का उत्तर तो राजा लोग दे सकते हैं ।' रानी—'नही दे सकते, तभी आपसे पूछने आई हूँ ।' बाबा—'जैसे प्राप्त होता आया है, वैसे ही होगा ।' रानी—'कैसे बाबा जी ?' बाबा—'सेवा, तपस्या, बलिदान से ।' रानी—'हम लोग कैसे स्वराज्य स्थापित कर पावेगे ?' बाबा—'गड्ढे कैसे भरे जाते हैं ? नीव कैसे पूरी जाती है ? एक पत्थर गिरता है, फिर दूसरा, फिर तीसरा ओर चौथा, इसी प्रकार ओर । तब उसके ऊपर भवन खडा होता है । नींव के पत्थर भवन को नही देख पाते परन्तु भवन खडा होता है उन्ही के भरोसे--जो नींव में गडे हुये है । वह गड्ढा या नींव एक पत्थर से नही भरी जाती । और, न एक दिन में । अनवरत प्रयत्न, निरन्तर बलिदान आवश्यक है ।' रानी—'हम लोगो के जीवनकाल में स्वराज्य स्थापित हो जायगा ?' बाबा—'यह मोह क्यो ? तुमने आरम्भ किये हुये कार्य को आगे बढा दिया है । अन्य लोग आयेंगे । वे इसको बढाते जायंगे । अभी कसर है । स्वराज्य स्थापना के आदर्शवादी अपने अपने छोटे छोटे राज्य बनाकर बैठ जाते हैं । जनता और उनके बीच का अन्तर नही मिटता— घटता ही बहुत कम है । जनता त्रस्त बनी रहती है । जब जनता का पूरा सहयोग राज्य को प्राप्त हो जाय और राजा टीमटाम तथा विलासिता का दासत्व छोडकर प्रजा का सेवक बन जाय तब जानो स्वराज्य की नीव भर
४७४ झांसी की रानी गई और भवन बनना आरम्भ हो गया । शाश्वत धर्म का रूप बिगड गया है । इसके सुधार के बिना वह भवन खडा न हो पायगा ।' रानी—'हम लोग प्रयत्न करते रहे ?' बाबा—'अवश्य । तुम तो भगवान कृष्ण और गीता की भक्त हो ।' रानी—'आपने कैसे जाना ?' बाबा मुस्कुराये । बोले, 'सब कहते हैं ।' रानी—'मै पाठ करती हूँ, परन्तु समझते तो आप महात्मा लोग ही है ।' बाबा—'गृहस्थ से बढकर और कोई साधू नही । मुझसे कुछ और नही हो सका, इसलिये कुटी बना ली ।' सूर्यास्त होने को आया । रानी को सन्ध्या-ध्यान का स्मरण हुआ । कहा, 'बाबा जी, फिर कभी दर्शन करूँगी । आपकी इतनी बात से चित्त को बहुत शान्ति मिली ।' और नमस्कार करके चली गईं । मार्ग में मुन्दर ने कहा, 'सरकार भी इन्ही बातो को बतलाया करती हैं ।' 'परन्तु' रानी बोली, 'बाबा के समान होने में बहुत देर है ।'
लक्ष्मीबाई ४७५ [ ८८ ] रावसाहब पेशवा का ऐश-आराम और ब्राह्मण-भोजन जारी रहा। जनरल रोज़ के उद्योग ने पहले की अपेक्षा और अधिक सबलता पकडी। रोज़ ने अपनी सेना के कई भाग करके अनुभवी अफ़सरो के सुपुर्द किया। ब्रिगेडियर स्मिथ को ग्वालियर के पूर्व की ओर पांच मील पर कोटे की सराय भेजा। एक अफ़सर को ग्वालियर और आगरे के मार्ग पर स्वयं एक प्रबल दल लेकर कालपी से ग्वालियर की ओर ६ जून को बढा। मार्ग में उसको बिग्रेडियर स्टुअर्ट ससैन्य मिल गया। १६ जून को जनरल रोज़ बहादुरपूर ग्राम पर आ गया, जहा जयाजीराव की हार हुई थी। जनरल रोज़ के साथ मध्यभारत और ग्वालियर के पोलिटिकल एजेंट भी थे। इन्होने इस बीच में एक चाल खेली—जयाजीराव और दिनकरराव को आगरे से बुलवा लिया। मुरार में पेशवा की सेना काफी थी, बाकी इधर उधर बिखरी हुई पडी थी। इनमें से अधिकांश सैनिक सिन्धिया की सेना के ही नौकर थे। यदि ये बारह तेरह दिन नष्ट न किये गये होते और यदि इन सैनिको को विभक्त करके अपने विश्वसनीय दलपतियो की अधीनता में, शुरू से ही उनका अनुशासन मय संसर्ग स्थापित कर दिया गया होता, तो बात न बिगडती। जनरल रोज़ ने दो घंटे की कडी लडाई में पेशवा की मुरार वाली सेना को हरा दिया और मुरार को कब्जे में कर लिया। पेशवा की यह पराजित सेना भाग कर ग्वालियर आई। अब रावसाहब पेशवा का नशा फरार हुआ । रोज़ जयाजीराव द्वारा पेशवा के उन सैनिको को, जो उनकी ग्वालियर फौज के थे, माफी का आश्वासन दिलवाया और यह लिखित घोषणा प्रकाशित करवाई कि अंग्रेज़ ग्वालियर के राजा को पुनः गद्दी दिलवाने के लिये ही लडने आये हैं। सरदारो और सैनिको में फूट पड गई। उनके मन फिर गये। उत्सवो की रिश्वत बेकार गई।
४७६ झाँसी की रानी पेशवा, बांदा के नवाब किंकर्तव्य विमूढ़ हो गये । कुछ भी समझ में नही आ रहा था कि क्या करे । तब झाँसी की रानी की याद आई, परन्तु उनके पास जाने की हिम्मत नही पड़ रही थी—कैसे मुँह दिखलाएं ? तात्या को भेजा । तात्या कलेजा साधकर उनके सामने गया । उस समय उनके पास जूही और मुन्दर थी । तात्या नमस्कार करने के उपरान्त हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया । 'क्या बात है, सरदार साहब ?' रानी ने व्यङ्ग किया, 'ये तोपें कहाँ चल रही थी ?' तात्या ने विनीत भाव से कहा, 'अब क्षमा प्रार्थना तक का समय नही है, बाईसाहब ।' रानी बोली, 'क्या भंग छानने का भी समय नही ? एक तान भी सुनने के लिये समय नही ?' तात्या उनके पैरो पर गिरने को हुआ, 'रक्षा करो देवी ।' रानी ने उसको बीच में ही पकड़ लिया । जूही बोली, 'सरकार क्षमा कर दीजिये ।' रानी मुस्कराई । 'तात्या,' उन्होने कहा, 'तुम से मुझको बडी-बडी आशाएं थी । अब भी बहुत कुछ कर सकोगे, परन्तु दृढ़ हो जाओ तो ।' तात्या बोला, 'जो जो आज्ञा होगी उसका तनमन से पालन करूंगा । आपको कभी उलहने का अवसर न दूँगा ।' रानी ने उठती हुई सास को दबाकर कहा, 'मेरा कदाचित् यह अन्तिम युद्ध होगा । क्यो मुन्दर, स्मरण है बाबा गङ्गादास ने क्या कहा था ?' जूही बोली, 'कदापि नही सरकार ।'
लक्ष्मीबाई ४७७ रानी ने गभीर स्वर में कहा, 'स्वराज्य के भवन की नीव एक दो पथरो से नही भरेगी ।' तात्या अधीर होकर कातरता के साथ मुँह ताकने लगा । रानी फिर मुस्कराईं । तात्या को आश्वासन दिया, 'घबराओ नही । पेशवा से कहो कि धैर्य से काम ले । जो योजना बतलाती हू, उसके अनुसार काम करे । कदाचित् विजय प्राप्त हो जाय । न भी हो तो युद्ध सामग्री और सेना को दक्षिण की ओर ले चलने का प्रबन्ध रखना । तुम इस क्रिया के आचार्य हो ।' रानी ने तात्या को थोडे समय में भी अपनी योजना, विस्तार पूर्वक समझायी और फिर अपने पाचो सरदारो की बुद्धि में बिठलादी । ग्वालियर की पूर्वीय ओर की रक्षा का भार रानी ने स्वय लिया । पूर्वीय पहाड़ियो पर जहा तक अग्रेजो का अधिकार नही हो पाया था, तोपखाने, पीछे पैदल और रिसाले का यत्र तत्र क्रमिक मोर्चा रखा गया । सबसे आगे और बीच बीच में अपनी लालकुर्ती के सवार । अगल बगल की पहाडियो पर तोपे-दक्षिण दिशा तक । उत्तर का भार तात्या के जिम्मे किया गया । उसने रुहेली और अवधी सेना के भग्नावशेष पर अपना दस्ता बनाया था। इस दस्ते को तोपो सहित तात्या ने जमाया । पश्चिम का भार रावसाहब के ऊपर रखा गया । इसके साथ अधिकांश सिन्धिया वाली फौज थी । शहर के भीतर बाहर की रक्षा का प्रबन्ध बादा के नवाब के हाथ मे दिया गया । किले की खास रक्षा के लिये ज्यादा चिन्ता में नही पडना पड़ा । तोपें गोलन्दाज और कुछ सिपाही काफी समझे गये, क्यो कि बिना किसी बडे और विशेष कारण के किले में बन्द होकर लडना मराठी युद्ध प्रणाली के विरुद्ध था । रानी ने अपने सवारो की कवायद ली, और उनको काम की सब बातें समझा दीं । १७ जून को सवेरे ब्रिगेडियर स्मिथ ने लडाई का विगुल बजाया । लडाई आरम्भ हो गई । ब्रिगेडियर स्मिथ का आक्रमण कोटा की सराय
४७८ झांसी की रानी से शहर पर होना था, पूर्व दिशा से, जहां लक्ष्मीबाई का मोर्चा था। जैसे ही अंग्रेजी सेना रानी की तोपो की मार के भीतर आई, रानी ने गोलन्दाजो को सकेत दिया । गोलाबारी होते ही अंग्रेज़ी सेना की दुर्गति हुई और वह पीछे हटी । रानी के लालकुर्ती सवारो ने तुरन्त छापा मारा । स्मिथ ने एक चतुर चाल खेली—उसने अपनी उस टुकडी को और अधिक पीछे खीचा और रानी के सवारो को आगे बढने दिया । इन सवारो के ज्यादा आगे निकल जाने से उनका स्थान खाली हो गया । स्मिथ ने कई दिशाओ से रानी के मोर्चों पर आक्रमण किया । घमासान युद्ध हुआ। तलवार चली । लोहे ने लोहे से चिनगारिया छुटकाई । स्मिथ ने रानी के पार्श्व पर अपनी दो पल्टने और फेकी जो अभी तक चुपचाप खडी थी । रानी के सवारो को पीछे हटना पडा । ब्रिगेडियर स्मिथ ने अपने सामने की पातो को फोड कर रिसाले समेत बढने का सकल्प किया । उद्देश्य था फूल बाग पर अधिकार करने का । अपने सवारो को पीछे हटता देख कर रानी घोडे को तेज करके तुरन्त उनके समीप पहुची । गुलमुहम्मद दिखलाई दिया । उसके पास घोडा दौडा कर बढते हुये अंग्रेजो की ओर तलवार की नोक करके बोली, 'खान, आज हाथ ढीला क्यो पड रहा ?' गुलमुहम्मद चिल्लाकर बोला, 'हुजूर हमारा हाथ अब मुलाहिजा करे।' पठान सरदार चिल्लाता हुआ, रेलपेल करता हुआ, लालकुर्तियो को बढावा देता हुआ, आगे फिका । रानी साथ में । गुलमुहम्मद ने प्रखर स्वर मे रानी से प्रार्थना की, हुजूर जूही सरदार का तोपखाना ठीक करे ।' रानी लौट पडी । एक टौरिया के पीछे जूही तोपखाना की मार को जारी किये थी, परन्तु लालकुर्ती को पीछे हटा देख कर हडबडा गई थी । गोरा रिसाला उसकी ओर बढ रहा था । 'जूही,' रानी ने आदेश किया, 'तोप का मुहरा एक अंगुल नीचा कर।'
लक्ष्मीबाई ४७६ 'जो आज्ञा उसने उत्साहित होकर कहा, और अपने साथियो की सहायता से तुरन्त वैसा ही किया । 'मार,' रानी ने दूसरा आदेश दिया । तोप ने धायँ किया । गोरे सवार बिछ गये । लौट पडे । रानी दूसरे स्थल पर पहुँची । वे जहाँ पहुचती वही अपने सिपाहियो पर तेज छिटक देती । यद्यपि उनके योद्धाओ की सख्या कम थी, परन्तु वे उनके प्रति अटल विश्वास रखते थे । फिर बढे । उनकी रानी उनके साथ । दोनो हाथो एक समान कौशल और शक्ति के साथ तलवार चलाने वाली । अंग्रेज वीरता के साथ लडे और बहुत मरे । रानी के उन थोडे से लालकुर्ती सवारो ने तो कमाल ही कर दिया । यथावत् आज्ञा का पालन करते हुये उन लोगो ने अंग्रेजो के छक्के छुटा दिये । ब्रिगेडियर स्मिथ को रानी ने उस दिन की चालो में और शूरवीरी में मात दी । स्मिथ उनके व्यूह को न भेद सका । उसको लक्ष्मीबाई के मुकाबले में हार कर लौटना पडा । अंग्रेजो ने उस दिन का युद्ध बन्द करके दम ली । रानी ने उस दिन निरन्तर परिश्रम किया था और उनके सरदारो ने भी । इस पर भी उन्होने रात को काफी समय तक अथक परिश्रम किया—योजनाये सुधारी, परिवर्तित की, सलाह सम्मित दी, उनके जिन योद्धाओ ने उस दिन के युद्ध में कोई विशेष कार्य किया था, उनको शाबाशी दी, और पुरस्कार दिये । और गुलमुहम्मद को कुँवर की उपाधि प्रदान की । ग्वालियर की सेना पर जयाजीराव की उस घोषणा के कारण प्रभाव पड चुका था, परन्तु उस दिन उस सेना ने कोई ऐसा स्पष्ट काम नहीं किया जिससे उस पर तात्या या पेशवा को अविश्वास होता परन्तु रानी को सन्देह था । तात्या और रावसाहब ने निवारण किया । अविश्वास करने से अब होता भी क्या था ? लाचार होकर दूसरे दिन के युद्ध में वे ही साधन काम में लाने पडे जो उनको उपलब्ध थे ।
४८०. झांसी की रानी [ ८६ ] अठारह जून आई। ज्येष्ठ शुक्ला सप्तमी। शुक्रवार। सफेद और पीली पौ फटी। ऊषा ने अपनी मुस्कान बिखेरी। रानी स्नान-ध्यान और गीता के अठारहवे अध्याय के पाठ से निबट चुकी। झींगुरो की झंकार पर एक एकाध चिडिया ने चहक लगाई। रानी ने नित्यवत अपने रिसाले की लालकुर्ती की मर्दाना पोशाक पहिनी। दोनो ओर एक एक तलवार बाधी और पिस्तौले लटकाईं। गले में मोतियो और हीरो की माला--जिससे सग्राम के घमासान मे उनके सिपहियो को उन्हे पहिचानने में सुविधा रहे। लोहे के कुले पर चन्देरी का ज़रतारी लाल साफा बाधा। लोहे के दस्ताने और भुजबन्द पहिने। इतने में उसके पाचो सरदार आ गये। मुन्दर ने कहा, 'सरकार घोडा लँगडाता है। कल की लड़ाई में या तो घायल हो गया है या ठोकर खा गया है।' रानी ने आज्ञा दी, 'तुरन्त दूसरा अच्छा और मजबूत घोड़ा ले आ।' मुन्दर घोड़ा लेने गई और उसने अस्तबल में से एक बहुत तगड़ा और देखने में पानीदार घोडा चुना। अस्तबल के प्रहरी ने कहा, 'हमारे सिन्धिया सरकार का यह खास घोड़ा है।' मुन्दर बोली, 'खास ही चाहिये। हमारी सरकार की सवारी में आवेगा।' प्रहरी--'झाँसी की रानी साहब की सवारी में ?' मुन्दर--'हाँ।' प्रहरी--'खैर ठीक है। हमारे सरकार जब इस पर बैठते थे बहुत ऊबते थे। इसके जाने से कुछ रञ्ज होता है।' मुन्दर--'क्यो ?' प्रहरी--'जब सरकार इसको न पावेगे दुखी होगे।' मुन्दर जल्दी में थी। घोडा लेकर चली गई। रानी ने अपने सरदारो को हिदायते दीं।