झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७२ झांसी की रानी ग्वालियर तथा मुरार की बस्तिया पूरे सङ्कट में आ जायें। उनकी इच्छा थी कि यदि पेशवा की सेना के दस्ते सब ओर से बढती हुई आने वाली अंग्रेजी सेनाओ का आगे जाकर मुकाबला न करे तो कम से कम इन पहाडियो पर यथास्थान तोपखाने तो लगा लें। परन्तु वहाँ भङ्ग की तरङ्ग और श्रीखण्ड की अखण्डता में उनकी सुनता ही कौन था ? इस निरीक्षण के सिलसिले में उनको एक बाबा गङ्गादास का पता चला। इनकी कुटी सोन रेखा नाले से उत्तर की ओर कुछ दूरी पर हटकर थी—किले के दक्षिणी छोर से पूर्व की दिशा में। बाबा गङ्गादास की कुटी फूस और लकड़ी छान-छप्पर की थी। निरीक्षण करते करते रानी को प्यास लगी। बाबा ने पानी पिलाया। उस समय उनको मालूम हुआ कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई हैं। उन्होने बाबा की आँखो में शान्ति का एक अद्भुत आकर्षण देखा। पेशवा के अनसुनी कर देने के दिन से उनका मन खिन्न सा रहने लगा था। निरीक्षण करती थी, लडाई के नक्शे बनाती थी, अपने सिपाहियो की कवायद-परेड करती थी, और समय पर पूजन ध्यान करती थी, परन्तु मन का अनमनापन नही जाता था। सन्ध्या होने में विलम्ब था। लू तेज चल रही थी। रानी मुन्दर के साथ स्त्री-वेश में बाबा गङ्गादास की कुटी पर पहुँची। घोडे एक पेड से बाध दिये गये। बाबा के सामने पहुच कर नमस्कार किया। बाबा ने आसन दिया। ठण्डा पानी पिलाया। रानी ने कहा, 'मै आपसे कुछ पूछने आई हू। मेरा मन अशान्त है। आपके उत्तर से शान्ति मिलने की आशा है।' बाबा बोले, 'मैं रामभजन के सिवाय और कुछ जानता ही नही हूँ।' रानी—'आप ब्राह्मण-भोजन में गये?' बाबा—'नही गया। यही बहुत खाने को मिल जाता है।' रानी—'इसीलिये आपके पास आई। आप टाल नही सकेगे।