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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ४७३

बतलाना होगा । आपने अकेले अपने मन को शान्त कर लिया तो क्या हुआ ? हम लोगो को भी शान्ति दीजिये ।' बाबा—'पूछो बेटी । यदि समझ में आ जायगा तो बतला दूंगा ।' रानी—'यहा थोडे दिनो में युद्ध होने वाला है । आपकी कुटी का स्थान रक्षित नही है । किसी सुरक्षित स्थान में चले जाइये ।' बाबा—'सुरक्षित है । बात पूछो ।' रानी —'इस देश को स्वराज्य कैसे प्राप्त होगा ?' बाबा—'इस प्रश्न का उत्तर तो राजा लोग दे सकते हैं ।' रानी—'नही दे सकते, तभी आपसे पूछने आई हूँ ।' बाबा—'जैसे प्राप्त होता आया है, वैसे ही होगा ।' रानी—'कैसे बाबा जी ?' बाबा—'सेवा, तपस्या, बलिदान से ।' रानी—'हम लोग कैसे स्वराज्य स्थापित कर पावेगे ?' बाबा—'गड्ढे कैसे भरे जाते हैं ? नीव कैसे पूरी जाती है ? एक पत्थर गिरता है, फिर दूसरा, फिर तीसरा ओर चौथा, इसी प्रकार ओर । तब उसके ऊपर भवन खडा होता है । नींव के पत्थर भवन को नही देख पाते परन्तु भवन खडा होता है उन्ही के भरोसे--जो नींव में गडे हुये है । वह गड्ढा या नींव एक पत्थर से नही भरी जाती । और, न एक दिन में । अनवरत प्रयत्न, निरन्तर बलिदान आवश्यक है ।' रानी—'हम लोगो के जीवनकाल में स्वराज्य स्थापित हो जायगा ?' बाबा—'यह मोह क्यो ? तुमने आरम्भ किये हुये कार्य को आगे बढा दिया है । अन्य लोग आयेंगे । वे इसको बढाते जायंगे । अभी कसर है । स्वराज्य स्थापना के आदर्शवादी अपने अपने छोटे छोटे राज्य बनाकर बैठ जाते हैं । जनता और उनके बीच का अन्तर नही मिटता— घटता ही बहुत कम है । जनता त्रस्त बनी रहती है । जब जनता का पूरा सहयोग राज्य को प्राप्त हो जाय और राजा टीमटाम तथा विलासिता का दासत्व छोडकर प्रजा का सेवक बन जाय तब जानो स्वराज्य की नीव भर

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