भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 487

४७४ झांसी की रानी गई और भवन बनना आरम्भ हो गया । शाश्वत धर्म का रूप बिगड गया है । इसके सुधार के बिना वह भवन खडा न हो पायगा ।' रानी—'हम लोग प्रयत्न करते रहे ?' बाबा—'अवश्य । तुम तो भगवान कृष्ण और गीता की भक्त हो ।' रानी—'आपने कैसे जाना ?' बाबा मुस्कुराये । बोले, 'सब कहते हैं ।' रानी—'मै पाठ करती हूँ, परन्तु समझते तो आप महात्मा लोग ही है ।' बाबा—'गृहस्थ से बढकर और कोई साधू नही । मुझसे कुछ और नही हो सका, इसलिये कुटी बना ली ।' सूर्यास्त होने को आया । रानी को सन्ध्या-ध्यान का स्मरण हुआ । कहा, 'बाबा जी, फिर कभी दर्शन करूँगी । आपकी इतनी बात से चित्त को बहुत शान्ति मिली ।' और नमस्कार करके चली गईं । मार्ग में मुन्दर ने कहा, 'सरकार भी इन्ही बातो को बतलाया करती हैं ।' 'परन्तु' रानी बोली, 'बाबा के समान होने में बहुत देर है ।'