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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 488

लक्ष्मीबाई ४७५ [ ८८ ] रावसाहब पेशवा का ऐश-आराम और ब्राह्मण-भोजन जारी रहा। जनरल रोज़ के उद्योग ने पहले की अपेक्षा और अधिक सबलता पकडी। रोज़ ने अपनी सेना के कई भाग करके अनुभवी अफ़सरो के सुपुर्द किया। ब्रिगेडियर स्मिथ को ग्वालियर के पूर्व की ओर पांच मील पर कोटे की सराय भेजा। एक अफ़सर को ग्वालियर और आगरे के मार्ग पर स्वयं एक प्रबल दल लेकर कालपी से ग्वालियर की ओर ६ जून को बढा। मार्ग में उसको बिग्रेडियर स्टुअर्ट ससैन्य मिल गया। १६ जून को जनरल रोज़ बहादुरपूर ग्राम पर आ गया, जहा जयाजीराव की हार हुई थी। जनरल रोज़ के साथ मध्यभारत और ग्वालियर के पोलिटिकल एजेंट भी थे। इन्होने इस बीच में एक चाल खेली—जयाजीराव और दिनकरराव को आगरे से बुलवा लिया। मुरार में पेशवा की सेना काफी थी, बाकी इधर उधर बिखरी हुई पडी थी। इनमें से अधिकांश सैनिक सिन्धिया की सेना के ही नौकर थे। यदि ये बारह तेरह दिन नष्ट न किये गये होते और यदि इन सैनिको को विभक्त करके अपने विश्वसनीय दलपतियो की अधीनता में, शुरू से ही उनका अनुशासन मय संसर्ग स्थापित कर दिया गया होता, तो बात न बिगडती। जनरल रोज़ ने दो घंटे की कडी लडाई में पेशवा की मुरार वाली सेना को हरा दिया और मुरार को कब्जे में कर लिया। पेशवा की यह पराजित सेना भाग कर ग्वालियर आई। अब रावसाहब पेशवा का नशा फरार हुआ । रोज़ जयाजीराव द्वारा पेशवा के उन सैनिको को, जो उनकी ग्वालियर फौज के थे, माफी का आश्वासन दिलवाया और यह लिखित घोषणा प्रकाशित करवाई कि अंग्रेज़ ग्वालियर के राजा को पुनः गद्दी दिलवाने के लिये ही लडने आये हैं। सरदारो और सैनिको में फूट पड गई। उनके मन फिर गये। उत्सवो की रिश्वत बेकार गई।