भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४७६ झाँसी की रानी पेशवा, बांदा के नवाब किंकर्तव्य विमूढ़ हो गये । कुछ भी समझ में नही आ रहा था कि क्या करे । तब झाँसी की रानी की याद आई, परन्तु उनके पास जाने की हिम्मत नही पड़ रही थी—कैसे मुँह दिखलाएं ? तात्या को भेजा । तात्या कलेजा साधकर उनके सामने गया । उस समय उनके पास जूही और मुन्दर थी । तात्या नमस्कार करने के उपरान्त हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया । 'क्या बात है, सरदार साहब ?' रानी ने व्यङ्ग किया, 'ये तोपें कहाँ चल रही थी ?' तात्या ने विनीत भाव से कहा, 'अब क्षमा प्रार्थना तक का समय नही है, बाईसाहब ।' रानी बोली, 'क्या भंग छानने का भी समय नही ? एक तान भी सुनने के लिये समय नही ?' तात्या उनके पैरो पर गिरने को हुआ, 'रक्षा करो देवी ।' रानी ने उसको बीच में ही पकड़ लिया । जूही बोली, 'सरकार क्षमा कर दीजिये ।' रानी मुस्कराई । 'तात्या,' उन्होने कहा, 'तुम से मुझको बडी-बडी आशाएं थी । अब भी बहुत कुछ कर सकोगे, परन्तु दृढ़ हो जाओ तो ।' तात्या बोला, 'जो जो आज्ञा होगी उसका तनमन से पालन करूंगा । आपको कभी उलहने का अवसर न दूँगा ।' रानी ने उठती हुई सास को दबाकर कहा, 'मेरा कदाचित् यह अन्तिम युद्ध होगा । क्यो मुन्दर, स्मरण है बाबा गङ्गादास ने क्या कहा था ?' जूही बोली, 'कदापि नही सरकार ।'