भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ४७७ रानी ने गभीर स्वर में कहा, 'स्वराज्य के भवन की नीव एक दो पथरो से नही भरेगी ।' तात्या अधीर होकर कातरता के साथ मुँह ताकने लगा । रानी फिर मुस्कराईं । तात्या को आश्वासन दिया, 'घबराओ नही । पेशवा से कहो कि धैर्य से काम ले । जो योजना बतलाती हू, उसके अनुसार काम करे । कदाचित् विजय प्राप्त हो जाय । न भी हो तो युद्ध सामग्री और सेना को दक्षिण की ओर ले चलने का प्रबन्ध रखना । तुम इस क्रिया के आचार्य हो ।' रानी ने तात्या को थोडे समय में भी अपनी योजना, विस्तार पूर्वक समझायी और फिर अपने पाचो सरदारो की बुद्धि में बिठलादी । ग्वालियर की पूर्वीय ओर की रक्षा का भार रानी ने स्वय लिया । पूर्वीय पहाड़ियो पर जहा तक अग्रेजो का अधिकार नही हो पाया था, तोपखाने, पीछे पैदल और रिसाले का यत्र तत्र क्रमिक मोर्चा रखा गया । सबसे आगे और बीच बीच में अपनी लालकुर्ती के सवार । अगल बगल की पहाडियो पर तोपे-दक्षिण दिशा तक । उत्तर का भार तात्या के जिम्मे किया गया । उसने रुहेली और अवधी सेना के भग्नावशेष पर अपना दस्ता बनाया था। इस दस्ते को तोपो सहित तात्या ने जमाया । पश्चिम का भार रावसाहब के ऊपर रखा गया । इसके साथ अधिकांश सिन्धिया वाली फौज थी । शहर के भीतर बाहर की रक्षा का प्रबन्ध बादा के नवाब के हाथ मे दिया गया । किले की खास रक्षा के लिये ज्यादा चिन्ता में नही पडना पड़ा । तोपें गोलन्दाज और कुछ सिपाही काफी समझे गये, क्यो कि बिना किसी बडे और विशेष कारण के किले में बन्द होकर लडना मराठी युद्ध प्रणाली के विरुद्ध था । रानी ने अपने सवारो की कवायद ली, और उनको काम की सब बातें समझा दीं । १७ जून को सवेरे ब्रिगेडियर स्मिथ ने लडाई का विगुल बजाया । लडाई आरम्भ हो गई । ब्रिगेडियर स्मिथ का आक्रमण कोटा की सराय