झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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रानी के समझाने पर भी रावसाहब न मानो । भङ्ग और नाचरङ्ग का वही क्रम जारी रहा । लड्डुओं और श्रीखण्ड के लिये इतनी शकर खर्च होने लगी कि सिपाहियो को भंग के लिये उसका मिलना दुर्लभ हो गया । श्रीखण्ड के लिये दही की इतनी मांग हो गई कि मट्ठा अप्राप्य हो गया । ब्राह्मण भोजन और दान-पुन्य की आड में बेहिसाब भिखमंगी बढ गई । कोई प्रतिवन्ध या प्रबन्ध न था, इसलिये अनेक सिपाही भी इस मुफ्तखोरी में सन गये । रानी लक्ष्मीबाई ने देखा कि जब वे अपने किले में घिर गई थी तब स्वतन्त्र थी, और ग्वालियर में स्वच्छन्द होते हुये भी उनकी दशा एक कैदी की सी है । रानी का स्वभाव था कि वे जहा जाती थी, उसके चौगिर्द का बारीकी के साथ निरीक्षण करती थी । इस निरीक्षण से उनको युद्ध के लिये मोर्चे बनाने में बडी सुविधा होती थी । उनकी रणनीति में इस क्रिया का विशेष स्थान था । उन्होने देखा कि ग्वालियर का किला और पश्चिम-दक्षिण की पहाडिया ग्वालियर की बस्ती और लश्कर के नगर की अच्छी रक्षा कर सकती हैं । पूर्व की ओर पहाडियो का सिलसिला लश्कर से लगभग दो मील पड़ता था—यह भी रक्षा का साधन हो सकता था, परन्तु उत्तर- पूर्व में मुरार की ओर दिशा खुली पडी थी । उसको ढकने के लिये सोनरेखा नाम का केवल एक नाला था, जो लश्कर को तीन ओर से घेर कर कतराता हुआ मुरार की ओर चला गया था । परन्तु यह कोई बडा साधन न था, उल्टे कुछ अडचन डाल सकता था । इसके सिवाय दक्षिणवर्ती पहाडियो का क्रम, जिसके अगले भाग पर दुर्गा का मन्दिर था, शत्रुओ के लिये भी लाभदायक हो सकता था, और, पूर्व की ओर की पहाडिया यदि शत्रु की तोपो के लिये मिल जायें तो लश्कर का नगर और