भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 483

४७० झांसी की रानी कौन से परिवर्तन ?' 'भग, नाच रग, दिन में दीर्घ निद्रा ।' 'बाईसाहब, पेशवाई स्वीकार करने के बाद उत्सवो का, दरबारो का करना अनिवार्य हो गया । अन्यथा लोग कहते, ये कैसे राजाओ के राजा, जो चुपचाप सिंहासन पर बैठकर, चुपचाप महल में जा बैठे । यहा के सरदार नृत्यगान के लालची हैं । उनका मन भरना आवश्यक था । करना पड़ा । इन सरदारो की सहानुभूति के बिना काम नही बनता ।' 'कितने दिन और चलेगा यह सब ?' 'बस थोड़े दिन, बहुत थोडे दिन । परन्तु ब्राह्मण भोजन दान पुण्य निरन्तर जारी रहेगा । धर्म के आशीर्वाद से जो स्वराज्य स्थापित होगा वह अक्षय होगा । छत्रपति भी कर्मकांड को बहुत मानते थे, सो आप भी जानती हैं, और धर्म के विषय में आपसे बात करने का मै अधिकारी ही क्या हूँ ?' 'धर्म की गति को तो महात्मा लोग ही जानते हैं । मै तो केवल यह कह सकती हू कि ब्राह्मण भोजन दान पूण्य इत्यादि के साथ सेना का तुरन्त अच्छा प्रबन्ध करिये । उन्हे कुछ काम दीजिये और उत्सव इत्यादि तुरन्त बन्द कर दीजिये ।'