झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
४७० झांसी की रानी कौन से परिवर्तन ?' 'भग, नाच रग, दिन में दीर्घ निद्रा ।' 'बाईसाहब, पेशवाई स्वीकार करने के बाद उत्सवो का, दरबारो का करना अनिवार्य हो गया । अन्यथा लोग कहते, ये कैसे राजाओ के राजा, जो चुपचाप सिंहासन पर बैठकर, चुपचाप महल में जा बैठे । यहा के सरदार नृत्यगान के लालची हैं । उनका मन भरना आवश्यक था । करना पड़ा । इन सरदारो की सहानुभूति के बिना काम नही बनता ।' 'कितने दिन और चलेगा यह सब ?' 'बस थोड़े दिन, बहुत थोडे दिन । परन्तु ब्राह्मण भोजन दान पुण्य निरन्तर जारी रहेगा । धर्म के आशीर्वाद से जो स्वराज्य स्थापित होगा वह अक्षय होगा । छत्रपति भी कर्मकांड को बहुत मानते थे, सो आप भी जानती हैं, और धर्म के विषय में आपसे बात करने का मै अधिकारी ही क्या हूँ ?' 'धर्म की गति को तो महात्मा लोग ही जानते हैं । मै तो केवल यह कह सकती हू कि ब्राह्मण भोजन दान पूण्य इत्यादि के साथ सेना का तुरन्त अच्छा प्रबन्ध करिये । उन्हे कुछ काम दीजिये और उत्सव इत्यादि तुरन्त बन्द कर दीजिये ।'
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रानी के समझाने पर भी रावसाहब न मानो । भङ्ग और नाचरङ्ग का वही क्रम जारी रहा । लड्डुओं और श्रीखण्ड के लिये इतनी शकर खर्च होने लगी कि सिपाहियो को भंग के लिये उसका मिलना दुर्लभ हो गया । श्रीखण्ड के लिये दही की इतनी मांग हो गई कि मट्ठा अप्राप्य हो गया । ब्राह्मण भोजन और दान-पुन्य की आड में बेहिसाब भिखमंगी बढ गई । कोई प्रतिवन्ध या प्रबन्ध न था, इसलिये अनेक सिपाही भी इस मुफ्तखोरी में सन गये । रानी लक्ष्मीबाई ने देखा कि जब वे अपने किले में घिर गई थी तब स्वतन्त्र थी, और ग्वालियर में स्वच्छन्द होते हुये भी उनकी दशा एक कैदी की सी है । रानी का स्वभाव था कि वे जहा जाती थी, उसके चौगिर्द का बारीकी के साथ निरीक्षण करती थी । इस निरीक्षण से उनको युद्ध के लिये मोर्चे बनाने में बडी सुविधा होती थी । उनकी रणनीति में इस क्रिया का विशेष स्थान था । उन्होने देखा कि ग्वालियर का किला और पश्चिम-दक्षिण की पहाडिया ग्वालियर की बस्ती और लश्कर के नगर की अच्छी रक्षा कर सकती हैं । पूर्व की ओर पहाडियो का सिलसिला लश्कर से लगभग दो मील पड़ता था—यह भी रक्षा का साधन हो सकता था, परन्तु उत्तर- पूर्व में मुरार की ओर दिशा खुली पडी थी । उसको ढकने के लिये सोनरेखा नाम का केवल एक नाला था, जो लश्कर को तीन ओर से घेर कर कतराता हुआ मुरार की ओर चला गया था । परन्तु यह कोई बडा साधन न था, उल्टे कुछ अडचन डाल सकता था । इसके सिवाय दक्षिणवर्ती पहाडियो का क्रम, जिसके अगले भाग पर दुर्गा का मन्दिर था, शत्रुओ के लिये भी लाभदायक हो सकता था, और, पूर्व की ओर की पहाडिया यदि शत्रु की तोपो के लिये मिल जायें तो लश्कर का नगर और
४७२ झांसी की रानी ग्वालियर तथा मुरार की बस्तिया पूरे सङ्कट में आ जायें। उनकी इच्छा थी कि यदि पेशवा की सेना के दस्ते सब ओर से बढती हुई आने वाली अंग्रेजी सेनाओ का आगे जाकर मुकाबला न करे तो कम से कम इन पहाडियो पर यथास्थान तोपखाने तो लगा लें। परन्तु वहाँ भङ्ग की तरङ्ग और श्रीखण्ड की अखण्डता में उनकी सुनता ही कौन था ? इस निरीक्षण के सिलसिले में उनको एक बाबा गङ्गादास का पता चला। इनकी कुटी सोन रेखा नाले से उत्तर की ओर कुछ दूरी पर हटकर थी—किले के दक्षिणी छोर से पूर्व की दिशा में। बाबा गङ्गादास की कुटी फूस और लकड़ी छान-छप्पर की थी। निरीक्षण करते करते रानी को प्यास लगी। बाबा ने पानी पिलाया। उस समय उनको मालूम हुआ कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई हैं। उन्होने बाबा की आँखो में शान्ति का एक अद्भुत आकर्षण देखा। पेशवा के अनसुनी कर देने के दिन से उनका मन खिन्न सा रहने लगा था। निरीक्षण करती थी, लडाई के नक्शे बनाती थी, अपने सिपाहियो की कवायद-परेड करती थी, और समय पर पूजन ध्यान करती थी, परन्तु मन का अनमनापन नही जाता था। सन्ध्या होने में विलम्ब था। लू तेज चल रही थी। रानी मुन्दर के साथ स्त्री-वेश में बाबा गङ्गादास की कुटी पर पहुँची। घोडे एक पेड से बाध दिये गये। बाबा के सामने पहुच कर नमस्कार किया। बाबा ने आसन दिया। ठण्डा पानी पिलाया। रानी ने कहा, 'मै आपसे कुछ पूछने आई हू। मेरा मन अशान्त है। आपके उत्तर से शान्ति मिलने की आशा है।' बाबा बोले, 'मैं रामभजन के सिवाय और कुछ जानता ही नही हूँ।' रानी—'आप ब्राह्मण-भोजन में गये?' बाबा—'नही गया। यही बहुत खाने को मिल जाता है।' रानी—'इसीलिये आपके पास आई। आप टाल नही सकेगे।
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बतलाना होगा । आपने अकेले अपने मन को शान्त कर लिया तो क्या हुआ ? हम लोगो को भी शान्ति दीजिये ।' बाबा—'पूछो बेटी । यदि समझ में आ जायगा तो बतला दूंगा ।' रानी—'यहा थोडे दिनो में युद्ध होने वाला है । आपकी कुटी का स्थान रक्षित नही है । किसी सुरक्षित स्थान में चले जाइये ।' बाबा—'सुरक्षित है । बात पूछो ।' रानी —'इस देश को स्वराज्य कैसे प्राप्त होगा ?' बाबा—'इस प्रश्न का उत्तर तो राजा लोग दे सकते हैं ।' रानी—'नही दे सकते, तभी आपसे पूछने आई हूँ ।' बाबा—'जैसे प्राप्त होता आया है, वैसे ही होगा ।' रानी—'कैसे बाबा जी ?' बाबा—'सेवा, तपस्या, बलिदान से ।' रानी—'हम लोग कैसे स्वराज्य स्थापित कर पावेगे ?' बाबा—'गड्ढे कैसे भरे जाते हैं ? नीव कैसे पूरी जाती है ? एक पत्थर गिरता है, फिर दूसरा, फिर तीसरा ओर चौथा, इसी प्रकार ओर । तब उसके ऊपर भवन खडा होता है । नींव के पत्थर भवन को नही देख पाते परन्तु भवन खडा होता है उन्ही के भरोसे--जो नींव में गडे हुये है । वह गड्ढा या नींव एक पत्थर से नही भरी जाती । और, न एक दिन में । अनवरत प्रयत्न, निरन्तर बलिदान आवश्यक है ।' रानी—'हम लोगो के जीवनकाल में स्वराज्य स्थापित हो जायगा ?' बाबा—'यह मोह क्यो ? तुमने आरम्भ किये हुये कार्य को आगे बढा दिया है । अन्य लोग आयेंगे । वे इसको बढाते जायंगे । अभी कसर है । स्वराज्य स्थापना के आदर्शवादी अपने अपने छोटे छोटे राज्य बनाकर बैठ जाते हैं । जनता और उनके बीच का अन्तर नही मिटता— घटता ही बहुत कम है । जनता त्रस्त बनी रहती है । जब जनता का पूरा सहयोग राज्य को प्राप्त हो जाय और राजा टीमटाम तथा विलासिता का दासत्व छोडकर प्रजा का सेवक बन जाय तब जानो स्वराज्य की नीव भर
४७४ झांसी की रानी गई और भवन बनना आरम्भ हो गया । शाश्वत धर्म का रूप बिगड गया है । इसके सुधार के बिना वह भवन खडा न हो पायगा ।' रानी—'हम लोग प्रयत्न करते रहे ?' बाबा—'अवश्य । तुम तो भगवान कृष्ण और गीता की भक्त हो ।' रानी—'आपने कैसे जाना ?' बाबा मुस्कुराये । बोले, 'सब कहते हैं ।' रानी—'मै पाठ करती हूँ, परन्तु समझते तो आप महात्मा लोग ही है ।' बाबा—'गृहस्थ से बढकर और कोई साधू नही । मुझसे कुछ और नही हो सका, इसलिये कुटी बना ली ।' सूर्यास्त होने को आया । रानी को सन्ध्या-ध्यान का स्मरण हुआ । कहा, 'बाबा जी, फिर कभी दर्शन करूँगी । आपकी इतनी बात से चित्त को बहुत शान्ति मिली ।' और नमस्कार करके चली गईं । मार्ग में मुन्दर ने कहा, 'सरकार भी इन्ही बातो को बतलाया करती हैं ।' 'परन्तु' रानी बोली, 'बाबा के समान होने में बहुत देर है ।'
लक्ष्मीबाई ४७५ [ ८८ ] रावसाहब पेशवा का ऐश-आराम और ब्राह्मण-भोजन जारी रहा। जनरल रोज़ के उद्योग ने पहले की अपेक्षा और अधिक सबलता पकडी। रोज़ ने अपनी सेना के कई भाग करके अनुभवी अफ़सरो के सुपुर्द किया। ब्रिगेडियर स्मिथ को ग्वालियर के पूर्व की ओर पांच मील पर कोटे की सराय भेजा। एक अफ़सर को ग्वालियर और आगरे के मार्ग पर स्वयं एक प्रबल दल लेकर कालपी से ग्वालियर की ओर ६ जून को बढा। मार्ग में उसको बिग्रेडियर स्टुअर्ट ससैन्य मिल गया। १६ जून को जनरल रोज़ बहादुरपूर ग्राम पर आ गया, जहा जयाजीराव की हार हुई थी। जनरल रोज़ के साथ मध्यभारत और ग्वालियर के पोलिटिकल एजेंट भी थे। इन्होने इस बीच में एक चाल खेली—जयाजीराव और दिनकरराव को आगरे से बुलवा लिया। मुरार में पेशवा की सेना काफी थी, बाकी इधर उधर बिखरी हुई पडी थी। इनमें से अधिकांश सैनिक सिन्धिया की सेना के ही नौकर थे। यदि ये बारह तेरह दिन नष्ट न किये गये होते और यदि इन सैनिको को विभक्त करके अपने विश्वसनीय दलपतियो की अधीनता में, शुरू से ही उनका अनुशासन मय संसर्ग स्थापित कर दिया गया होता, तो बात न बिगडती। जनरल रोज़ ने दो घंटे की कडी लडाई में पेशवा की मुरार वाली सेना को हरा दिया और मुरार को कब्जे में कर लिया। पेशवा की यह पराजित सेना भाग कर ग्वालियर आई। अब रावसाहब पेशवा का नशा फरार हुआ । रोज़ जयाजीराव द्वारा पेशवा के उन सैनिको को, जो उनकी ग्वालियर फौज के थे, माफी का आश्वासन दिलवाया और यह लिखित घोषणा प्रकाशित करवाई कि अंग्रेज़ ग्वालियर के राजा को पुनः गद्दी दिलवाने के लिये ही लडने आये हैं। सरदारो और सैनिको में फूट पड गई। उनके मन फिर गये। उत्सवो की रिश्वत बेकार गई।
४७६ झाँसी की रानी पेशवा, बांदा के नवाब किंकर्तव्य विमूढ़ हो गये । कुछ भी समझ में नही आ रहा था कि क्या करे । तब झाँसी की रानी की याद आई, परन्तु उनके पास जाने की हिम्मत नही पड़ रही थी—कैसे मुँह दिखलाएं ? तात्या को भेजा । तात्या कलेजा साधकर उनके सामने गया । उस समय उनके पास जूही और मुन्दर थी । तात्या नमस्कार करने के उपरान्त हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया । 'क्या बात है, सरदार साहब ?' रानी ने व्यङ्ग किया, 'ये तोपें कहाँ चल रही थी ?' तात्या ने विनीत भाव से कहा, 'अब क्षमा प्रार्थना तक का समय नही है, बाईसाहब ।' रानी बोली, 'क्या भंग छानने का भी समय नही ? एक तान भी सुनने के लिये समय नही ?' तात्या उनके पैरो पर गिरने को हुआ, 'रक्षा करो देवी ।' रानी ने उसको बीच में ही पकड़ लिया । जूही बोली, 'सरकार क्षमा कर दीजिये ।' रानी मुस्कराई । 'तात्या,' उन्होने कहा, 'तुम से मुझको बडी-बडी आशाएं थी । अब भी बहुत कुछ कर सकोगे, परन्तु दृढ़ हो जाओ तो ।' तात्या बोला, 'जो जो आज्ञा होगी उसका तनमन से पालन करूंगा । आपको कभी उलहने का अवसर न दूँगा ।' रानी ने उठती हुई सास को दबाकर कहा, 'मेरा कदाचित् यह अन्तिम युद्ध होगा । क्यो मुन्दर, स्मरण है बाबा गङ्गादास ने क्या कहा था ?' जूही बोली, 'कदापि नही सरकार ।'
लक्ष्मीबाई ४७७ रानी ने गभीर स्वर में कहा, 'स्वराज्य के भवन की नीव एक दो पथरो से नही भरेगी ।' तात्या अधीर होकर कातरता के साथ मुँह ताकने लगा । रानी फिर मुस्कराईं । तात्या को आश्वासन दिया, 'घबराओ नही । पेशवा से कहो कि धैर्य से काम ले । जो योजना बतलाती हू, उसके अनुसार काम करे । कदाचित् विजय प्राप्त हो जाय । न भी हो तो युद्ध सामग्री और सेना को दक्षिण की ओर ले चलने का प्रबन्ध रखना । तुम इस क्रिया के आचार्य हो ।' रानी ने तात्या को थोडे समय में भी अपनी योजना, विस्तार पूर्वक समझायी और फिर अपने पाचो सरदारो की बुद्धि में बिठलादी । ग्वालियर की पूर्वीय ओर की रक्षा का भार रानी ने स्वय लिया । पूर्वीय पहाड़ियो पर जहा तक अग्रेजो का अधिकार नही हो पाया था, तोपखाने, पीछे पैदल और रिसाले का यत्र तत्र क्रमिक मोर्चा रखा गया । सबसे आगे और बीच बीच में अपनी लालकुर्ती के सवार । अगल बगल की पहाडियो पर तोपे-दक्षिण दिशा तक । उत्तर का भार तात्या के जिम्मे किया गया । उसने रुहेली और अवधी सेना के भग्नावशेष पर अपना दस्ता बनाया था। इस दस्ते को तोपो सहित तात्या ने जमाया । पश्चिम का भार रावसाहब के ऊपर रखा गया । इसके साथ अधिकांश सिन्धिया वाली फौज थी । शहर के भीतर बाहर की रक्षा का प्रबन्ध बादा के नवाब के हाथ मे दिया गया । किले की खास रक्षा के लिये ज्यादा चिन्ता में नही पडना पड़ा । तोपें गोलन्दाज और कुछ सिपाही काफी समझे गये, क्यो कि बिना किसी बडे और विशेष कारण के किले में बन्द होकर लडना मराठी युद्ध प्रणाली के विरुद्ध था । रानी ने अपने सवारो की कवायद ली, और उनको काम की सब बातें समझा दीं । १७ जून को सवेरे ब्रिगेडियर स्मिथ ने लडाई का विगुल बजाया । लडाई आरम्भ हो गई । ब्रिगेडियर स्मिथ का आक्रमण कोटा की सराय
४७८ झांसी की रानी से शहर पर होना था, पूर्व दिशा से, जहां लक्ष्मीबाई का मोर्चा था। जैसे ही अंग्रेजी सेना रानी की तोपो की मार के भीतर आई, रानी ने गोलन्दाजो को सकेत दिया । गोलाबारी होते ही अंग्रेज़ी सेना की दुर्गति हुई और वह पीछे हटी । रानी के लालकुर्ती सवारो ने तुरन्त छापा मारा । स्मिथ ने एक चतुर चाल खेली—उसने अपनी उस टुकडी को और अधिक पीछे खीचा और रानी के सवारो को आगे बढने दिया । इन सवारो के ज्यादा आगे निकल जाने से उनका स्थान खाली हो गया । स्मिथ ने कई दिशाओ से रानी के मोर्चों पर आक्रमण किया । घमासान युद्ध हुआ। तलवार चली । लोहे ने लोहे से चिनगारिया छुटकाई । स्मिथ ने रानी के पार्श्व पर अपनी दो पल्टने और फेकी जो अभी तक चुपचाप खडी थी । रानी के सवारो को पीछे हटना पडा । ब्रिगेडियर स्मिथ ने अपने सामने की पातो को फोड कर रिसाले समेत बढने का सकल्प किया । उद्देश्य था फूल बाग पर अधिकार करने का । अपने सवारो को पीछे हटता देख कर रानी घोडे को तेज करके तुरन्त उनके समीप पहुची । गुलमुहम्मद दिखलाई दिया । उसके पास घोडा दौडा कर बढते हुये अंग्रेजो की ओर तलवार की नोक करके बोली, 'खान, आज हाथ ढीला क्यो पड रहा ?' गुलमुहम्मद चिल्लाकर बोला, 'हुजूर हमारा हाथ अब मुलाहिजा करे।' पठान सरदार चिल्लाता हुआ, रेलपेल करता हुआ, लालकुर्तियो को बढावा देता हुआ, आगे फिका । रानी साथ में । गुलमुहम्मद ने प्रखर स्वर मे रानी से प्रार्थना की, हुजूर जूही सरदार का तोपखाना ठीक करे ।' रानी लौट पडी । एक टौरिया के पीछे जूही तोपखाना की मार को जारी किये थी, परन्तु लालकुर्ती को पीछे हटा देख कर हडबडा गई थी । गोरा रिसाला उसकी ओर बढ रहा था । 'जूही,' रानी ने आदेश किया, 'तोप का मुहरा एक अंगुल नीचा कर।'
लक्ष्मीबाई ४७६ 'जो आज्ञा उसने उत्साहित होकर कहा, और अपने साथियो की सहायता से तुरन्त वैसा ही किया । 'मार,' रानी ने दूसरा आदेश दिया । तोप ने धायँ किया । गोरे सवार बिछ गये । लौट पडे । रानी दूसरे स्थल पर पहुँची । वे जहाँ पहुचती वही अपने सिपाहियो पर तेज छिटक देती । यद्यपि उनके योद्धाओ की सख्या कम थी, परन्तु वे उनके प्रति अटल विश्वास रखते थे । फिर बढे । उनकी रानी उनके साथ । दोनो हाथो एक समान कौशल और शक्ति के साथ तलवार चलाने वाली । अंग्रेज वीरता के साथ लडे और बहुत मरे । रानी के उन थोडे से लालकुर्ती सवारो ने तो कमाल ही कर दिया । यथावत् आज्ञा का पालन करते हुये उन लोगो ने अंग्रेजो के छक्के छुटा दिये । ब्रिगेडियर स्मिथ को रानी ने उस दिन की चालो में और शूरवीरी में मात दी । स्मिथ उनके व्यूह को न भेद सका । उसको लक्ष्मीबाई के मुकाबले में हार कर लौटना पडा । अंग्रेजो ने उस दिन का युद्ध बन्द करके दम ली । रानी ने उस दिन निरन्तर परिश्रम किया था और उनके सरदारो ने भी । इस पर भी उन्होने रात को काफी समय तक अथक परिश्रम किया—योजनाये सुधारी, परिवर्तित की, सलाह सम्मित दी, उनके जिन योद्धाओ ने उस दिन के युद्ध में कोई विशेष कार्य किया था, उनको शाबाशी दी, और पुरस्कार दिये । और गुलमुहम्मद को कुँवर की उपाधि प्रदान की । ग्वालियर की सेना पर जयाजीराव की उस घोषणा के कारण प्रभाव पड चुका था, परन्तु उस दिन उस सेना ने कोई ऐसा स्पष्ट काम नहीं किया जिससे उस पर तात्या या पेशवा को अविश्वास होता परन्तु रानी को सन्देह था । तात्या और रावसाहब ने निवारण किया । अविश्वास करने से अब होता भी क्या था ? लाचार होकर दूसरे दिन के युद्ध में वे ही साधन काम में लाने पडे जो उनको उपलब्ध थे ।
४८०. झांसी की रानी [ ८६ ] अठारह जून आई। ज्येष्ठ शुक्ला सप्तमी। शुक्रवार। सफेद और पीली पौ फटी। ऊषा ने अपनी मुस्कान बिखेरी। रानी स्नान-ध्यान और गीता के अठारहवे अध्याय के पाठ से निबट चुकी। झींगुरो की झंकार पर एक एकाध चिडिया ने चहक लगाई। रानी ने नित्यवत अपने रिसाले की लालकुर्ती की मर्दाना पोशाक पहिनी। दोनो ओर एक एक तलवार बाधी और पिस्तौले लटकाईं। गले में मोतियो और हीरो की माला--जिससे सग्राम के घमासान मे उनके सिपहियो को उन्हे पहिचानने में सुविधा रहे। लोहे के कुले पर चन्देरी का ज़रतारी लाल साफा बाधा। लोहे के दस्ताने और भुजबन्द पहिने। इतने में उसके पाचो सरदार आ गये। मुन्दर ने कहा, 'सरकार घोडा लँगडाता है। कल की लड़ाई में या तो घायल हो गया है या ठोकर खा गया है।' रानी ने आज्ञा दी, 'तुरन्त दूसरा अच्छा और मजबूत घोड़ा ले आ।' मुन्दर घोड़ा लेने गई और उसने अस्तबल में से एक बहुत तगड़ा और देखने में पानीदार घोडा चुना। अस्तबल के प्रहरी ने कहा, 'हमारे सिन्धिया सरकार का यह खास घोड़ा है।' मुन्दर बोली, 'खास ही चाहिये। हमारी सरकार की सवारी में आवेगा।' प्रहरी--'झाँसी की रानी साहब की सवारी में ?' मुन्दर--'हाँ।' प्रहरी--'खैर ठीक है। हमारे सरकार जब इस पर बैठते थे बहुत ऊबते थे। इसके जाने से कुछ रञ्ज होता है।' मुन्दर--'क्यो ?' प्रहरी--'जब सरकार इसको न पावेगे दुखी होगे।' मुन्दर जल्दी में थी। घोडा लेकर चली गई। रानी ने अपने सरदारो को हिदायते दीं।
लक्ष्मी बाई ४८१ रानी ने कहा, 'कुंवर गुलमुहम्मद, आज तुमको अपने जौहर का जौहर दिखलाना है । कल की लडाई का हाल देखकर आज जीत की आशा होती है । परन्तु यदि पश्चिम या उत्तर का मोर्चा उखड जाय तो उसको सँभालना और दक्षिण चल पडने की तैयारी में रहना ।' 'सरकार,' गुलमुहम्मद बोला, 'अम सब पठान आज कट जाने का कसम खाया है । जो बचेगा वो दखन जायगा । आप दखन जाना सरकार । अमारा राहतगढ लेना । अमारा भौत पठान वहा मारा गया । उनका यादगार बनवाना ।' 'नही कुवर साहब हम जीतेगे', रानी ने कहा, 'दक्षिण जाने की बात तो तब उठेगी जब यहा कुछ हाथ न रहे । फौजदार के विचार में जीतने की बात पहले उठनी ही चाहिये, परन्तु दूसरी बात जो तै की जावे वह बच निकलने और फिर कही जमकर युद्ध करने की है ।' मुन्दर बोली, 'सरकार कुछ जलपान करले । इसी समय से हवा में कुछ कुछ गरमी है । दिखता है लू बहुत चलेगी ।' रानी ने कहा, 'तुम लोग कुछ खालो । दामोदरराव को खूब खिला- पिला लो । पीठ पर पानी का प्रबन्ध रखना । मैं केवल शर्बत पियूंगी ।' जूही — 'मै भी शर्बत पियूगी ।' रानी — 'देशमुख, तुम ?' देशमुख — 'मै तो कुछ खा-पी आया ।' रानी — 'रघुनाथसिंह ?' रघुनाथसिंह — 'मै कुछ खाऊँगा ।' रानी — 'तुम और मुन्दर कुछ खा-पीकर झटपट शर्बत बना लाओ ।' मुन्दर और रघुनाथसिंह गये । दामोदरराव आ गया । रानी ने उसको खिलाया-पिलाया । रानी ने जूही से कहा, 'आज तेरी सुगन्ध ऐसी बरसे कि बैरी बिछ जायें ।'
४८२ झाँसी की रानी जूही प्रसन्न होकर बोली, 'आज मैं जो कुछ कर सकूँ, कह नही सकती, परन्तु आँख खुलते ही जो कुछ प्रण किया है उसके अनुसार अवश्य काम करूँगी।' रानी--'परन्तु जो कुछ करे, ठडक के साथ करना। केवल उत्तेजना से बहुत सहायता नही मिलेगी।' जूही--'तभी तो सरकार मै हँस रही हूँ। एक हसरत मन में रही जाती है—आपको गाना न सुना पाया।' रानी--'किसी दिन सुनूँगी।' जूही—'हाँ सरकार, अवश्य।' जूही जरा ज्यादा हँस पड़ी। रानी—'तेरी हँसी आज कुछ भीषण है।' जूही—'काम इससे अधिक भीषण होगा सरकार।'
लक्ष्मीबाई | ४८३
[ ६० ]
मुन्दर और रघुनाथसिंह ने कुछ भी न खाकर जेबो में कलेवा डाला और पीठ पर पानी का बर्तन कस लिया । झटपट शर्बत बनाया । मुन्दरबाई', रघुनाथसिंह ने कहा, 'रानी साहब का साथ एक क्षण के लिये भी न छूटने पावे । वे आज अंतिम युद्ध लडने जा रही हैं ।' मुन्दर—'आप कहा रहेगे ?' रघुनाथसिंह—'जहा उनकी आज्ञा होगी । वैसे आप लोगो के समीप ही रहने का प्रयत्न करू गा ।' मुन्दर—'में चाहती हूँ आप बिलकुल निकट रहे । मुझे लगता है में आज मारी जाऊँगी । आपके निकट होने से शान्ति मिलेगी ।' रघुनाथसिंह—'मैं भी नही बचूँगा । रानी साहव को किसी प्रकार सुरक्षित रखना है । मै तुम्हे तुरन्त ही स्वर्ग मे मिलूंगा । केवल आगे पीछे की बात है ।' वह जरा सूखी हँसी हँसा । मुन्दर ने रघुनाथसिंह की ओर आँसू भरी आँखो से देखा । कुछ कहने के लिये होठ हिले । रघुनाथसिंह की आँखे भी धुंधली हुईं । दूर से दुश्मन के बिगुल के शब्द की भाई कान में पडी । मुन्दर ने रघुनाथसिंह को मस्तक नवाकर प्रणाम किया और उस ओट मे जल्दी आँसू पोछ डाले । रघुनाथसिंह ने मुन्दर को नमस्कार किया फिर तुरन्त दोनो शर्बत लिये हुये रानी के पास पहुँचे । मुन्दर ने जूही को पिलाया, रघुनाथसिंह ने रानी को । अङ्गरेजो की बिगुल का साफ शब्द सुनाई दिया । तोप का धडाका हुआ, गोला सन्ना- कर ऊपर से निकल गया । रानी ने दूसरा कटोरा नही पी पाया । रानी ने रामचन्द्र देशमुख को आदेश किया, 'दामोदर को आज तुम पीठ पर बाधो । यदि में मारी जाऊँ तो इसको किसी तरह दक्षिण सुरक्षित पहुंचा देना । तुमको आज मेरे प्राणो से बढकर अपनी रक्षा की चिन्ता करनी होगी । दूसरी बात यह है कि मारी जाने पर ये विधर्मी मेरी देह को न छूने पावे । बस । घोडा लाओ ।'
४८४ झाँसी की रानी मुन्दर घोडा ले आई । उसकी आखे छलछला रही थी । पूर्व दिशा में अरुणमा फैल गई । अबकी बार कई तोपो का घडाका हुआ । रानी मुस्कराईं । बोली, 'यह तात्या की तोपो का जवाब है ।' मुन्दर की छलकती हुई आखो को देखकर कहा, 'यह समय आसुओ का नही है, मुन्दर । जा, तुरन्त अपने घोडे पर सवार हो ।' अपने लिये आये हुये थोडे को देखकर बोली, 'यह अस्तबल को प्यार करने वाला जानवर है । परन्तु अब दूसरे को चुनने का समय ही नही है । इसी से काम निकालू गी ।' जूही के सिर पर हाथ फेर कर कहा, 'जा जूही अपने तोपखाने पर । छका तो दे इन बैरियो को आज ।' जूही ने प्रणाम किया । जाते हुये कह गई, 'इस जीवन का यथोचित अभिनय आपको न दिखला पाया । खैर ।' अङ्गरेज़ो के गोलो की वर्षा हो उठी । रानी के सब सरदार और सवार घोडो पर जम गये, जूही का तोपखाना आग उगलने लगा । इतने में सूर्य का उदय हुआ । सूर्य की किरणो ने रानी के सुन्दर मुख को प्रदीप्त किया । उनके नेत्रो की ज्योति दुहरे चमत्कार से भासमान हुई । लाल वर्दी के ऊपर मोती- हीरो का कठा दमक उठा और, चमक पडी म्यान से निकली हुई तलवार । रानी ने घोडे को एड लगाई । पहले ज़रा हिचका फिर तेज हो गया । रानी ने सोचा कई दिन का बँधा होगा, थोडी देर में गरम हो जायगा । उत्तर और पश्चिम की दिशाओ में तात्या और रावसाहब के मोर्चे थे । दक्षिण में बादा के नवाब का, रानी ने पूर्व की ओर झपट लगाई । गत दिवस की हार के कारण अङ्गरेज जनरल सावधान और चिंतित हो गये थे । इन लोगो ने अपनी पैदल पलटने पूर्व और दक्षिण के बीहड में छिपा ली और हुज़र* सवारो को कई दिशाओ से आक्रमण करने *Hussars
लक्ष्मीबाई ४८५ की योजना की। तोपे पीठ पर रक्षा के लिये थी ही हुजूर सवारो ने पहला हमला कडाबीन बन्दूको से किया। बन्दूको का जवाब बन्दूको से दिया गया। रानी ने आक्रमण पर आक्रमण करके हुजूर सवारो को पीछे हटाया। दोनो ओर के सवारो की बेहिसाब दौड से धूल के बादल छा गये। रानी के रणकौशल के मारे अग्ररेज जनरल थर्रा गये। काफी समय हो गया, परन्तु अङ्गरेजो को पेशवाई मोर्चों में निकल जाने की गुन्जायश न मिली। जूही की तोपे गज़ब ढा रही थी। अङ्गरेज नायक ने इन तोपो का मुहँ बन्द करना तै किया। हुजर सवार बढते जाते थे, मरते जाते थे, परन्तु उन्होने इस तरफ की तोपो को चुप करने का निश्चय कर लिया था। रानी ने जूही की सहायता के लिये कुमुक भेजी। उसी समय उनको खबर मिली कि पेशवा की अधिकांश ग्वालियर सेना और सरदार 'श्रा ने महाराज' की शरण मे चले गये। मुन्दर ने रानी से कहा, 'सवेरे अस्तबल का प्रहरी रिस रिस कर अपने 'सरकार' का स्मरण कर रहा था। मुझे सन्देह हो गया था कि ग्वालियरी कुछ गडबड करेंगे।' 'गाठ में समय न होने के कारण कुछ नही किया जा सकता था,' रानी बोली, 'अब जो कुछ संभव है वह करो।' इनकी लालकुर्ती अव तलवार खीचकर आगे बढी। उस धूल घूरसित प्रकाश में भी तलवारो की चमचमाहट ने चकाचौध लगा दी। कुछ ही समय उपरान्त समाचार मिला कि ग्वालियरी सेना के, परपक्ष में मिल जाने के कारण रावसाहब के दो मोर्चे छिन गये और अङ्गरेज उनमे से घुसने लगे हैं। रानी के पीछे पैदल पल्टन थी। उसको स्थिति संभालने की आज्ञा देकर वह एक ओर आगे बढी। उधर हुज़र- सवार जूही के तोपखाने पर जा टूटे। जूही तलवार से भिड गई। घिर गई और मारी गई। मरते समय उसने आह तक नही की। चिर गई थी। परन्तु शत्रु की तलवार चीरने में, जिस बातमें असमर्थ रही-वह थी
४८६ झाँसी की रानी जूही की क्षीण मुस्कराहट जो उसके ओठो पर अनन्त दिव्यता की गोद मे खेल गई । वर्दी के कट जाने पर हुजरो ने देखा कि तोपखाने का अफसर गोरे रङ्ग की एक सुन्दर युवती थी ! और उसके ओठो पर मुस्कराहट थी !! समाचार मिलते ही रानी ने इस तोपखाने का प्रबन्ध किया । इतने में ब्रिगेडियर स्मिथ ने अपने छिपे हुये पैदलो को छिपे हुये स्थानो से निकाला । वे संगीने सीधी किये रानी के पीछे वाली पैदल पल्टन पर दो पार्श्वों से झपटे । पेशवा की पैदल पल्टन घबरा गई । उसके पैर उखडे । भाग उठी । रानी ने प्रोत्साहन, उत्तेजन दिया । परन्तु उनके और उस भागती हुई पल्टन के बीच में गोरो की संगीनें और हुज़रो के घोडे आचुके थे । अङ्गरेजो की कडाबीने, संगीनें और तोपें पेशवाई सेना का सहार कर उठी । पेशवा की दो तोपे भी उन लोगो ने छीनली । अङ्गरेजी सेना बाढ पर आई हुई नदी की तरह बढने और फैलने लगी । रानी की रक्षा के लिये लालकुर्ती सवार अटूट शौर्य और अपार विक्रम दिखलाने लगे । न कडाबीन की परवाह, न संगीन का भय और तलवार तो मानो उनकी ईश्वरीय देन थी । उस तेजस्वी दल ने घण्टो अङ्गरेजो का प्रचण्ड सामना किया । रानी धीरे धीरे पश्चिम-दक्षिण की ओर अपने मोर्चे की शेष सेना से मिलने के लिये मुडी । यह मिलान लगभग असंभव था, क्योकि उस भागती हुई पैदल पल्टन और रानी के बीच में बहुसंख्यक हुज़र सवार और संगीन बरदार पैदल थे । परन्तु उन बचे खुचे लालकुर्ती वीरो ने अपनी तलवारो की आड़ बनाई । रानी ने घोडे की लगाम अपने दातो में थामी और दोनो हाथो से तलवार चलाकर अपना मार्ग बनाना आरभ कर दिया । दक्षिण-पश्चिम की ओर सोनरेखा नाला था । आगे चलकर बाबा गङ्गादास की कुटी थी । कुटी के पीछे दक्षिण और पश्चिम की ओर हटती हुई पेशवाई पैदल पल्टन ।
लक्ष्मीबाई ४८७ मुन्दर रानी के साथ थी । अगल-बगल रघुनाथसिंह और रामचन्द्र देशमुख । पीछे कुँवर गुलमुहम्मद और केवल बीस-पच्चीस अवशिष्ट लाल सवार । अङ्गरेजो ने थोडी देर में इन सबके चारो तरफ घेरा डाल दिया । सिमट सिमटकर उस घेरे को कम करते जा रहे थे । परन्तु रानी की दुहत्थू तलवारे आगे का मार्ग साफ करती चली जा रही थी । पीछे के वीर सवारो की संख्या घटते घटते नगण्य हो गई । उसी समय तात्या ने रुहेली और अवधी सैनिको की सहायता से अङ्गरेजो के व्यूह पर प्रहार किया । तात्या कठिन से कठिन व्यूह में होकर बच निकलने की रणविद्या का पारङ्गत पण्डित था । अङ्गरेज थोडे से सवारो को लालकुर्ती का पीछा करने के लिये छोडकर तात्या की ओर मुड गये । सूर्यास्त होने में कुछ बिलम्ब था । लालकुर्ती का अंतिम सवार मारा गया । रानी के साथ केवल चार सरदार और उनकी तलवारे रह गई । पीछे कडाबीन और तलवार वाले दस-पन्द्रह गोरे सवार । आगे सङ्गीन वाले कुछ गोरे पैदल । रानी ने पीछे की तरफ देखा - रघुनाथसिंह और गुलमुहम्मद तलवार से अङ्गरेज सैनिको की संख्या कम रहे हैं । एक ओर रामचन्द्र देशमुख दामोदरराव की रक्षा की चिंता में बरकाव कर करके लड़ रहा था । रानी ने देशमुख की सहायता के लिये मुन्दर को इशारा किया, और वह स्वय सगीनबरदारो को दोनो हाथो की तलवारो से खटाखट साफ करके आगे बढने लगी । एक सगीनबरदार की हूल रानी के सीने के नीचे पडी । उन्होंने उसी समय तलवारो से उस सगीनबरदार को खतम किया । हूल करारी थी, परन्तु आतें बच गई । रानी ने सोचा, 'स्वराज्य की नीव का पत्थर बनने जा रही हू ।' रानी के खून बह निकला । उस सगीनबरदार के खतम होते ही बाकी भागे । रानी आगे निकल गई । उनके साथी भी दायें, बायें और पीछे । आठ-दस गोरे घुडसवार उनको पछियाते हुये ।
४८८ झाँसी की रानी रघुनाथसिंह पास था। रानी ने कहा, 'मेरी देहं को अङ्गरेज न छूने पावे।' गुलमुहम्मद ने भी सुना—और समझ लिया। वह और भी जोर से लड़ा। एक अङ्गरेज सवार ने मुन्दर पर पिस्तौल दागी। उसके मुँह से केवल ये शब्द निकले : 'बाईसाहब, मै मरी। मेरी देह... भगवान्।' अन्तिम शब्द के साथ उसने एक दृष्टि रघुनाथसिंह पर डाली और वह लटक गई। रानी ने मुस्काकर देखा। रघुनाथसिंह से कहा, 'संभालो उसे। उसके शरीर को वे छूने पावे।' और वे घोडे को मोड़कर अङ्गरेज सवारो पर तलवारो की बौछार करने लगी। कई कटे। मुन्दर का मारने वाला मारा गया। रघुनाथसिंह फुर्ती के साथ घोडे से उतरा। अपना साफा फाडा। मुन्दर के शव को पीठ पर कसा और घोडे पर सवार होकर आगे बढा। गुलमुहम्मद बाकी सवारो से उलझा। रानी ने फिर सोनरेखा नाले की ओर घोडे को बढाया। देशमुख साथ हो गया। अङ्गरेज सवार चार पाच रह गये थे। गुलमुहम्मद उनको बहकावा देकर रानी के साथ हो लिया। रानी तेजी के साथ नाले की ढीपर आ गईं। घोडे ने आगे बढने से इनकार कर दिया—बिलकुल अड गया। रानी ने पुचकारा। कई प्रयत्न किये, परन्तु सब व्यर्थ। वे अङ्गरेज़ सवार आ पहुँचे। एक गोरे ने पिस्तौल निकाली और रानी पर दागी। गोली उनकी बाई जघा में पडी। वे गले में मोती-हीरो का दमदमाता हुआ कण्ठा पहिने हुई थी। उस अङ्गरेज सवार ने रानी को कोई बडा सरदार समझ कर विश्वास कर लिया कि अब वह कण्ठा मेरा हुआ। रानी ने बाये हाथ की तलवार फेक कर घोडे की अयाल पकड़ी और दूसरी जांघ तथा हाथ की सहायता से अपना आसन सँभाला इतने में वह सवार और भी निकट
लक्ष्मीबाई ४८६ आया। रानी ने दाएँ हाथ के वार से उसको समाप्त कर दिया। उस सवार के पीछे से एक और आगे निकल पड़ा। रानी ने आगे बढ़ने के लिये फिर एक पैर की एड लगाई। घोड़ा बहुत प्रयत्न करने पर भी अड़ा रहा। वह दो पैरो से खड़ा हो गया। रानी को पीछे खिसकना पड़ा। एक जाँघ काम नही कर रही थी। बहुत पीडा थी। खून के फव्वारे पेट और जाघ के घाव से छूट रहे थे। गुलमुहम्मद आगे बढ़े हुये अङ्गरेज सवार की ओर लपका। परन्तु अङ्गरेज सवार ने गुलमुहम्मद के आ पहुँचने के' पहले ही तलवार का वार रानी के सिर पर किया। वह उनकी दाई ओर पड़ा। सिर का वह हिस्सा कट गया और दाईं आंख बाहर निकल पड़ी। इसपर भी उन्होने अपने घातक पर तलवार चलाई और उसका कधा काट दिया। गुलमुहम्मद ने उस सवार के ऊपर कसकर भरपूर हाथ छोड़ा। उसके दो टुकड़े हो गये। बाकी दो तीन अंगरेज सवार बचे थे। उनपर गुलमुहम्मद बिजली की तरह टूटा। उसने एक को घायल कर दिया। दूसरे के घोड़े को लगभग अधमरा। वे तीनो मैदान छोड़कर भाग गये। अब वहा कोई शत्रु न था। जब गुलमुहम्मद मुड़ा तो उसने देखा—रामचन्द्र देशमुख घोड़े से गिरती हुई रानी को साधे हुये है। दिन भर के थके मांदे, भूखे-प्यासे, धूल और खून में सने हुये गुलमुहम्मद ने पश्चिम की ओर मुँह फेर कर कहा, 'खुदा, पाक परवर- दिगार, रहम, रहम !' । उस कट्टर सिपाही की आँखे आसुओ को मानो बरसाने लगी और ह बच्चो की तरह हिलक हिलक कर रोने लगा। रघुनाथसिंह और देशमुख ने रानी को घोड़े पर से संभाल कर उतारा 'वेश में आकर उस अडियल घोड़े को एक लात मारी। वह अपने ॠवल की दिशा में भाग गया।