झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 492, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ४७६ 'जो आज्ञा उसने उत्साहित होकर कहा, और अपने साथियो की सहायता से तुरन्त वैसा ही किया । 'मार,' रानी ने दूसरा आदेश दिया । तोप ने धायँ किया । गोरे सवार बिछ गये । लौट पडे । रानी दूसरे स्थल पर पहुँची । वे जहाँ पहुचती वही अपने सिपाहियो पर तेज छिटक देती । यद्यपि उनके योद्धाओ की सख्या कम थी, परन्तु वे उनके प्रति अटल विश्वास रखते थे । फिर बढे । उनकी रानी उनके साथ । दोनो हाथो एक समान कौशल और शक्ति के साथ तलवार चलाने वाली । अंग्रेज वीरता के साथ लडे और बहुत मरे । रानी के उन थोडे से लालकुर्ती सवारो ने तो कमाल ही कर दिया । यथावत् आज्ञा का पालन करते हुये उन लोगो ने अंग्रेजो के छक्के छुटा दिये । ब्रिगेडियर स्मिथ को रानी ने उस दिन की चालो में और शूरवीरी में मात दी । स्मिथ उनके व्यूह को न भेद सका । उसको लक्ष्मीबाई के मुकाबले में हार कर लौटना पडा । अंग्रेजो ने उस दिन का युद्ध बन्द करके दम ली । रानी ने उस दिन निरन्तर परिश्रम किया था और उनके सरदारो ने भी । इस पर भी उन्होने रात को काफी समय तक अथक परिश्रम किया—योजनाये सुधारी, परिवर्तित की, सलाह सम्मित दी, उनके जिन योद्धाओ ने उस दिन के युद्ध में कोई विशेष कार्य किया था, उनको शाबाशी दी, और पुरस्कार दिये । और गुलमुहम्मद को कुँवर की उपाधि प्रदान की । ग्वालियर की सेना पर जयाजीराव की उस घोषणा के कारण प्रभाव पड चुका था, परन्तु उस दिन उस सेना ने कोई ऐसा स्पष्ट काम नहीं किया जिससे उस पर तात्या या पेशवा को अविश्वास होता परन्तु रानी को सन्देह था । तात्या और रावसाहब ने निवारण किया । अविश्वास करने से अब होता भी क्या था ? लाचार होकर दूसरे दिन के युद्ध में वे ही साधन काम में लाने पडे जो उनको उपलब्ध थे ।