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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४८०. झांसी की रानी [ ८६ ] अठारह जून आई। ज्येष्ठ शुक्ला सप्तमी। शुक्रवार। सफेद और पीली पौ फटी। ऊषा ने अपनी मुस्कान बिखेरी। रानी स्नान-ध्यान और गीता के अठारहवे अध्याय के पाठ से निबट चुकी। झींगुरो की झंकार पर एक एकाध चिडिया ने चहक लगाई। रानी ने नित्यवत अपने रिसाले की लालकुर्ती की मर्दाना पोशाक पहिनी। दोनो ओर एक एक तलवार बाधी और पिस्तौले लटकाईं। गले में मोतियो और हीरो की माला--जिससे सग्राम के घमासान मे उनके सिपहियो को उन्हे पहिचानने में सुविधा रहे। लोहे के कुले पर चन्देरी का ज़रतारी लाल साफा बाधा। लोहे के दस्ताने और भुजबन्द पहिने। इतने में उसके पाचो सरदार आ गये। मुन्दर ने कहा, 'सरकार घोडा लँगडाता है। कल की लड़ाई में या तो घायल हो गया है या ठोकर खा गया है।' रानी ने आज्ञा दी, 'तुरन्त दूसरा अच्छा और मजबूत घोड़ा ले आ।' मुन्दर घोड़ा लेने गई और उसने अस्तबल में से एक बहुत तगड़ा और देखने में पानीदार घोडा चुना। अस्तबल के प्रहरी ने कहा, 'हमारे सिन्धिया सरकार का यह खास घोड़ा है।' मुन्दर बोली, 'खास ही चाहिये। हमारी सरकार की सवारी में आवेगा।' प्रहरी--'झाँसी की रानी साहब की सवारी में ?' मुन्दर--'हाँ।' प्रहरी--'खैर ठीक है। हमारे सरकार जब इस पर बैठते थे बहुत ऊबते थे। इसके जाने से कुछ रञ्ज होता है।' मुन्दर--'क्यो ?' प्रहरी--'जब सरकार इसको न पावेगे दुखी होगे।' मुन्दर जल्दी में थी। घोडा लेकर चली गई। रानी ने अपने सरदारो को हिदायते दीं।