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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 526 में से

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पृष्ठ 482

लक्ष्मीबाई ४६६ 'तब निस्सन्देह हम लोग सब व्यर्थ हो जायेगे।' अङ्गरेजो की पलटने सब दिशाओ से अपने ऊपर टूटने के लिये आ रही हैं। थोडा-सा ही समय रह गया है। अपनी सेना को छावनी-बन्द कीजिये। कायदा वर्तिये। किले मे बन्द होकर लडने की बात मत सोचिये। अंग्रेजी फौज का आगे बढकर सामना कीजिये। और सबसे प्रथम सिन्धिया की इस सेना को अपने सरदारो में बाटकर कडा अनुशासन जारी कर दीजिये।' 'हो जायगा बाईसाहब, सब हो जायगा। इस समय भी कुछ आवश्यक काम ही हो रहा है। धर्म की नीव पर ही सब कुछ टिकता है। धर्म ही विजय का कारण होता है। इसलिये धर्म कराया जा रहा है। ब्राह्मण भोजन से विजय का आशीर्वाद मिलेगा। दूर दूर के ब्राह्मण, भोजन और दक्षिणा के लिये उमडे चले आ रहे हैं। इनका आशीर्वाद क्या विफल जायगा ?' 'में नही कहती कि ब्राह्मण भोजन मत करवाइये, परन्तु सेना के सुप्रबन्ध और आगे बढकर अग्रेज़ो से मोर्चे ले लेने के सगठन को उतना ही महत्व तो दीजिये।' 'आप हैं। तात्या है। वादा के नवाब साहब हैं। आप लोगो के रहते अंग्रेज हमारा क्या बिगाड सकते हैं ?' अँग्रेज अत्यन्त चालाक और उद्योग शील हैं। जो समय आप नाच रग को देते हैं, उस समय को वे लोग अपनी योजनाओ के सृजन में व्यस्त करते हैं।' 'अपनी योजनाये तो बनी बनाई रक्खी हैं। और क्या करना है ? एक बात शेष थी, वह हो गई। जनता और फौज राजा के सिवाय और किसी का नायकत्व ग्रहण नही करती, सो मैने पेशवाई स्वीकार कर ली है। जब तक ऐसा न करता तब तक जनसामान्य मुझको एक साधारण जन समझता और हम लोगो के नायकत्व को मानता ही नही।' 'आप में ये बडे परिवर्तन देखकर मुझको अचम्भा होता है।'

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