झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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इन उत्सवो का प्रतिरोध करने के लिये रानी ने पेशवा से भेट करने का प्रयत्न किया, परन्तु वहाँ नाच से छुट्टी मिली तो भग और निद्रा, और भग निद्रा से निस्तार पाया तो नाचरग । तात्या इस नाचरंग में डूब तो गया ही, उसको यह घमड भी हो गया कि कोई भी अङ्गरेज जनरल उसका मुकाबला नही कर सकता । निदान एक दिन तीसरे पहर रानी को ऐश्वर्य प्रमत्त पेशवा से थोडी देर की भेट प्राप्त हो गई । रानी उदास थी और क्षुब्ध । पेशवा सोकर उठा था । रात की खुमारी और सवेरे की भग की छाया अब भी शेष थी । आंखे लाल थी और शरीर अङ्गड़ाइयां चाहता था । अभिवादन के बाद उसने रानी से कहा, 'बड़ी गरमी पड रही है । न दिन चैन, न रात ।' 'कभी कभी बदली हो जाती है दस, पाच दिन मे वर्षा हो उठेगी ।' 'अभी तो नक्षत्र तप रहे हैं।' 'परन्तु इन्ही दिनो में छत्रपति और पत प्रधान सबसे अधिक पराक्रम दिखलाया करते थे ।' 'आपने भी तो इन्ही दिनो वह कर दिखलाया जो ग्वालियर के महा- राज और अङ्गरेज कभी न भूलेगे ।' 'और इन्ही दिनो हमारे आपके ऊपर विपद के वे बादल उठ रहे हैं, जो थोडे दिनो में कष्टो की मूसलाधार वरसावेगे ।' 'हमारी सेना डटकर लडेगी । तब तक पानी बरस पडेगा । नदी नाले ऐसे चढेगे कि दुश्मन हमारा कुछ भी न कर सकेगे ।' 'ये ही नदी नाले हम लोगो को भी निरुपाय और असमर्थ कर डालेगे । सेना में वैसे ही काफी अव्यवस्था है । फिर तो वह अकर्मण्य होकर निस्तेज ही हो जायगी ।' 'अपने पास इतना वडा किला तो है, वाईसाहब ।' 'और यदि किला छिन गया तो ?'