भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 473

४६० झाँसी की रानी अगवानी के लिये सलामी दाग रही है ! उस क्षण पेशवा की सेना में लडाई की कोई तैयारी न थी । रानी की आज्ञा पर रघुनाथसिंह ने तुरन्त तैयार हो जाने का बिगुल भी बजाया, परन्तु उस नक्कारखाने में इस तूती की आवाज को कौन सुनता था ? जब सिन्धिया के गोलन्दाजो ने पेशवा की छावनी पर ताक ताक कर गोलाबारी की, तब भगदड मच गई। परन्तु रानी, उसके दलपति और सवार पहले से कमर कसे तैयार थे । तात्या टोपे को छावनी का बरकाव करने के लिये कहकर रानी लक्ष्मीबाई सिन्धिया सरकार की सेना पर केवल दो सौ सवार लेकर टूट पडी । कुछ गोलन्दाज मारे गये, कुछ तोपें छोडकर भागे । तात्या ने तुरन्त अपनी छावनी के दो भाग करके उसको गतिवान किया और उसे एक ओर हटा ले गया — वह इस विद्या में अत्यन्त निपुण था । लक्ष्मीबाई के पराक्रम को, और तात्या की दोनो टुकडियो को दूसरी दिशा से आता हुआ देखकर, सिन्धिया के वे छह हजार पैदल मैदान खाली कर गये, परन्तु बारह सौ भडकीले सवारो का सपाटा पडा । थोडी देर तक तलवार चली और खूब चली, परन्तु वे रानी के सवारो की टक्कर को न झेल सके; कटने और भागने लगे । जयाजीराव को तुरन्त मैदान छोड़कर भागना पडा । पहले राजमहल का रास्ता पकडा, फिर वह और दिनकरराव, दो एक विश्वसनीय सरदारो को लेकर धोलपूर होते हुये आगरा पहुंचे । वहा किले में उन लोगो को शरण मिली ।