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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 472

लक्ष्मीबाई ४५६ गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग ने इग्लैंड को तार दिया, 'यदि सिन्धिया बलवाइयो में शामिल हो जाय तो मुझको कल ही बँधना बोरिया बाघकर यहा से चल देना पडेगा ।'* तात्या ने रावसाहब इत्यादि को ग्वालियर का हाल दूसरे दिन लौटकर सुनाया । रानी ने तुरन्त श्राक्रमण कर देने की सलाह दी । रावसाहब ने सिन्धिया सरकार को एक पत्र लिखा जिसका तात्पर्य यह था कि हम दक्षिण की ओर स्वराज्य-स्थापना के प्रयत्न में जा रहे हैं। श्राप हमारे पुराने नाते का स्मारण करिये और हमें सहायता दीजिये । दिनकरराव ने जो उत्तर दिया, वह गोल मटोल था । न उसमें हामी थी और न इनकार । दिनकरराव ने रेजीडेट को सूचना भेज दी । पेशवा की सेना कालपी के युद्ध के चार दिन बाद ग्वालियर राज्य में धस गई। सिन्धिया सरकार का एक अफसर चारसौ पैदल और डेढसौ घुड सवार लेकर रोकने के लिये पहुँच गया । वह जरा सी डाट फटकार में ही पीछे हट आया। दो दिन बाद रावसाहब की सेना ग्वालियर से नौ मील की दूरी पर एक गाव के पास ठहर गई । रावसाहब ने सिन्धिया को एक पत्र फिर सहायता के लिए लिखा । इस पर ग्वालियर की राजसभा में विवाद हुआ । राजा का इरादा था 'बलवाइयों' पर तुरन्त हल्ला बोल देने का । दीवान की नीति थी ह्यूरोज के आने तक 'बलवाइयो' को किसी बहाने अटकाये रहना । और अपनी सेना को किसी प्रकार काबू में रखना । राजा ने नही माना और पहली जून को मुरार के पूर्व बहादुरपुर गाव के निकट पेशवा का मुकाबला करने के लिये छ हज़ार पैदल, बारह सो भड़कीले सवार और आठ आधुनिक बडी तोपें लेकर मोर्चा जा पकड़ा । प्रात काल होते ही सिन्धिया ने पेशवा की ओर गोले फेकने शुरू कर दिये । जब तक सिर पर गोले नही पड़े, रावसाहब और तात्या ने भी समझा कि ग्वालियर की तोपे पेशवा को 'If the Scindhia joins the mutiny I shall have to pack off-morrow'