झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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सन् १८४४ मे अंग्रेजों ने सिन्धिया की सेना को, जो होलकर सिन्धिया के परस्पर युद्धो के कारण पहले ही क्षीण हो चुकी थी, पराजित किया था। तब से ग्वालियर को केवल दस सहस्र सिपाही रखने का अधिकार रह गया था और तब से लगातार अंग्रेज रेजीडेंट ग्वालियर का शासन सूत्र अपने हाथ में रखे रहा था। सन् १८५३ में जयाजीराव को शासनाधिकार मिल गये, परन्तु सूत्र रेजीडेट के ही हाथ में रहा। बची खुची सलाह सम्मति के लिये आगरा में लैफ्टिनेट गवर्नर था ही। ग्वालियर में सिन्धिया की दस सहस्र सेना के अतिरिक्त, पोषिक एक अंग्रेजी सेना भी थी। इस पोष्य (सबसीडियरी) सेना ने भी सन् ५७ के विद्रोह में भाग लिया। तांत्या यहा आया-जाया करता ही था। यह सेना तात्या के साथ कानपुर पहुच गई, परन्तु इस सेना ने जयाजीराव और दीवान दिनकराव के कौशल के कारण ग्वालियर स्थित अंग्रेजों का कुछ भी नही बिगाड पाया और वे सुरक्षित आगरा पहुँचा दिये गये, जयाजीराव ने किसी प्रकार अपनी सेना को शान्त रक्खा। यदि ग्वालियर राज्य अंग्रेजों के विरुद्ध हो जाता, तो निजाम और सिक्ख राजाओ के कम्पनी-भक्त रहते हुये भी, अंग्रेजी राज्य हिन्दुस्थान में किसी प्रकार भी नही टिक सकता था। ग्वालियर कोई बड़ा प्रबल राज्य नही था, परन्तु ग्वालियर के विरुद्ध होते ही, अंग्रेजी राज्य के खिलाफ स्वराज्य का सक्रामक गुण इतनी प्रचडता और वेग के साथ आसपास के राज्यो, विन्ध्य खण्ड और दक्षिण भारत में फैलता कि अंग्रेजी राज्य उससे बच ही नही सकता था। जब तात्या ग्वालियर पहुँचा तब उसने वहा की सेना के एक बडे अङ्ग और अधिकतर सरदारो को रानी तथा पेशवा के बहुत कुछ अनुकूल पाया। सिन्धिया सरकार को पेशवाई सेना के गोपालपूर में आ जमने की सूचना मिल गई थी। गवर्नर जनरल को तुरन्त समाचार दिया गया और अपनी दृढ तथा प्रबल राजभक्ति का पक्का आश्वासन।