भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४४८ झाँसी की रानी बांदा के नवाब ने अपनी घबराहट प्रकट की, 'हैदराबाद के निज़ाम के मारे नागपूर के पड़ौस में ठहर पाना दूभर हो जायगा।' तात्या बोला, 'निज़ाम का कोई भय नही। वहा की जनता तुरन्त हमारा साथ देगी।' रावसाहब—'वहा से महाराष्ट्र सरक जाने मे बड़ा सुभीता रहेगा। पहाडियां, किले, घाटियाँ और नदिया बारगी और भूबँधी-दोनो प्रकार की लड़ाइयो के लिये बहुत उपयोगी हैं।' नवाब—'परन्तु वहा तक पहुचेगे कैसे?' तात्या—'पहुँचाने का जिम्मा मै लेता हू।' नवाब—'जासूसो से जो खबरे मिली हैं, उनसे हर हालत मे इस नतीजे पर पहुँचने के लिये विवश हूँ कि हम लोग विजडे में फँस गये हैं।' रावसाहब—'अवध की तरफ चलना ज़्यादा अच्छा होगा। अवध पास है। मार्ग सीधा है। वहा की जनता अदम्य है। लखनऊ का पतन हो गया तो क्या हुआ। नाना साहब अभी वहा हैं। बेगम साहब भी हैं। तात्या—'अवध में हम लोग बहुत काम कर सकते है। एक बाधा अवश्य है।' रावसाहब—'वह क्या?' तात्या—'उस प्रदेश में किले बहुत कम हैं।' नवाब—'एक बडी बाधा और है। अङ्गरेज़ो की बेशुमार पलटने अवध मे फैल गई हैं, और ज्यादा कलकत्ते से आ रही हैं।' एक सरदार—'मेरी समझ में तो यह आता है कि छोटी छोटी टुकडियो में बट कर, इधर उधर फैल जाओ और अङ्गरेजी इलाके की लूटमार शुरू करदो।' दूसरा सरदार—'और नये नये लोगो को इन टुकड़ियो में भर्ती करते जाओ। एक दिन काफी बडी सेना बिना परेशानी के अपने पास हो जावेगी तब हम लोग अङ्गरेज़ो को चित कर देगे।' तात्या—'इसमें कितने दिन लगेगे?'