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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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रावसाहब—'समय की चिन्ता क्या है ? अंग्रेजी सेना में फिर कोई बलवा होगा। तोपें हाथ आ जायेगी और काम बन जायगा।' नवाब—'लेकिन तोपे अब हिन्दुस्थानी फौज के हाथ में कभी नही आवेगी। तोपखानो को अँग्रेज़ अपने हाथ में रखने लगे हैं।' एक सरदार—'परन्तु जनता के पास तो हथियार हैं।' नवाब—'जब तक आप फौज इकट्ठी करेगे तब तक अँग्रेज़ लोग सारी जनता के हथियार अपने मालखाने में रखवा लेंगे।' रावसाहब—'कही कालपी फिर वापिस मिल जाय तो सब दिक्कतें दूर हो जायें।' नवाब—'हम तो चाहते हैं कि दिल्ली और लखनऊ भी हाथ में आ जायें, मगर चाहने से होता क्या है ?' सरदार—'मेरा कहना मानिये। टुकडियो में बटकर लूटमार शुरू कर दीजिये।' तात्या—'जनता साथ न देगी।' रावसाहब—'तुम अवध के लडाको को भर्ती करके यहा ले आओ।' तात्या—'जो आज्ञा।' नवाब—'लेकिन इसमें तो वक्त लगेगा, और, तब तक हम आप क्या करेगे ?' रावसाहब—'तो फिर राजा बखतबल्ली और राजा मर्दनसिंह को बुन्देलखण्डी सेना सहित फिर बुलवाओ।' नवाब—'उनको हमारा साथ देना होता तो गोपालपुरा में आज कभी के आ जाते।' रावसाहब—'तब फिर क्या किया जाय ?' सरदार—'राजपूताने की तरफ चलिये। वहा की छावनियो ने अभी तक कुछ नही किया है।' तात्या—'वहा की छावनिया बहुत करके अपना साथ देगी।'