झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५० ,झाँसी की रानी रावसाहब—'मेरा मन दक्षिण भारत के लिये बहुत बोलता है।' नवाब—'परन्तु वहां तक पहुँचे कैसे ?' तात्या—'मैं पहले ही निवेदन कर चुका हूँ कि पहुंचा मैं दूँगा।' नवाब—'मै भी जरा पहले अर्ज कर चुका हूँ कि झांसी, सागर, सीहोर वगैरह मे बहुत सी अग्रेजी फौज है और हम यहाँ पिंजड़े मे फँस गये हैं।' सरदार—'तब फिर अग्रैजो के हाथ अपने को सौंप दिया जाय ?' नवाब—'वह तो मैने हरगिज नही कहा।' रावसाहब—'तब फिर किसी अग्रेजी छावनी पर एकदम टूट पड़े' और उसको चीरते हुये आगे बढकर भाग्य की परीक्षा करे। नवाब—'परन्तु बिना बडी तोपो की मदद के छावनी के ऊपर हमला करना मौत के मुँह में जाना है।' रावसाहब—'यदि तात्या महाराष्ट्र में जाकर जनता को जाग्रत करदे तो अग्रेज़ वहा उलझ जायँगे और तब हम सरपट महाराष्ट्र में. 'पहुँच सकते हैं।' नवाब—'लेकिन फिर वही सवाल उठता है कि तब तक हम लोग यहा क्या करे ?' तात्या—'रानी साहब की राय ली जाय।' रावसाहब—'मै रानी साहब की राय की बहुत कदर करता हू। वे बहुत अच्छी सैनिक हैं और लडाई के मैदान में विजय भी प्राप्त करा सकती हैं, परन्तु स्त्री हैं और जितना ससार हम लोगो ने नापा है उतना उन्होने नही।' नवाब—'इस पर भी उन्होने दस महीने खूबी के साथ झाँसी का राज्य किया। ऐसा कि प्रजा उन पर कुरवान हो गई।' रावसाहव—'यह सब ठीक है, बिलकुल ठीक है। सलाह लेने में कोई हर्ज नही। मानना न मानना अपने हाथ में है।' तात्या—'उनको सबेरे लिवा लाऊँ ?'