झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ४५१ सरदार—'सवेरे ज़रा वाद । सवेरा होने में बहुत देर भी नही है । वे अपने भजन-पूजन से निवृत्त हो जायेंगी, तब तक , अपुन लोग ज़रा नशा-पत्ता करेंगे । कई दिन से नही छनी है । कही से कोई अच्छी सलाह न मिली तो विजया भवानी सिर पर चढकर सब कुछ बोल-बता देगी ।' रायसाहब—'बड़ा अच्छा है । अभी अंग्रेज हम लोगो से काफी दूर हैं । हवा पर बैठकर तो आये नही जाते । परतु भाई गहरी न छने । नही तो रानीसाहब कुछ ज्यादा डाट-फटकार करेगी ।' इस तरह रात भर यह विवाद जारी रहा, परन्तु ये लोग किसी भी निश्चय पर न पहुँच सके । प्रत काल के उपरान्त तात्या रानी को लिवा लाया । तात्या ने उनको रात के अधिवेशन का संक्षेप में वृतान्त सुना दिया था । लोग भग पीकर निवृत हो गये थे, हुक्के गुडगुडा रहे थे कि वे आ गई । लोग उनका अदब करते थे, इसलिये हुक्के हटा दिये गये । पेशवाई सेना की आधोगति का उनको पता था । तो भी उन्होने अपने क्षोभ को दबाकर परिस्थिति को भली भाति समझने के लिये प्रश्न किये जो उत्तर मिले उनका निचोड वही था जो रात की बैठक में वादा के नवाब ने बतलाया था—'हम लोग पिंजडे मे फंस गये हैं ।' रानी ने कहा, 'अव तक हम लोग जहा जहा अंग्रेजों से जम कर लड पाये, वहा वहा किलो का आश्रय लेकर । फिर किसी मजबूत किले को हाथ में करना चाहिये । तोपे सहज ही ढल जायगी । काम चालू हो जायगा ।' रावसाहब—'परन्तु झाँसी और कालपी के किले तो फिर नही मिल सकते-कम से कम अभी हाल हाथ नही आसकते ।' रानी—'इनको कुछ दिनो विचार से अलग रखिये । तात्या—नरवर का किला बहुत अच्छा है । निकट सिन्ध नदी है । आसपास पहाड जगल है ।