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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४५२ झांसी की रानी

नवाब--'करेरा का भी किला अच्छा है।' रानी--'न।' रावसाहब--'तब फिर कौनसा किला?' रानी—'ग्वालियर का। वही यहा से अत्यन्त निकट है।' रावसाहब—'ग्वालियर का किला !' नवाब--'ग्वालियर का !' रानी—'हां ग्वालियर का। ग्वालियर की वस्तुस्थिति का पुनः अनुसन्धान करके तुरन्त ग्वालियर पर आक्रमण कर देना चाहिये। राजा और वहां के दो तीन सरदार अँग्रेज कम्पनी के पक्षपाती हैं। परन्तु सेना और जनता नही है। सेना यदि हमारा पक्ष प्रबलता के साथ न भी पकड़ेगी तो ढुलमुल अवश्य रहेगी। ग्वालियर में बनी बनाई सजी सजाईं, बढ़िया तोपें, गोले, गोली, सैकड़ो मन बारूद और अन्य प्रकार की युद्ध सामग्री तथा अटूट कोष है।' नवाब—'लेकिन...' रावसाहब—'हां, परन्तु ..' रानी—'किन्तु, परन्तु, कुछ नही । बिना किले के कोई भी प्रयास आत्मवध के समान होगा, और सिवाय ग्वालियर के किले के हमारे लिये सब किले इस समय स्वप्न हैं।' रावसाहब—'बात तो ठीक कह रही है बाईसाहब, आप भी सोचिये नावब साहव। क्यो तात्या ?' नवाब—मै रानी साहब की राय को मानने के लिये तैयार हूँ। लेकिन ग्वालियर की सेना या कुछ सरदारो को, चढाई के पहले मिला लेना चाहिये।' तात्या—'वहां का हाल मुझको मालूम है। माहुरकर, बलवन्तराव और दिनकरराव दीवान के सिवाय और सब सरदार स्वराज्य-स्थापना के पक्ष में हैं। सेना का काफी अंश हमारा साथ देगा।'