भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 458

लक्ष्मीबाई ४४५

होने लगा रईस सेनापतियो ने भागने का विचार किया । रानी ने डाटना- फटकारना व्यर्थ समझकर उनको धैर्य धराया, कहा, 'अब जहा हो वही बने रहो, भगदड मत मचायो मै इनके तोपखानो को बन्द करती हू । जिस समय तोपखाने बन्द हो जाये, दो पार्श्वो से घुडसवार और बीच में पैदल बन्दूकची भेजना ।' रानी को केवल ढाईसौ सवार दिये गये थे । ये सवार अपने नेता को पहिचान गये थे और उन लोगो की उनके प्रति अपार भक्ति थी । रानी ने इन लोगो के पाच भाग किये और एक एक को देशमुख, गुलमुहम्मद, रघुनाथसिंह, जूही और अपने अधीन रखा । मुन्दर उनके साथ उनकी नायवी में रही । रानी ने यमुना के एक टीले की ओट से दूरबीन लगाकर रण क्षेत्र का निरीक्षण, कुछ क्षण किया । वे रोज के कमजोर बाजू को ताड गई । रानी ने अपने पाचो दस्तो को रोज के 'दाहिनी पार्श्व की ओर कुछ दूर जाकर घुमाया, और फिर टूट पडी । जैसे चिडियो के ऊपर बाज ? यह आक्रमण अग्रेजो को तूफान की तरह लगा और वे एक दम पीछे हटे । अंग्रेज अफसर और सिपाही कट कट कर गिरने लगे । रानी ने ऐसे शौर्य, ऐसे विवेक और ऐसे कौशल के साथ युद्ध किया कि अग्रेजो का तोपखाना थोडी देर के लिये बिलकुल बन्द हो गया । गोलन्दाज उस तूफानी हमले से स्तब्ध रह गये । रानी तोप के मुहानी पर बीस फीट के फासले तक मारती काटती पहुच गयी ।। अब कान्पी की सेना आगे बढी। परन्तु सैनिक इतनी भग पिये हुये थे कि आज्ञाओ का ठीक ठीक पालन ही नही कर सकते थे । केवल रानी का एक अद्भुत पराक्रम इन सैनिको के नशे को और उनके सरदारो की मूर्खता को ढक रहा था—] रानी ने अपने घोडे की लगाम मुह में दाबी और दोनो हाथो से तलवारो के वज्रपात करने लगी । पेशवा—सेना बहादुरी के साथ लडने लगी । जो अंग्रेज गोलन्दाज रानी और उनके दस्तो द्वारा काटने से बचे, वे मैदान छोड़कर भागे । ब्रिगेडियर स्टुअर्ट ने देखा कि बाजी खिसकी ।