झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४४ झांसी की रानी [ ८२ ] रानी ने निर्देशन किया था : 'जो सरदार जिस मोर्चे को बांधे हो वही डटकर लड़े, किसी प्रलोभन या उत्तेजन में आकर ,अपने स्थान को छोड़कर अङ्गरेजी सेना के ऊपर न झपटे। जब रिसाले या पैदल पल्टन को आदेश हो तभी वह बतलाई हुई दिशा में हमला करे।' रावसाहब ने समर्थन करते हुये कहा था, 'ऐसा ही होगा; ऐसा ही हो। सब लोग गांठ बांध लेना।' रावसाहब सहज सन्तोषी और परम महत्वाकांक्षी था। यदि नाना साहब लखनऊ के जय-पराजय के क्रमावर्त में न फँसा होता और कालपी में होता तो वह, लक्ष्मीबाई और तात्या, रोज़ सरीखे अत्यन्त योग्य और रणकुशल सेनापति के लिये भी काफी से अधिक प्रबल बैठते। परन्तु रावसाहब की लोकप्रियता, उसकी उदारता, शिथिलता और सहजवर्ती स्वभाव के कारण थी, न कि योग्यता के कारण। वह प्रधान सेनापति की आज्ञाओं का विधिवत पालन करा ही नही सकता था। इस कार्य के लिये तो रानी का सा तेजस्वी और तपस्वी व्यक्तित्व ही ठीक बैठ सकता था। रोज़ को इस मोर्चाबन्दी का पता आसानी से लग गया। उसने अवगत कर लिया कि जहा मोर्चादारो से उनका ठिया छुटवाया कि गडबड़ फैल जायगी। कोच की मार और रानी की भर्त्सना के कारण पेशवाई सेना अंग्रेज़ो को मार मिटाने के लिये दास पीस रही थी, अपनी वासना को सहायता पहुँचाने के लिये सेना ने भग भी खूब पी। रानी का निषेध न चला। रोज का एक छोटा सा दस्ता हल्का तोपखाना लिये आगे आया। कालपी की सेना ने समझा कि रोज़ की सम्पूर्ण सेना आ गई। ठिया छोड़ छोड़कर उस पर दौड़ पड़े। गोलाबारी हुई। असमय मार काट शुरू हो गई। रानी ने मना करवाया, परन्तु राव नियन्त्रण न कर सका। रोज ने मौका ताककर इर्द गिर्द वाले अपने दस्तो द्वारा गोलाबारी शुरू कर दी और कालपी की सेना का ठिये छोड़ देने के कारण अविलम्ब सर्वनाश