झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ४३६
तात्या का दिल धडका । उसने धडकन दबाई । मुट्ठी बाधी और हिम्मत को कडा किया । तात्या—'अभी तो केवल यह प्रार्थना है कि आप रावसाहब के शिविर में चले, वहा बादा के नवाब साहब, मदनपूर और बानपूर के राजा साहब बैठे हुये हैं । आपके नृत्यगान का रसास्वादन करना चाहते हैं ।' जूही—'ओह, यह बात ! यह प्रार्थना ! सरदार साहब, मैं आपको मन ही मन अपना हृदय भेट कर चुकी हूँ, परन्तु आपको इतना स्मरण रहे कि मैं झासी की रानी की सिपाही हूँ और किसी राजा या नवाब से अपने को कम नही समझती । ये लोग समझते होगे कि मै वेश्या पुत्री हू । परन्तु वेश्या नही हू, और न नाचने गाने का पेशा करती हू । मेरा प्रस्ताव उस मण्डली में किसने किया, सरदार साहब ? और आपके मुँह से यह प्रस्ताव निकला कैसे ?' तात्या—'मैने नही किया जूही । आप मेरा विश्वास करो । मै राव- साहब की आज्ञा को देवता की आज्ञा के समान समझता हू । उन्ही के कहने से आपके पास आने का साहस किया ।' जूही—'आप आप कहकर मेरा अपमान मत कीजिये । मै आपके लिये तुम हूँ । उन लोगो से कह दीजिये कि मैं उनके लिये उस रानी की कर्नल हूँ, जो जनरल रोज के परदादो को कब्र में हिला डालने की हिम्मत और तरक़ीब रखती है ।' तात्या चला गया । जब तक वह पेशवा के सामने पहुचा तब तक भङ्ग ने अपना गहरा रङ्ग चढा दिया था । वे लोग अपनी धुन को इस बीच में भूल गये थे और किसी दूसरी धुन को पकड लिया था । इसलिये तात्या को बात बनाने की ज़रूरत नही पडी । जूही रानी के शिविर में लौट आई । रानी गीता के परायण से उसी समय फारिग हुई थी । रानी ने साधारण प्रश्न किया, 'कहा हो आई जूही ?'