झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ४४१ [ ८१ ] दूसरे दिन समाचार मिला कि लुहारी के किले का पतन हो गया और रोज कोच के ग्रसने के लिये आ रहा है । पेशवा इत्यादि की सेना को अपने अग्रभाग का सुदृढ और सुसगठित प्रबन्ध करके लड़ने का अभ्यास सा पड गया था। रोज जानता था कि इनकी सेना का पृष्ठ भाग उतना व्यवस्थित नही रहता । इसलिये उसने विरोधी सेना पर आक्रमण करने के लिये अपनी सेना के तीन भाग किये । दो को कोच की सेना के पीछे दायें वायें भेज दिया और एक को सामने ले चला । पेशवा की सेना को उसके केवल सामने वाले दस्ते का पता लगा और उसी से तात्या को भिडा दिया । लक्ष्मीबाई को पीछे की ओर रक्खा । दोनो ओर से बिकट युद्ध हुआ । बँधे इशारे पर रोज के पीछे वाले दस्तो ने धावा किया और उनकी तोपो के प्रहार से कोच की सेना बुरी मार खाकर भागी। तात्या और लक्ष्मीबाई ने अपने कौशल से उसको रोज के व्यूह से बचा निकाला । रोज ने कोच को ले लिया । आठ तोपें हाथ आईं और बहुत सी युद्ध सामग्री । रोज को बहुत आश्चर्य इस वात पर था कि सबके सब सरदार और वाकी सेना तथा सामान किस हिकमत से और कौन निकाल ले गया । उसका सन्देह वार वार झाँसी की रानी और तात्या टोपे पर जाता था । तात्या कोच से निकल कर कालपी नही गया ।, वह अपने पिता के पास चला आया । उसने उस समय, पेशवा की भी कदाचित् केवल उस समय, अनसुनी करदी । पेशवा ने अपनी सेना के साथ कालपी में आकर दम लिया । शायद उस रात भङ्ग नहीं छनी । दूसरे दिन पेशवा ने आगे की योजना बनाने के लिये सरदारो का दरवार किया । रानी भी दरवार में थी ।