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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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६२ झाँसी की रानी [ १७ ] राजा गंगाधरराव और रानी लक्ष्मीबाई का कुछ समय लगभग इसी प्रकार कटता गया । सन् १८४० में (माघ सुदी सप्तमी स० १६०७) वे सजधज के साथ (कम्पनी सरकार की इजाजत लेकर !) प्रयाग, काशी, गया इत्यादि की यात्रा के लिये गये । लक्ष्मीबाई साथ थी । उनको किले में बन्द रहना पडता था, इस यात्रा में भी तामझाम इत्यादि बन्द सवारियो में चलना पडा, परन्तु नए-नए स्थान देखने के अवसर मिले । इस कारण बन्धनो का क्लेश न अखरा । काशी-यात्रा मे उनको देव-दर्शन और जन्म-गृह दर्शन प्राप्त हुये । गगाधरराव का क्रोध समय-कुसमय न देखता था । एक दिन काशी नगर मे सैर के लिये निकले । एक विचारा राजेन्द्र बाबू मार्ग में पड गया । उसने प्रणाम तो किया, परन्तु खडे होकर ताजीम नही दी । शामत आगई । गगाधरराव ने उसको बेहद पिटवाया । उसने कम्पनी सरकार मे फरियाद की । जवाब मिला, 'गगाधरराव एक बडे राजा हैं । यदि तुमको खडे होकर ताजीम देना पसन्द न था तो अपने घर मे बैठे रहते !' रानी को यह सब देख सुनकर काफी क्लेश हुआ था । तीर्थयात्रा के लिये झाँसी छोडने के पहले जब गगाधरराव को कम्पनी सरकार ने शासन के अधिकार वापिस किये तब पहले का जमा किया हुआ तीस-लाख रुपया कम्पनी ने उनको लौटाया था । उसका उन्होने अपव्यय किया । अपने अनेक हाथियो में उनको सिद्धबकस नामक हाथी बहुत प्यारा था । उसका सारा सामान सोने का बनवाया । और भी अनेक हाथी घोडो का सामान-अम्बारी, हौदा, जीन, झूले इत्यादि-सोने की बनवाई । काशी से एक तामझाम, जिस पर बढिया नक्कासी का काम था, बहुत कीमत देकर मँगवाया । और भी काफी राजसी-ठाट इकट्ठा किया । राजा प्रदर्शन के बहुत प्रेमी थे । रानी को प्रदर्शन बहुत कम

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