झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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पसन्द था । परन्तु उनको राजा की एक बात अच्छी लगी—उन्होने पाच हजार के लगभग सेना कर ली, लगभग दो सहस्र गोल पुलिस, पाचसौ घोडो का रिसाला, सौ खास पायगा के सिपाही और चार तोपखाने । झाँसी राज्य में और बुन्देलखण्ड में लगभग हर जगह आताताई और डाकू-बटमार बडा उपद्रव कर रहे थे । गंगाधरराव ने अपने कठोर शासन से इनका दमन किया इस कार्य मे उनको अपने प्रधान-मन्त्री राघव रामचन्द्र पन्त, दरबार वकील नरसिंहराव, और न्यायाधीश वृद्ध नाना भोपटकर से बहुत सहायता मिली । राजा के शासन से अँगरेज सन्तुष्ट थे, क्योकि उपद्रवो का शान्त करना ही राजा का सबसे बडा कर्तव्य समझा जाता था । राजा गंगाधरराव ने कई मौकों पर अँगरेजो की बहुत सहायता की । एक बार अपने विश्वस्त साथी और फौजी अफसर दीवान रघुनाथसिंह को कुछ सिपाहियो के साथ मुहिम पर भेज दिया । दीवान रघुनाथसिंह आज्ञा- कारी योद्धा था । उसने बडी वीरता के साथ अपना कर्तव्य पालन किया । राजा गंगाधरराव को अँगरेजो की मैत्री और भी बढी हुई मात्रा में मिली और दीवान रघुनाथसिंह को इंगलैंड और कम्पनी सरकार की रानी विक्टोरिया की ओर से एक प्रशंसापत्र तथा खड्ग मिला । परन्तु रानी लक्ष्मीबाई को अपने पति के इस यश पर हर्ष नही हुआ और न सन्तोष । अभी उनकी आयु लगभग १५ वर्ष के होगी, परन्तु उनका आचार विचार आश्चर्य उत्पन्न करने वाली परिपक्वता कैसा प्रतीत होता था । उस युग की लडकियाँ जिस आयु में खेलना-खाना, पहिनना- ओढना ही सब कुछ समझती होगी, उस आयु में लक्ष्मीबाई गम्भीर और गम्भीरतर होती चली गई । छुटपन की छबीली मनू, लक्ष्मीबाई के विशाल आदर्शों में विलीन हो गई ।