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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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८५ झाँसी की रानी [ १८ ] राजा गगाधरराव पुरातन पन्थी थे । वे स्त्रियो की उस स्वाधीनता के हामी न थे जो उनको महाराष्ट्र में प्राप्त रही है । दिल्ली, लखनऊ की पर्दा के बन्धेजो को वे जानते थे । उतना बन्धेज वे अपने रनवास में उत्पन्न नही कर सकते थे । यह भी उनको मालूम था । जनता की स्त्रिया मुँह उघाडे फिरे, चाहे घूंघट डाले फिरे, इस विषय में उनको उपेक्षा थी । परन्तु अपने महल में काफी पर्दा बर्तने के वे दृढ पक्षपाती थे । इसलिए लक्ष्मीबाई किले के बाहर घोडे पर नही जा सकती थी । किले में भी उनकी स्वतन्त्रता पर काफी बन्धन था । तीर्थ यात्रा से लौटने पर किले-भीतर वाले महल के मैदान के चारो ओर ऊँची ऊँची कनाते लगवा दी गई, जिससे उनको घोडे की सवारी इत्यादि में बहुत अडचन होने लगी । मलखम्ब और कुश्ती का प्रवन्ध उनको अपने कक्ष के भीतर ही मोटे और नरम कालीनो की पर्तो पर करना पडा । उन्होने अभ्यास छोडा नही । गगाधरराव ने उनकी सहेलियो को बदलने का प्रयत्न किया, परन्तु सुन्दर, मुन्दर और काशीबाई को वे नही हटा सके । अन्तर्द्वन्द के कारण गंगाधरराव के मन में क्रोध की मात्रा बढ गई । और अपराधियो को दण्ड देने के लिए वे बिलकुल नए नए साधन काम में लाने लगे । मृच्छकटिक नाटक के खेल का दिन आया । मोतीबाई ने वसन्तसेना का अभिनय किया और जूही ने उसकी सखी का । राजा ने उस दिन नाटकशाला को खूब सजवाया । कप्तान-गार्डन् भी निमन्त्रित हुआ । खेल अच्छा हुआ । नृत्य, गायन, अभिनय सभी की गार्डन ने प्रशसा की । खेल की समाप्ति पर गार्डन के मुँह से निकल पड़ा, ‘महाराजा साहब एक बात समझ मे नही आती । आपकी सस्कृति मे वेश्याओ को इतने आदर का स्थान क्यो दिया गया है ?’ राजा ने हँसकर उत्तर दिया, ‘क्यो कि हमारे पुरखे बहुत समझदार थे’ ।