झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८५ झाँसी की रानी [ १८ ] राजा गगाधरराव पुरातन पन्थी थे । वे स्त्रियो की उस स्वाधीनता के हामी न थे जो उनको महाराष्ट्र में प्राप्त रही है । दिल्ली, लखनऊ की पर्दा के बन्धेजो को वे जानते थे । उतना बन्धेज वे अपने रनवास में उत्पन्न नही कर सकते थे । यह भी उनको मालूम था । जनता की स्त्रिया मुँह उघाडे फिरे, चाहे घूंघट डाले फिरे, इस विषय में उनको उपेक्षा थी । परन्तु अपने महल में काफी पर्दा बर्तने के वे दृढ पक्षपाती थे । इसलिए लक्ष्मीबाई किले के बाहर घोडे पर नही जा सकती थी । किले में भी उनकी स्वतन्त्रता पर काफी बन्धन था । तीर्थ यात्रा से लौटने पर किले-भीतर वाले महल के मैदान के चारो ओर ऊँची ऊँची कनाते लगवा दी गई, जिससे उनको घोडे की सवारी इत्यादि में बहुत अडचन होने लगी । मलखम्ब और कुश्ती का प्रवन्ध उनको अपने कक्ष के भीतर ही मोटे और नरम कालीनो की पर्तो पर करना पडा । उन्होने अभ्यास छोडा नही । गगाधरराव ने उनकी सहेलियो को बदलने का प्रयत्न किया, परन्तु सुन्दर, मुन्दर और काशीबाई को वे नही हटा सके । अन्तर्द्वन्द के कारण गंगाधरराव के मन में क्रोध की मात्रा बढ गई । और अपराधियो को दण्ड देने के लिए वे बिलकुल नए नए साधन काम में लाने लगे । मृच्छकटिक नाटक के खेल का दिन आया । मोतीबाई ने वसन्तसेना का अभिनय किया और जूही ने उसकी सखी का । राजा ने उस दिन नाटकशाला को खूब सजवाया । कप्तान-गार्डन् भी निमन्त्रित हुआ । खेल अच्छा हुआ । नृत्य, गायन, अभिनय सभी की गार्डन ने प्रशसा की । खेल की समाप्ति पर गार्डन के मुँह से निकल पड़ा, ‘महाराजा साहब एक बात समझ मे नही आती । आपकी सस्कृति मे वेश्याओ को इतने आदर का स्थान क्यो दिया गया है ?’ राजा ने हँसकर उत्तर दिया, ‘क्यो कि हमारे पुरखे बहुत समझदार थे’ ।