झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ८५ गार्डेन को अपने देश के क्रामवैल के समय का कठमुल्लावाद (Puritanism) और उसके तुरन्त ही बाद का, चार्ल्स द्वितीय के समय का मनमौज-वाद याद आगया । बोला, 'नही महाराज कुछ और बात है । असल में हिन्दुस्थान कई बातो में बहुत गिरा हुआ है ।' गंगाधरराव ने कहा, 'फिर कभी बात करूँगा ।' गार्डेन चलने को हुआ कि राजा ने एक कोने में खुदाबख्श को देख लिया । तुरन्त अपने अंगरक्षक से पूछा, 'यह कौन है ?' उसने उत्तर दिया, 'खुदाबख्श ।' 'यहाँ कैसे आया ?' राजा ने प्रश्न किया । अंगरक्षक उत्तर नही दे पाया । खुदाबख्श ने समझ लिया । और वह तुरन्त भीड में विलीन होकर निकल गया । गार्डेन ने पूछा, 'क्या बात महाराजा-साहब ?' राजा ने कहा, 'कुछ नही-यो ही । एक आदमी को आज बहुत दिनो के बाद नाटकशाला में देखा है ।' गार्डेन चला गया । राजा ने नाटकशाला के प्रहरी को कैद में डलवा दिया और सबेरे पेश किए जाने की आज्ञा दी । खुदाबख्श को बहुतेरा ढुंढवाया, परन्तु पता नही लगा । दूसरे दिन मोतीबाई नाटकशाला से बरखास्त कर दी गई । नाटकशाला के पात्रो को कोई कारण समझ में नही आरहा था । वे लोग आशा कर रहे थे कि इतना अच्छा अभिनय इत्यादि करने के उपलक्ष में बधाई और पुरस्कार मिलेगे, परन्तु हुआ उल्टा । उनकी सबसे अच्छी अभिनेत्री निकाल दी गई । झासी में जिन लोगो ने मोतीबाई के नृत्य को देखा था अथवा उसका गायन सुना था, सब क्षुब्ध थे । सबेरे नाटकशाला के प्रहरी की पेशी हुई । राजा ने स्वयं मुकद्दमा सुना । राजा ने खिसियाकर पूछा, 'क्यो रे नमक हराम यह खुदाबख्श नाटकशाला में कैसे आगया ?'