झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
लक्ष्मीबाई ८५ गार्डेन को अपने देश के क्रामवैल के समय का कठमुल्लावाद (Puritanism) और उसके तुरन्त ही बाद का, चार्ल्स द्वितीय के समय का मनमौज-वाद याद आगया । बोला, 'नही महाराज कुछ और बात है । असल में हिन्दुस्थान कई बातो में बहुत गिरा हुआ है ।' गंगाधरराव ने कहा, 'फिर कभी बात करूँगा ।' गार्डेन चलने को हुआ कि राजा ने एक कोने में खुदाबख्श को देख लिया । तुरन्त अपने अंगरक्षक से पूछा, 'यह कौन है ?' उसने उत्तर दिया, 'खुदाबख्श ।' 'यहाँ कैसे आया ?' राजा ने प्रश्न किया । अंगरक्षक उत्तर नही दे पाया । खुदाबख्श ने समझ लिया । और वह तुरन्त भीड में विलीन होकर निकल गया । गार्डेन ने पूछा, 'क्या बात महाराजा-साहब ?' राजा ने कहा, 'कुछ नही-यो ही । एक आदमी को आज बहुत दिनो के बाद नाटकशाला में देखा है ।' गार्डेन चला गया । राजा ने नाटकशाला के प्रहरी को कैद में डलवा दिया और सबेरे पेश किए जाने की आज्ञा दी । खुदाबख्श को बहुतेरा ढुंढवाया, परन्तु पता नही लगा । दूसरे दिन मोतीबाई नाटकशाला से बरखास्त कर दी गई । नाटकशाला के पात्रो को कोई कारण समझ में नही आरहा था । वे लोग आशा कर रहे थे कि इतना अच्छा अभिनय इत्यादि करने के उपलक्ष में बधाई और पुरस्कार मिलेगे, परन्तु हुआ उल्टा । उनकी सबसे अच्छी अभिनेत्री निकाल दी गई । झासी में जिन लोगो ने मोतीबाई के नृत्य को देखा था अथवा उसका गायन सुना था, सब क्षुब्ध थे । सबेरे नाटकशाला के प्रहरी की पेशी हुई । राजा ने स्वयं मुकद्दमा सुना । राजा ने खिसियाकर पूछा, 'क्यो रे नमक हराम यह खुदाबख्श नाटकशाला में कैसे आगया ?'
८६ झांसी की रानी उसने घिघियाकर उत्तर दिया, 'श्रीमन्त सरकार में भूल गया । मुझको याद नही रहा ।' 'तू यह भूल गया कि मे उसको देश-निकाला दे चुका हूं ?' राजा ने कड़क कर कहा । प्रहरी अत्यन्त विनीत भाव से बोला, 'इस बात को श्रीमन्त सरकार बहुत दिन हो गये इसलिये मुझको सुध नही रही । और सरकार ने उस दिन तीर्थ यात्रा से लौटने की खुशी में बहुत लोगो को माफी बख्शी सो मैने सोचा कि खुदाबख्श को भी माफी मिल गई होगी ।' इस उत्तर से राजा का क्रोध घटा नही, जरा और बढ गया । रोते हुये प्रहरी को सजा दी गई विच्छू से डसवाने की । गंगाधरराव ने एक विशेष वर्ग के अपराधो के लिये विच्छू से कटवाने का विधान कर रक्खा था । कुट्ठे में पैरो का डालना भाजना एक साधारण बात थी । गहन अपराधो में हाथ पाव कटवा डालने की जनसम्मत प्रथा जारी थी । परन्तु दवे दवे और थोडी थोडी । दहकते अगारो से डाकुओ के अग जलवाना इस विधान में शामिल था, परन्तु विच्छुओ से कटवाना जन-वृत्ति की सहन-शक्ति से बाहर हो गया था । विच्छू से कई जगह काटे जाने के कारण प्रहरी बेहद सन्तप्त हुआ अन्त में बेहोग हो गया । राजा समझे मर गया तब उनका क्रोध ठंडा पडा । प्रहरी वहा से हटवा दिया गया ।
लक्ष्मीबाई ८७
[ १६ ]
कप्तान गार्डन झासी-स्थित अङ्गरेजी सेना का एक अफ़सर था। हिन्दी खूब सीख ली थी। राजा गङ्गाधरराव के पास कभी-कभी आया करता था। राजा उसको अपना मित्र समझते थे। वह पूरा अङ्गरेज था। साहित्यिक, व्यापार-कुशल, स्वदेश-प्रेमी और भारतवर्ष को घृणा या अवहेलना की वृत्ति से देखने वाला। परन्तु भारतवर्ष के राजाओ के सहलाने-फुसलाने की क्रिया का अभ्यासी—अपने कर्तव्य पालन में दृढ। राजा से मिलने, गार्डन घोडे पर और कभी तामझाम में बैठकर आता था। नवाबो को दावते-दावते थोडी नवाबी भी अङ्गरेजो में आ गई थी। हुक्का, सुरा, रडियो का नाच, होली-फाग, दशहरा, दिवाली, ईद उत्सव इत्यादि नवाबो, राजाओ और जनता में हेलमेल बनाये रखने के लिये बर्ते जाते थे। परन्तु वे उनमें दूध-पानी नही हुये थे—उनकी सतर्क दृष्टि इङ्ग्लैंड की ओर बराबर मुडी रहती थी। राजा ने और कोई मनोरञ्जन समक्ष न देखकर, एक दिन गार्डन को बुलवाया। यह तामझाम में नगर वाले महल पर आया। वहाँ से राजा उसको किले वाले महल पर ले चले। राजा अपने तामझाम में बैठे। उत्तरी फाटक से जाना चाहते थे। बडी हथसार के नीचे से मार्ग था।* एक हाथी पागल हो गया। इन तामझामो की ओर दौडा। वाहको ने तामझाम कन्धो पर से उतार दिये। परन्तु भागे नहीं। उनकी कमर में तलवारें थी। म्यानो से निकाल लीं। गार्डन के पास कोई हथियार न था। वह हक्कावक्का सा इन मजदूरो के पास आ गया। राजा के पास तलवार थी। उन्होने नही छुई। तामझाम से बाहर निकलकर दौड़ते हुये प्रमत्त हाथी की, अपनी ओर आती हुई गति को देखने लगे। गार्डन ने कहा, 'बचो।' मजदूरो ने कहा, 'बचो।'
*इसी हथसार की जगह अब सदर अस्पताल है।
८८ झांसी की रानी राजा के मुँह से भी निकला, 'बचो !' परन्तु तलवारे उस मस्त हाथी की गति का निरोध नही कर सकती थी । इतने में एक ओर से बर्छा लिये एक सिपाही हाथी पर दौड पडा और उसने बर्छे के प्रहार से हाथी की प्रगति को लौटा दिया । राजा को उस सिपाही ने प्रणाम किया । राजा ने नाम पूछा । उसने बतलाया, 'इमामअली । काजी हू सरकार, सांटमारी भी करता हूँ ।' राजा ने कहा, 'शाबाश काजी । इनाम मिलेगा ।' इमामअली बोला, 'सरकार के चरणो में बना रहू और बाल बच्चो का पालन-पोषण होता जावे यही सेवक के लिये गनीमत है ।' राजा ने पारितोषक में कुछ जमीन लगाने की घोषणा की और वह गार्डन के साथ किले के महल में चले गये । जब दोनो दीवानखाने में बैठ गये तब भी गार्डन के मन में वह हाथी वाली घटना घूम रही थी । वह बोला, 'सरकार, इनाम रुपये की शकल में दिया जाना चाहिये । इस तरह भूमि लगाते चले जाने से राज्य में चप्पा भर भी न बचेगी !' राजा ने कहा, 'तब झांसी राज्य में बहादुर ही बहादुर नज़र आवेंगे !' गार्डन को इस असङ्गत उत्तर से सन्तोष नही हुआ । बोला, 'इस देश में जो कुछ देखता हूँ सब अति के दर्जे पर । थोडे से बहुत धनवान और बहुत से निर्धन । बिरला ही अत्यन्त धर्मनिष्ठ और बहुत से कीडो- मकोडो से ज्यादा सडी जिन्दगी बिताने वाले ! किसी को जमीनें और जागीरें । छोटे-बडे सब तरह के कामो के लिये और बहुतेरो को हलके से हलके अपराधो के लिये अङ्गहीन करने की सजा ! बिच्छुओ से कटवाने का दण्ड !'
लक्ष्मीबाई ८६ राजा का चेहरा तमतमा गया । परन्तु उन्होंने अपने को संयत करके कहा, 'जब जैसा अपराध और अपराधी सामने आवे, वैसा उसको दण्ड देना चाहिये ।' गार्डन ने भाप लिया कि राजा ने अपने उठे हुये क्रोध को भीतर का भीतर घसा लिया है । बोला, 'सरकार को शायद मालूम होगा हमारे यहाँ के एक बहुत बडे विद्वान ने हिन्दुस्तान भर के लिये एक ही दंडविधान* प्रस्तुत कर दिया है । वह बहुत विशद और न्यायपूर्ण है । जितने दंड रक्खे गये हैं कोई भी अमानुषिक नही ।' 'क्या रियासतो में भी उस विधान को जारी किया जावेगा ?' गार्डन ने तत्काल उत्तर दिया, 'नही सरकार । रियासतो को अपना निज का प्रबन्ध अपनी व्यवस्था के अनुसार करने का अधिकार है ।' राजा एक क्षण सोचकर बोले, 'हमारी सन्धियो में यह अधिकार सुरक्षित है ।' सन्धि के शब्द पर गार्डन के मन में तुरन्त खटपट उठी, परन्तु उसने खुशामद के ढङ्ग को अधिक अच्छा समझकर कहा, 'परन्तु सरकार हमारे सम्राट और भारत के गवर्नर-जनरल को उस दिन बहुत अच्छा लगेगा, जब सब रियासतो में एक ही प्रकार का न्याय, एक ही कानून और एक ही तरह की अदालतो की स्थापना हो जाय । इसमें सरकार कोई हर्ज भी नही है । नरेशो का बोझ भी बहुत हलका हो जावेगा और, जनता ज्यादा चैन की साँस लेने लग जावेगी ।' राजा ने प्रश्न किया, 'आपके राजाधिराज को बहुत अधिकार होगे ?' गार्डन असमन्जस में पड गया । परन्तु उससे अपने को उबार कर बोला, 'हमारे राजाधिराज ने अपना अधिकार पन्चायत को दे दिया है । वह पंचायत कानून बनाती है । शासन करती है ।' *लार्ड मैकाले का इण्डियन पीनल कोड (भारतीय दंड विधान) ।
६० झांसी की रानी
राजा—'पंचायतें तो हमारे यहाँ गांव-गांव में हैं। इन पचायतो के फैसले को रद्द करने की कोई भी राजा बात नहीं सोचता। ये पंचायतें अपने-अपने गाव का सभी तरह का प्रबन्ध भी करती हैं। हमारे कर्मचारी उसमें कोई दखल नही देते। केवल बडे बडे मामले मुकद्दमे मेरे सामने आते हैं। उनको नाना—भोपटकर शास्त्री की सलाह से निबटाता हूँ। गार्डन—'इसमें, सरकार, सहूलियत होने पर भी तरतीब, नियम-सयम जाब्ते-कायदे की कमी है और अन्याय होने की ज्यादा गुञ्जायश है।' राजा—'आपके देश में क्या पंचायतें नहीं हैं?' गार्डन—'युग बीत गये, जब थीं। उनका रूप बदल गया है। न्याया- धीश को सम्मति देने और मामले का निर्धार न्याय कराने में पचायत सहयोग देती हैं। इस पंचायत के सहयोग के बिना मुकद्दमा नही होता।' राजा—'हमारे देश की पंचायते तो इससे भी बढकर समर्थ हैं। राज्य लोट-पोट जाते हैं, परन्तु पंचायतें अमर रहती हैं।' गार्डन को हिन्दुस्तानी पञ्चायतों का यह वर्णन बहुत खटका। अपने क्षोभ को थोडा-बहुत दबाकर उसने कहा, 'अपढ-कुपढ लोगो की पञ्चायतो के ढङ्ग मैले कुचैले ही हो सकते हैं, सरकार। अदालतो की सफाई और निखार को पचायते कैसे पा सकती हैं?' 'बङ्गाल मदरास में आपकी अदालतें पचायतो के सहयोग से न्याय निर्णय करती हैं या यों ही?' राजा ने प्रश्न किया। गार्डन का मन ज़रा सिटपिटाया। परन्तु 'उसने बेधड़की के हठ के साथ उत्तर दिया, 'पंचायतो की मदद तो नही ली जाती, परन्तु हिन्दू- मुसलमानो के दीवानी झगडो को सुलझाने के लिये पडित और मोलवियो की सलाह ली जाती है। अपराधो के मामले अदालत के अफसर स्वयं ही निर्धार करते हैं।' 'स्वयं !' राजा ने आश्चर्य के साथ कहा, 'स्वयं ! सो कैसे ?' गार्डन ने जवाब दिया, 'गवाहो और वकीलो की मदद से।' राजा ने पूछा, 'हर अदालत में एक-एक वकील रहता होगा ?'
गार्डेन को राजा की सिधाई पर मन में हँसी आई। उत्तर दिया, 'नही तो सरकार। वादी प्रतिवादी अपने-अपने गवाह वकीलो द्वारा पेश करते हैं। वकील लोग कानून जानते हैं। वे अपने कानूनी ज्ञान द्वारा अदालत की सहायता, ठीक निर्णय पर पहुँचाने मे, करते हैं। यह हमारे देश की संस्था है।' राजा को हँसी आ रही थी। होठो तक आई, परन्तु उन्होने उसको प्रकट नही होने दिया। बोले, 'वकील क्या गवाहो को पेश करने का काम मुफ्त में करते हैं?' गार्डेन ने अभिमान के साथ कहा, 'हमारे देश में पहले वकील लोग मुफ्त में यह काम करते थे, परन्तु अब पारिश्रमिक लेने लगे हैं। और इस देश में तो वे लोग करारी रकमें लेते हैं।' 'तब कही लोग न्याय प्राप्त करने की आशा कर पाते है,' राजा खूब हँसकर बोले, 'भाडे के लोगो को बढाने की यह सस्था आप लोग इस देश में किस प्रयोजन से ले आये?' हिन्दुस्थान के प्रति गार्डेन के भीतरी मन में दबी हुई घृणा उभर पडी। बोला, 'आपके देश की न्याय प्रणाली की विषमता मुझको भी मालूम है। उसी अपराध के लिये ब्राह्मण पर एक रुपया दण्ड, ठाकुर पर पचास, बनिये पर पाचसौ और गरीब शूद्र का हाथ पैर कट। सरकार कानून सब के लिये एकसा होना चाहिये।' राजा को इस तर्क ने ज़रा ज़ेर किया। परन्तु उनको एक व्यङ्ग सूझा। बोले, 'इस कानून ज़ाब्ते के द्वारा आपके इलाको में जनता को न्याय कितने समय में मिल जाता है?' गार्डेन ने शीघ्र उत्तर दिया, अपराध वाले मामलो में दो एक महीने लग जाते हैं और दीवानी मामलो में एकाध साल।' राजा फिर हँसे। कहा, 'हमारे यहा तो तुरन्त न्याय होता है। मैं तो दो-एक दिन से ज्यादा नही लगाता। दीवानी और अपराधी मामलो का कोई भेद नही करता। पञ्चायतो के निर्णय को सर्वमान्य मानता हू।
६२ झाँसी की रानी आपके इलाकों में यदि पुलिस की गफलत या लापरवाही से चोरी इत्यादि हो जावे तो आप पुलिस को कोई दण्ड देते हैं ?' 'हा सरकार', गार्डन ने उत्तर दिया, 'बरखास्त कर देते हैं, तनज्जुल कर देते हैं ।' राजा ने उत्तेजित होकर कहा, 'इससे जनता को क्या लाभ होता होगा ? मै तो ऐसे मामलो में गफलत करने वाली पुलिस से चोरी का नुकसान भरवाता हूँ ।' गार्डन बोला, 'तब जनता पर पुलिस की धाक नही रह सकती । लोग उसकी बिलकुल परवाह नही करते होगे । ऐसा शासन बहुत दिनो नही टिक सकता सरकार ।' राजा और भी उत्तेजित हुये । उन्होने कहा, 'साहब, जनता पर मेरी धाक होनी चाहिये, न कि मेरे अफसरों की । वह राज्य भी बहुत समय तक नही टिक सकता जो कर्मचारियो ओर पुलिस की धाक पर आश्रित हो । मै तो अपने अपराधी कर्मचारियो को 'लोहे की मछली के 'कोडे से ठोकता हूँ ।' गार्डन खिसिया गया । बोला, 'सरकार अनियंत्रित सत्ता बहुत बुरी चीज़ है । इस परिपाटी के मानने वाले चाहे जो कुछ मनमाना कर बैठते हैं । आपने बनारस में एक विचारे राजेन्द्र बाबू को अकारण पिटवा दिया । हमारे पोलिटिकल विभाग को जवाब देते-देते मुसीबत आई ।' राजा को बनारस वाली घटना की स्मृति के साथ-साथ यह भी याद आ गया कि इसी पोलिटिकल विभाग की इजाजत मिलने पर झाँसी राज्य के बाहर कदम रख पाया था । 'अशिष्टता को दण्डित करने में में कभी नही चूकता', राजा ने कहा, 'फिर चाहे में कही होऊँ—अपने राज्य में होऊँ चाहे राज्य के बाहर ।' उसी समय उनको खुदाबख्श और उसके सम्बन्ध वाला प्रसङ्ग याद आ गया ।
लक्ष्मीबाई ६३ गॉर्डन को भी वही प्रसङ्ग याद आया । बोला, 'यह नही हो सकता चाहे कोई भी राजा या नवाब हो गवर्नर जनरल साहब किसी को इस तरह का उद्दण्ड व्यवहार नही करने देगे । आपका गौरव रखने के लिए ही बनारस वाले उस पीडित को वैसा जवाब दिया गया था, आगे ऐसा न हो सकेगा ।' गङ्गाधरराव के हृदय में शिवराव भाऊ का खून खलबला उठा । कुछ क्षण चुप रहे । बिजली की कोध के समान—दो—एक उत्तर मन में उठे, परन्तु उनको वे क्रोध के कारण प्रकट न कर सके । अन्त मे वे केवल यह कह पाये, 'साहब, मै तो एक छोटा सा संस्थापक हू । तो भी चाहू तो बहुत कुछ कर सकता हू । लेकिन सभी राजाओ ने चूडिया पहिन रक्खी हैं । क्या यह आश्चर्य की बात नही कि अपने ही देश में हम सब कैद हैं ? सवासौ वर्ष पहले की बात याद कीजिये । आप लोगो की क्या शान थी, जब दिल्ली के बादशाह और पूना के पन्तप्रधान के दरबार में साष्टाङ्ग प्रणाम कर करके अर्जिया पेश करते थे ।' राजा थर्राहट के मारे काप उठे । गॉर्डन की व्यापार—कुशल, बुद्धि तुरन्त सजग हुई । उसने मिन्नत सी करते हुये कहा, 'सरकार बुरा न म नें । मैने अपनी ओर से कुछ नही कहा मैने जो कुछ निवेदन किया वह गवर्नर जनरल और कम्पनी सरकार की नीति का आभास मात्र है । पचायतो के बनाये रखने के ही विषय को लीजिये । अनेक अङ्गरेज अफसर उनको सुरक्षित रखना चाहते हैं, परन्तु अधिकांश मत कानून और जाब्ते के बेलन द्वारा हिन्दुस्थान की सारी समतल और ऊवडखावड़ संस्थाओ को चौरस कर डालने के पक्ष में हैं । मेरे ऊपर सरकार की वही कृपा बनी रहे जो सदा से चली आई है । गॉर्डन को यह भी ख़याल था कि यदि राजा ने इस विवाद की सूचना कुछ बढाकर गवर्नर जनरल के पास भेजदी तो अवश्य और नाहक डाट-फटकार पडेगी ।
६४ झांसी की रानी राजा ठडे पड गये। गार्डन के तामझाम से उसका हुक्का मगवाया गया। उसने पिया। फिर राजा ने उसको पान दिया। वह खाकर चला गया। रानी के पास इस विवाद का साराश पहुच गया। वडी प्रसन्न हुई । अपनी सब सहेलियो के सामने कहा, 'आज मे जितनी सुखी हुई उतनी कदाचित ही कभी हुई होऊँ। मुझको शिवराव भाऊ की बहू होने का बहुत घमड है। मुझको अपने राजा का, अपनी झांसी का, अभिमान है। मन को केवल एक कसर खटक रही है-मुझ से और उस गार्डन से बात हुई होती तो मैं ऐसी करकरी सुनाती कि उसको अपने पुरखे याद आजाते। मुझको दादा पेशवा ने बतलाया है कि सौ सवा सौ वर्ष पहले इस अङ्गरेज कौम ने हमारे देश में किन किन उपायो से क्या क्या किया। मेरा वस चले तो......' रानी ने दात पीसे और विशाल नेत्र तरेरे। काशीबाई ने धीरे से कहा, 'सरकार ने कहा था कि बिठूर से वाला गुरू को कुश्ती सीखने के लिये बुलाया जावेगा।' रानी ने तत्क्षण अपनी सहज मुस्कराहट पाली। बोली, 'हां री, उनको शीघ्र बुलवाऊँगी।'
लक्ष्मीबाई ६५
[ २७ ]
वसन्त आगया । प्रकृति ने पुष्पाञ्जलिया चढाईं । महकें बरसाई । लोगो को अपनी श्वास तक में परिमल का आभास हुआ । किले के महल में रानी ने चैत्र की नवरात्र में गौर की प्रतिमा की स्थापना की । पूजन होने लगा । गौर की प्रतिमा आभूषणो और फूलो के श्रृङ्गार से लदगई और धूप-दीप तथा नैवेद्य ने कोलाहल सा मचा दिया । हरदी कूं कूं (हल्दी कुंकुम) के उत्सव मे सारे नगर की नारिया व्यग्र, व्यस्त होगईं । परन्तु उसमें से बहुत थोडी गले में सुमन-मालाए डाले थी । उनके पास हृदयेश की कविता और उसका फल दूसरे रूप में पहुचा था-उनको भ्रम था कि राजा-रानी हमलोगो के इस श्रृङ्गार को पसन्द नही करते । इसलिये जब वे स्त्रियाँ, जो पूजन के लिये रनवास में आईं-चढाने के लिये तो अवश्य फूल ले आईं परन्तु गले में माला डाले कुछेक ही आईं । किले में जाने की सब जातियो को आज़ादी थी । किले के उस भाग में जहा महादेव और गणेश का मन्दिर है और जिसको शंकर किला कहते थे, सब कोई जासकते थे । अछूत कहलाने वाले चमार, बसोर और भंगी भी । जहा अपने कक्षमे रानी ने गौर को स्थापित किया था, वहाँ इन जातियो की स्त्रिया नही जा सकती थी, परन्तु कोरियो और कुम्हारो की स्त्रिया जासकती थी । कोरी और कुम्हार कभी अछूत नही समझे गये थे । सुन्दर ललनाओ को आभूषण से सजा हुआ देखकर रानी को हर्ष हुआ, परन्तु अधिकांश के गलो में पुष्पमालाओ की त्रुटि उनको खटकी । उन्होने स्त्रियो से कहा, 'तुम लोग हार पहिन कर क्यो नही आई ? गौर माताको क्या अधूरे श्रृङ्गार से प्रसन्न करोगी ?' स्त्रियो के मन में एक लहर उद्वेलित हुई । लाला भाऊ बख्शी की पत्नी उन स्त्रियो की अगुआ बन कर आगे आई । वह यौवन की पूर्णता को पहुच चुकी थी । सौन्दर्य मुखमण्डल पर
६६ झाँसी की रानी छिटका हुआ था । बख्शिनजू कहलाती थी । हाथ जोडकर बोली, 'जब सरकार के गले में माला नही है तब हम लोग कैसे पहिने ?' रानी को असली कारण मालूम था । बख्शिनजू के बहाने पर उनको हँसी आई । पास आकर उसके कन्धे पर हाथ रक्खा और सबको सुनाकर कहने लगी, 'बाहर मालिनें नाना प्रकार के हार गूँथे बैठी हुई हैं । एक मेरे लिये लाओ । मै भी पहनूँगी । तुम सब पहिनो और खूब गागा कर गौर माता को रिझाओ । जो लोग नाचना जानती हो, नाचें । इसके उपरान्त दूसरी-रीति का कार्य होगा ।' स्त्रिया होडाहीसी में मालिनो के पास दौडी, परन्तु मुन्दर पहले माला ले आई । बख्शिन जरा पीछे आई । मुन्दर माला पहिनाने वाली ही थी कि रानी ने उसको मुस्कराकर बरज दिया । मुन्दर सिकुड सी गई । रानी ने कहा 'मुन्दर एक तो तू अभी कुमारी है, दूसरे तेरे हाथ के फूल तो नित्य ही मिल जाते हैं । बख्शिनजू के फूलो का आशीर्वाद लेना चाहती हू ।' बख्शिन हर्षोत्फुल्ल हो गई । मुन्दर को अपने दासीवर्ग की प्रथा का स्मरण हो आया-विवाह होते ही महल और किला छोडना पडेगा, उदास हो गई । रानी समझ गईं । बख्शिन ने पुष्पमाला उनके गले में डालकर पैर छुए । रानी ने उठाकर अङ्क में भर लिया । फिर मुन्दर का सिर पकडकर अपने कन्धे से चिपटा कर उसके कान में कहा, 'पगली, क्यो मन गिरा दिया ? मेरे पास से कभी अलग न होगी ।' मुन्दर उसी स्थिति में हाथ जोडकर धीरे से बोली, 'सरकार, मैं सदा ऐसी ही रहूगी और चरणो मे अपनी देह को इसी दशा में छोड़ूँगी ।' फिर अन्य स्त्रियो ने भी रानी को हार पहिनाये, इतने कि वे ढक गई और उनको सास लेना दूभर होगया । सहेलिया उनके हार उतार- उतार कर रख देती थी और वह पुनः पुनः ढाँक दी जाती थी । अन्त में कोने में खडी हुई एक नववधू माला लिये बढी । उसके कपड़े बहुत रंग-बिरंगे थे । चाँदी के जेवर पहिने थी । सोने का एकाध
लक्ष्मीबाई ६७ ही था । सब ठाठ सोलहआना बुन्देलखण्डो । पैर के पैजनो से लेकर सिर की दाऊनी (दामिनी) तक सब आभूषण स्थानिक । रङ्ग जरा साँवला । बाकी चेहरा रानी की आकृति, आँख-नाक से बहुत मिलता-जुलता ? रानी को आश्चर्य हुआ । और स्त्रियो के मन में काफी कुतूहल । वह डरते डरते रानी के पास आई । रानी ने मुस्कराकर पूछा, 'कौन हो ?' उत्तर मिला, 'सरकार हो तो कोरिन ।' 'नाम ?' 'सरकार. झलकारी दुलैया ।' 'निस्सन्देह जैसा नाम है वैसे ही लक्षण हैं। पहिनादे अपनी माला ।' झलकारी ने माला पहिनादी और रानी के पैर पकड लिये । रानी के हठ करने पर झलकारी ने पैर छोडे । रानी ने उससे पूछा, 'क्या बात है झलकारी ? कुछ कहना चाहती है क्या ?' झलकारी ने सिर नीचा किये हुये कहा, 'मोय जा बिनती करने- मोय माफी मिल जाय तो कम्नो ।' रानी ने मुस्कराकर अभयदान दिया । झलकारी बोली, 'महाराज, मोरे घर में पुरिया पूरवे कौ और कपडा बुनबे कौ काम होत आयो है । पै उनने अब कम कर दओ है । मलखब, कुश्ती और जाने काका करन लगे । अब सरकार घर कैसे चलै ?' रानी ने पूछा, 'तुम्हारी जाति मे और कितने लोग मलखब और कुश्ती में ध्यान देने लगे हैं ?' 'काये मे का घर-घर देखत फिरत ?' झलकारी ने बडी-बडी कजरारी आँखें घुमाकर, मुस्कराकर तीक्ष्ण उत्तर दिया । रानी हँस पडी, 'यह तो तुम्हारे पति बहुत अच्छा काम करते हैं । तुम भी मलखब, कुश्ती सीखो । इनाम दूँगी । घोडे की सवारी भी सीखो ।'
६८ झांसी की रानी झलकारी लम्बा घूँघट खींचकर नव गई। घूंघट में ही बेतरह हँसी। रानी भी हँसी और अन्य स्त्रियो में भी हँसी का स्रोत फूट पड़ा। लगभग सभी उपस्थित स्त्रियो ने ज़रा चिन्ता के साथ सोचा, 'हम लोगो से भी मलखब, कुश्ती के लिये कहा जावेगा बडी मुश्किल आई।' उन लोगो ने उन फूलो के ढेरो और आभूषणो में होकर अखाडो और कुश्तियो को झाँका तथा परम्परा की लज्जा और सङ्कोच में वे ठिठुर सी गई। उनकी हँसी को एक जकड सी लग गई। झलकारी बोली, 'महाराज, मै चकिया पीसत हो, दो-दो तीन-तीन मटकन में पानी भर-भर लै आउत, राँटा* कातत......' रानी ने कहा, 'तुम्हारे पति का क्या नाम है ?' झलकारी सिकुड गई। बख्शिन ने तपाक से कहा, 'आज हम लोग आपस में कुंकुम रोरी लगाते समय एक दूसरे से पति का नाम पूछेगे ही। झलकारी को भी बतलाना पडेगा उस समय। परन्तु... ...' वह नखरे के साथ दूसरी स्त्रियो की ओर देखने लगी। रानी ने हँसकर पूछा, 'परन्तु क्या बख्शिनजू ?' बख्शिन ने उत्तर दिया, 'सरकार बडे काम पहले राजा से आरम्भ होते हैं। आज के उत्सव की परिपाटी में रिवाज़ के अनुसार सबको अपने अपने पति का नाम लेना पडेगा, परन्तु प्रारम्भ कौन करेगा ? क्या यह भी हम लोगो को बतलाना पडेगा ?' कुछ स्त्रियाँ हँस पडी। कुछ ताली पीटकर थिरक गईं। रानी की सहेलियां मुस्करा-मुस्करा कर उनका मुँह देखने लगी। रानी के गौर मुख पर ऊषा की अरुण स्वर्ण रेखाये सी खिच गईं। वह मुस्कराई जैसे एक क्षण के लिये ज्योत्स्ना छिटक गई हो। जरा सिर हिलाया मानो मुक्त- पवन ने फूलो से लदी फुलवारियो को लहरा दिया हो।
- चरखा। चरखा चलाने की प्रथा बुन्देलखण्ड में, ऊंचे घरानो तक में, 'घर-घर थी।
रानी ने बख्शिन से कहा, 'तुम मुझसे बडी हो, तुमको पहले बत- लाना होगा ।' 'सरकार हमारी महारानी हैं। पहले सरकार बतलावेगी । पीछे हम लोग आज्ञा का पालन करेगी ।' बख्शिन ने घूँघट का एक भाग होठो के पास दबाकर कहा । हरदी कूँ कूँ के उत्सव पर सधवा स्त्रिया एक दूसरे को रोरी का टीका लगाती हैं और उनको किसी न किसी बहाने अपने पति का नाम लेना पडता है । रानी ने कहा, 'बख्शिन जू अपनी बात पर दृढ रहना । आज्ञा पालन में आगा पीछा नही देखा जाता ।' 'परन्तु धर्म की आज्ञा सबके ऊपर होती है सरकार ।' बख्शिन हठ पूर्वक बोली । रानी के गोरे मुख-मडल पर फिर एक क्षण के लिये रक्तिम आभा भाई सी दे गई । बोली, 'बख्शिन जू याद रखना मैं भी बहुत हैरान करूँगी । मेरी बारी आयगी तब मै तुम्हे देखूँगी ।' बख्शिन ने प्रश्न किया, 'अभी तो मेरी बारी है सरकार बतलाइये, महादेव जी के कितने नाँम हैं ।' रानी ने अपने विशाल नेत्र जरा झुकाये । गला साफ किया बोली, 'शिव, शकर, भोलानाथ, शम्भु, गिरिजापति • ' सरकार को पूरा कोष याद है । अब यह बतलाइये कि महादेव जी के जटा जूट में से क्या निकला है ? 'सर्प, रुद्राक्ष • • • ' 'जी नही सरकार—किसकी तपस्या करने पर, किसको महादेव बाबा ने अपनी जटाओ में छिपाया, और कौन वहा से निकलकर हिमा- चल से बहकर इस देश को पवित्र करने के लिये आया ? ब्राह्मावर्त के नीचे किसका महान् सुहावनापन है ?' 'गङ्गा का,' यकायक लक्ष्मीबाई के मुँह से निकल पड़ा ।
१०० झाँसी की रानी
उपस्थित स्त्रियाँ हर्ष के मारे उन्मत्त हो उठीं। नाचने लगीं, गाने लगीं। झलकारी ने तो अपने 'बुन्देलखण्डी नृत्य में अपने को विसरा सा दिया। रानी उस प्रमोद में गौर की प्रतिमा की ओर विनीत कृतज्ञता की दृष्टि से देखने लगीं। आमोद की उस थिरकन का वातावरण जब कुछ स्थिर हुआ, रानी ने आनन्द विभोर बख्शिन का हाथ पकडा। कहा, 'बख्शिनजू सावधान हो जाओ। अब तुम्हारी बारी आई।' बख्शिन के मुँह पर गुलाल सा बिखर गया। नत मस्तक होकर बोली, 'सरकार अभी यहाँ वडे वडे मन्त्रियो और दीवानो की स्त्रिया और वहुएँ हैं। हम लोग तो सरकार की सेना के केवल वख्शी ही है।' रानी ने मुस्कराते मुस्कराते दात् पीस कर विशाल नेत्रो को तरेर कर जिनमें होकर मुस्कराहट विवश भरी पड़ रही थी,—कहा, 'वख्शी सेना का आधार, तोपो का मालिक, प्रधान सेनापति के सिवाय और किसी से नीचे नही। राजा के दाहिने हाथ की पहली उङ्गली, और तुम यहा उपस्थित स्त्रियो में सबसे अधिक शरारतिन ! मेरे सवालो का जवाब दो।' बख्शिन ने अपनी मुख मुद्रा पर गम्भीरता क्षोभ और अनमनेपन की छाप विठलानी चाही। परन्तु लाज से बिखेरी हुई चेहरे की गुलाली में से हँसी वरवस फूटी पड रही थी। बख्शिन बोली, 'सरकार की कलाई इतनी प्रवल है कि मेरा हाथ टूटा जा रहा है।' रानी ने कहा, 'तुम्हारी कलाई भी इतनी ही मजबूत बनवाऊँगी, वात न बनाओ। मेरे सवाल का जवाब दो। बोलो मेरे पुरखो के नाम याद हैं ?' बख्शिन सम्भल गई। उसने सोचा मारके का प्रश्न अभी दूर है।' बोली, 'हाँ सरकार। जिनकी सेवा में युग बीत गये उनके नाम हम लोग कैसे भूल सकते हैं ?' 'बतलाओ मेरे ससुर का नाम।' रानी ने मुस्कराते हुये दृढ़तापूर्वक कहा।
लक्ष्मीबाई १०१ चतुर बख्शिन गडबडा गई । उसके मुँह से निकल गया—'भाऊ साहब ।' बख्शिन के पति का नाम लाला भाऊ था । रानी ने हँसकर बख्शिन का हाथ छोड़ दिया । उपस्थित स्त्रिया खिल खिला कर हँस पडी । बख्शिन को अपने पति का नाम बतलाना तो ज़रूर था, परन्तु वह रानी को थोड़ा परेशान करके ही बतलाना चाहती थी, लेकिन रानी ने अनायास ही बख्शिन को परास्त कर दिया । इसके उपरान्त रानी ने चुलबुली झलकारी को बुलाया । उसके पति का वहा किसी को नाम नही मालूम था । इसलिये बहानो की गुन्जाइश न थी । रानी ने सीधे ही पूछा, 'तुम्हारे पति का नाम ?' झलकारी के पति का नाम पूरन था । पति का नाम बतलाने के लिये व्यग्र थी, परन्तु उत्सव की रगत बढाने के लिए उसने जरा सोच विचार कर एक ढग निकाला । बोली, 'सरकार, चन्दा पूरनमासी को ही पूरो पूरी दिखात है न ?' रानी ने हँसकर कहा, 'ओ हो ? पहले ही अरसट्टे मे फिसल गई ! पूरन नाम है ?' झलकारी झेंप गई । चतुराई विफल हुई । हँस पडी । इसी प्रकार हँसते खेलते और नाचते गाते स्त्रियो का वह उत्सव अपने समय पर समाप्त हुआ । अन्त में रानी ने स्त्रियो से एक भीख सी मागी, 'तुममें से कोई बहिनो के बराबर हो, कोई काकी हो, कोई माई, कोई फूफी । फूल सदा नही खिलते । उनमें सुगन्धि भी सदा नही रहती । उनकी स्मृति ही मन में बसती है । नृत्य गान की भी स्मृति ही सुख दायक होती है । परन्तु इन *शिवराव भाऊ गङ्गाधरराव के पिता थे ।
१०२ झांसी की रानी सब स्मृतियो का पोषक यह शरीर और इसके भीतर आत्मा है । उनको पुष्ट करो और प्रवल वनाओ ! क्या मुझे ऐसा करने का वचन दोगी ?' उन स्त्रियो ने इस वात को समझा हो, या न समझा हो, परन्तु उन्होने हा-हा की । उन लोगो को डर लगा कि वही और तत्काल, कही मल- खव और कुश्ती न शुरू कर देनी पडे । इत्र पान के उपरान्त चली गई । एक बात लेकिन स्पष्ट थी-जब वे गईं तब वे किसी एक अदृष्ट, अवर्ण्य तेज से ओतप्रोत थी । उसके उपरान्त फिर झाँसी नगर की स्त्रिया संध्या समय थालो में दीपक सजा-सजा कर और गले में बेला, मोतिया, जाही, जुही इत्यादि की फूल-मालाए डाल डाल कर मन्दिरो में जाने लगी । स्त्रियो को ऐसा भान होने लगा जैसे उनका कोई सतत सरक्षण कर रहा हो, जैसे कोई संरक्षक सदा साथ ही रहता हो, जैसे वे अत्याचार का मुकाबला करने की शक्ति का अपने रक्त में सचार पा रही हों।
लक्ष्मीबाई १०३ [ २१ ] नाटकशाला की ओर से गङ्गाधरराव की रुचि कम हो गई । वे महलो में अधिक रहने लगे । परन्तु कचहरी दरबार करना बन्द नही किया । न्याय वे तत्काल करते थे-उल्टा सीधा जैसा समझ में आया, मनमाना । दण्ड उनके कठोर और अत्याचार पूर्ण होते थे, लेकिन स्त्रियो को कभी नही सताते थे । और न किसी की धन सम्पत्ति लूटते थे । झाँसी की जनता उनसे भयभीत थी, परन्तु अपनी रानी पर मुग्ध थी । रानी शासन में कोई प्रत्यक्ष भाग नही लेती थी, किन्तु राजा के कठोर शासन में जहाँ कही दया दिखलाई पडती थी, उसमे जनता रानी के प्रभाव के आभास की कल्पना करती थी । कम्पनी का झाँसी प्रवासी असिस्टेन्ट पोलिटिकल एजेन्ट राजा के कठोर शासन, अत्याचार इत्यादि के समाचार गवर्नर जनरल के पास बराबर भेजता रहता था । उनके किसी भी सत्कार्य का समावेश उन समाचारो में न किया जाता था । और राज्यो के साथ-साथ, कलकत्ते में झाँसी राज्य की भी मिसिल तैयार होती चली जा रही थी । अङ्गरेजो का चौरस करने वाला बेलन बेतहाशा, लगातार और जोर के साथ चल रहा था । अङ्गरेज लोग अपनी दूकान में हिन्दुस्थान को अधूरी या अधकचरी सौदा का रूप लिये नही देख सकते थे । एक कानून, एक जाब्ता, एक मालिक, एक नजर, इसमें अनैक्य को तिल भर भी स्थान देने की गुञ्जायश न थी । मौका मिलते ही छोटे मोटे रजवाड़े साफ हजम ! भारतीय जनता के सुख के लिये !! ऊँचे पदो पर भारतीय पहुँच नही पावे । भारतीय सस्कृति हेच और नाचीज है इसलिये पनपने न पावे । भारत में बहुत फालतू सोना-चाँदी है । इसलिये अङ्गरेजी दूकान की रोकड बढती चली जावे । जनता स्वाधीनता का नाम ले तो उसको बड़ी रियासतो के अन्धेरो का संकेत करके चुप कर दिया जावे । बडी रियासत वाले जरा भी सिर उठावे तो
१०४ झांसी की रानी छोटी रियासतो को किसी न किसी बहाने घोट-घाटकर बडी रियासतों को चुप रहने का सबक सिखाया जावे । सबसे बडा काम जो अङ्गरेज़ो ने हिन्दुस्थानी जनता की भलाई (!) के लिये किया, वह था पञ्चायतो का सर्वनाश । अङ्गरेजो को इस बात के परखने में बिलकुल विलम्ब नही हुआ कि उनके कानून के सामने हिन्दुस्थान की आत्मा का सिर तभी झुकेगा जब यहाँ की पञ्चायते विलीन हो जायेंगी, और हिन्दुस्थानी, अर्जियाँ लिये उनकी बनाई हुई साहबी अदालतो के सामने मुह बाये भटकते फिरेंगे । यह सब उन्नीसवी शताब्दि के वैज्ञानिक ढङ्ग से हुआ । जो परिस्थिति कठोर से कठोर पठान या मुगल नरेश अपने प्रकट अत्याचारो से उत्पन्न नही कर पाये थे, वह अङ्गरेजो ने अपनी वैज्ञानिक हिकमत से उत्पन्न कर दी । बडे-बड़े राजा-महाराजा और नवाब अपनी जनता का दामन छोड कर अङ्गरेजो का मुँह ताकने लगे । पुरुषार्थ की जरूरत न थी, इसलिये सिर डुबोकर विलासिता के पोखरो में घुस पडे । अङ्गरेजी बन्दूक और सङ्गीन उनकी पीठ पर थी, जनता की परवाह ही क्या की जाती ? अङ्गरेजो को केवल एक बात का खटका था—उनके इलाको के हिन्दू और मुसलमान धर्म के इतने ढकोसले क्यो मानते हैं ? किसी दिन इन ढकोसलो की श्रद्धा में होकर हमें नफरत की निगाह से न देखने लगें ? इस धर्म से लिपटी हुई आत्मा का कैसे उद्धार कर के अपना भक्त बनाया जावे ? बस इनकी रूहानी भक्ति मिली कि हिन्दुस्थान मे अपना राज्य अमर और अक्षय हो गया । इसलिये सरकारी पाठशालाओ में बाइबिल की शिक्षा अनिवार्य कर दी गई। एमेरिका हाथ से निकल गया तो क्या हुआ ? सोने की चिडिया, सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी—भारतभूमि—तो हाथ में आई ! यह न जाने पावे किसी तरह भी हाथ से ! मदिरो की मूर्तियां मत तोड़ो, मसजिदों को अपवित्र मत करो—परन्तु धर्म पर से श्रद्धा को हटा दो, फल उससे भी कही बढ़कर होगा । और कोने कोने में ढोंढी पीट दो कि हम धर्मों के