रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
अष्टमोऽध्यायः ।
२२५
अथ कज्जली—
धातुभिर्गन्धकाद्यैश्च निर्द्रवैर्मर्दितो रसः ।
सुश्लक्ष्णः कज्जलाभोऽसौ कज्जलीत्यभिधीयते ॥ ५ ॥
गन्धक आदि धातुओं के साथ पारद को किसी द्रवपदार्थ (अम्लरस इत्यादि) के बिना ही घोटकर उसका अत्यन्त चिकना और कज्जल के समान काला चूर्ण तैयार करते हैं उसी को कजली कहते हैं ॥ ५ ॥
अथ रसपङ्कः—
सद्रवा मर्दिता सैव रसपङ्क इति स्मृतः ॥ ६ ॥
यदि उपर्युक्तविधि से बनी कज्जली में द्रवपदार्थ मिलाकर घोटा जाय तब उसको रसपङ्क कहते हैं ॥ ६ ॥
अथ पिष्टी—
अर्कांशतुल्याद्रसतोऽथगन्धान्निष्कार्धतुल्यात्त्रुटिशोऽभिखल्ले ।
अर्कातपे तीव्रतरे विमर्द्यात् पिष्टीभवेत्सा नवनीतरूपा ॥ ७ ॥
आधा निष्क ( २ माषा ) गन्धक और गन्धक से द्वादशांश (१२ वां भाग) शुद्ध पारद लेकर खरल में डालकर तेजधूप में घोटना चाहिए । जब घोटते २ मक्खन के समान चिकना चूर्ण होजाय तब उसको पिष्टि कहते है ॥ ७ ॥
मतान्तरम्—
खल्ले विमर्द्य गन्धेन दुग्धेन सह पारदम् ।
पेषणात्पिष्टतां याति सा पिष्टीति मता परैः ॥ ८ ॥
खरल के अन्दर दुग्ध के साथ बराबर २ शुद्ध पारद तथा गन्धक को घोटने से जब वह पिष्टि के रुप में हो जाय तब पिष्टि कहलाती है। यह भी अन्य आचार्य का मत है ॥ ८ ॥
अथ पातनपिष्टी—
चतुर्थांशसुवर्णेन रसेन घृष्टपिष्टिका ।
भवेत्पातनपिष्टी सा रसस्योत्तमसिद्धिदा ॥ ९ ॥
एक भाग शुद्ध पारद को चौथाई भाग सुवर्ण पत्रों के साथ घोटने से जो पिष्टी ( कज्जली ) तैयार होती है उसको पातन पिष्टी कहते हैं ( अर्थात् सुवर्ण के साथ इस तरह पारद को घोटकर पिष्टि बना के उसका उर्ध्वपातन करते हैं ) । इससे पारद के अन्दर अनेक गुणों का आधान होता है ॥ ९ ॥
रस० १५
२२६ :रसरत्नसमुच्चये—
अथ स्वर्णरौप्ययोः कृष्टिः—
रूप्यं वा जातरूपं वा रसगन्धादिभिर्हतम् ।
समुत्थितं च बहुशः सा कृष्टी हेमतारयोः ॥ १० ॥
पारद और गन्धक आदि के द्वारा भस्म किये हुए स्वर्ण तथा रजत को उर्ध्व-पातन यन्त्र द्वारा अनेक औषधियों से जो पुनरुत्थापित कहते हैं, वह स्वर्ण और रजत की कृष्टी कही जाती है ॥ १० ॥
अथ कृष्ट्या उपयोगः—
कृष्टीं क्षिपेत्सुवर्णांन्तर्न वर्णो हीयते तया ॥ ११ ॥
उक्तविधि से की हुई स्वर्ण या रौप्य की कृष्टी को अग्निपर गलाकर स्वर्ण में मिलाने से स्वर्ण का रङ्ग कम नहीं होता है ॥ ११ ॥
स्वर्णकृष्ट्याः कार्यम्—
स्वर्णकृष्ट्या कृतं बीजं रसस्य परिरञ्जनम् ॥ १२ ॥
स्वर्ण कृष्टी से किया हुआ बीज (बनाने की विधि आगे है) पारद का रञ्जन करता है ॥ १२ ॥
अथ वरलोहकम्—
ताम्रं तीक्ष्णसमायुक्तं द्रुतं निक्षिप्य भूरिशः ।
सगन्धलकुचद्रावे निर्गतं वरलोहकम् ॥ १३ ॥
तीक्ष्णलौह तथा ताम्र को बहुतवार (प्रायः ७ वार) साथ ही पिघलाकर गन्धक के चूर्ण को बड़हल के रस में मिलाकर उसमें बुझाने से लोह को वरलोह कहा जाता है ॥ १३ ॥
अथ हेमरक्ती—
तेन रक्तीकृतं स्वर्णं हेमरक्तीत्युदाहृतम् ॥ १४ ॥
इस वरलोह के साथ स्वर्ण को पिघलाने से वह उत्तम लालवर्ण का हो जाता है उसको हेमरक्ती कहते हैं ॥ १४ ॥
हेमरक्तीप्रयोगः—
निक्षिप्ता सा द्रुते स्वर्णे स्वर्णोत्कर्षविधायिनी ।
तारस्य रञ्जनी चापि बीजरागविधायिनी ॥ १५ ॥
यह हेमरक्ती पिघले हुए स्वर्ण के साथ डालकर उसमें मिलाने से उसका रङ्ग
अष्टमोऽध्यायः । २२७
अष्टमोऽध्यायः । २२७
श्रेष्ठ बनादेती है तथा चांदी को रङ्ग देती है और उसके बीजराग को भी बनाती है॥१५॥
अथ ताररक्ती— एवमेव प्रकर्तव्या ताररक्ती मनोहरा । रञ्जनी खलु रूप्यस्य बीजानामपि रञ्जनी ॥ १६ ॥ हेमरक्ती की तरह वरलोह के साथ चांदी को गला कर ताररक्ती बनाते हैं, यह ताररक्ती चांदी को तथा चांदी के बीजों को भी रङ्ग देती है ॥ १६ ॥
अथ दलम्— मृतेन वा बद्धरसेन वाऽन्यल्लोहेन वा साधितमन्यलोहम् । सितं च पीतत्वमुपागतं तद्दलं हि चन्द्रानलयोः प्रसिद्धम् ॥१७॥ भस्महुए पारद अथवा निगडीकरण क्रिया द्वारा संयमित ( बद्ध ) पारद के साथ या किसी अन्य लोह आदि धातु के साथ सिद्ध की हुई कोई धातु जब श्वेत वर्ण की होजाती है तब उसको चन्द्रदल कहते हैं और जब वह पीतवर्ण की होजाती है तब उसको अग्निदल कहते हैं ॥ १७ ॥
अथ अन्यविधदलम्— आमासकृतबद्धेन रसेन सह योजितम् । साधितं वाऽन्यलोहेन सितं पीतं च तद्दलं ॥ १८ ॥ एक मास तक रस को निगडीकरण क्रिया द्वारा बद्ध करके उस (बद्ध हुए) के साथ या उसकी भस्म के साथ या किसी अन्य लोह के साथ सिद्ध की हुई किसी धातु को श्वेत होनेपर सितदल और पीत होने पर पीतदल कहते हैं ॥१८॥
अथ शुल्वनागम्— माक्षिकेण हतं ताम्रं दशवारं समुत्थितम् । तद्वद्विशुद्धनागं हि द्वितयं तच्चतुष्पलम् ॥ १६ ॥ नीलाञ्जनहतं भूयः सप्तवारं समुत्थितम् । इति संसिद्धमेतद्धि शुल्वनागं प्रकीर्त्यते ॥ २० ॥ शुद्ध स्वर्णमाक्षिक चूर्ण के साथ शुद्ध ताम्र की भस्म बनाकर उसको उत्थापित करें, इस तरह फिर उस उत्थापित ताम्र की शुद्धस्वर्ण माक्षिक के साथ भस्म बनाकर उसको पुनः उत्थापित करें इसी प्रकार से यह क्रिया दसवार करनी चाहिए । शुद्ध नाग को भी शुद्धस्वर्णमाक्षिक के साथ भस्म करके उत्थापित करें इस तरह
२२८ रसरत्नसमुच्चये—
इसको भी दसवार भस्म बनाकर उत्थापित करना चाहिए। पश्चात् इस नाग और ताम्र को चारपलकी मात्रा में ग्रहणकर नीलाञ्जन के साथ भस्म करके उत्थापन करें। इस तरह भस्म करके सात वार उत्थापन करना चाहिए। इस क्रिया से शुद्ध नाग और ताम्र को शुल्बनाग कहते हैं ॥ १९-२० ॥
अथ शुल्बनागगुणाः—
सान्निस्तेन सूतेन्द्रो वदने विधृतो नृणाम् ।
निहन्ति मासमात्रेण मेहव्यूहं विशेषतः ॥ २१ ॥
पथ्याशनस्य वर्षेण पलितं वलिभिः सह ।
गृध्रदृष्टिर्लसत्पुष्टिसर्वारोग्यसमन्वितः ॥ २२ ॥
इस शुल्बनाग के साथ पारद की भस्म बना करके गोली बनाकर एक मास तक मुख में धारण करने से मनुष्यों के बीस प्रकार के प्रमेह नष्ट हो जाते हैं, इसी तरह जो मनुष्य पथ्य का पालन करता हुआ एक वर्ष तक इस गोली को मुख में धारण करता रहे तो उसके वली (युवावस्था में ही मुख तथा अन्य अङ्ग के चर्म में झुर्रियों का पड़ना) और पलित (असमय में बालों का सफेद होना) रोग नष्ट हो जाते हैं तथा उस मनुष्य की अवलोकन शक्ति (दृष्टि) गृध्र के समान बढ़ जाती है, शरीर पुष्ट हो जाता है, तथा उसका शरीर सब तरह से नीरोग होजाता है ॥ २१-२२ ॥
अथ पिञ्जरी—
लोहं लोहान्तरे क्षिप्तं ध्मातं निर्वापितं द्रवे ।
पाण्डुपीतप्रभं जातं पिञ्जरीत्यभिधीयते ॥ २३ ॥
एक धा को अन्य धातु के साथ मिलाकर अग्नि में विद्रुत करके किसी त्रिफला इत्यादि के क्वाथ में बुझाने ने से यदि वह धातु पाण्डुवर्ण लिये हुई पीत वर्ण की हो जाय तब उसको पिञ्जरी कहते हैं ॥ २३ ॥
अथ चन्द्रार्कम्—
भागाः षोडश तारस्य यथा द्वादश भास्वतः ।
एकत्रावर्तितास्तेन चन्द्रार्कंमिति कथ्यते ॥ २४ ॥
चांदी १६ भाग और ताम्र १२ भाग लेकर दोनों को अग्नि में विद्रुत करके घोटकर जो रस तैयार होता है उसको चन्द्रार्क कहते हैं ॥ २४ ॥
अष्टमोऽध्यायः । २२९
अष्टमोऽध्यायः । २२९
अथ निर्वापणम्—
साध्यलोहेऽन्यलोहं चेत्प्रक्षिप्तं वङ्कनालतः ।
निर्वापणं तु तत्प्रोक्तं वैद्यैर्निर्वाहिणं खलु ॥ २५ ॥
अग्नि में विद्रुत हुई धातु में अन्य धातु को विद्रुत कर वङ्कनाल द्वारा डालने को निर्वापण कहते हैं और उसी का पर्याय वैद्य जनोने निर्वाहिण भी कहा है॥ २५॥
निर्वापणद्रव्यमात्रा—
क्षिपेन्निर्वापणं द्रव्यं निर्वाह्ये समभागिकम् ।
आवाह्यं वापनीये च भागे दृष्टे च दृष्टवत् ॥ २६ ॥
साध्य लोह में निर्वापण द्रव्य की मात्रा साध्य लोह के बराबर ही होनी चाहिए अथवा जैसी निर्वापण द्रव्य की मात्रा गुरुपरम्परा से सीखी या देखी हो उसी के अनुसार कार्य करना चाहिए ॥ २६ ॥
अथ वारितरलोहलक्षणम्—
मृतं तरति यत्तोये लोहं वारितरं हि तत् ॥ २७ ॥
जो धातु फूंकने के पश्चात् अर्थात् उस धातु की भस्म जल पर तैरती रहे उसमें डूबे नहीं उसको वारितरभस्म या लोह कहते हैं ॥ २७ ॥
मृतलोहलक्षणम्—
अङ्गुष्ठतर्जनीघृष्टं यत्तद्रेखान्तरे विशेत् ।
मृतलोहं तदुद्दिष्टं रेखापूर्णाभिधानतः ॥ २८ ॥
किसी भी लोह (सप्तलोह) की भस्म को अङ्गुष्ठ तथा तर्जनी अङ्गुली के बीच में लेकर घर्षित करने से यदि वह भस्म उन दोनों की रेखाओं में प्रविष्ट हो जाय तथा नीचे नहीं गिरे तब उस धातु की भस्म को मृतलोह अथवा रेखापूर्ण नाम से कहते हैं ॥ ॥ २८ ॥
अपुनर्भव लक्षणम्—
गुडगुञ्जासुखस्पर्श मध्वाज्यैः सह योजितम् ।
नायाति प्रकृतिं ध्मानादपुनर्भवमुच्यते ॥ २९ ॥
गुड़, गुञ्जाचूर्ण, सुहागा, शहद, घृत, इनके साथ किसी भी धातु की भस्म को मिलाकर अग्नि में फूंकने से यदि वह अपने स्वरूप को धारण नहीं करे तब उसको अपुनर्भव भस्म कहते हैं ॥ २९ ॥
२३० रसरत्नसमुच्चये—
उत्तमभस्मलक्षणम्—
तस्योपरि गुरु द्रव्यं धान्यं चोपनयेद्ध्रुवम् ।
हंसवत्तीर्यते वारिण्युत्तमं परिकीर्तितम् ॥ ३० ॥
फिर इस भस्म को जल पर तैराकर इसके ऊपर कोई वजनी पदार्थ अथवा धान के दाने रखने से यदि वह जल में डूबे नहीं और हंस के समान उस भस्म के सहारे तैरती रहे तब वह उत्तम भस्म होती है। कुछ ग्रन्थकरों ने इसको ऊनम भस्म भी कहा है ॥ ३० ॥
निरुत्थलौहलक्षणम्—
रौप्येन सह संयुक्तं ध्मातं रौप्येन चेल्लगेत् ।
तदा निरुत्थमित्युक्तं लोहं तदपुनर्भवम् ॥ ३१ ॥
लोह ( सातलोह ) भस्म को चांदी के पत्रों के साथ मिलाकर फूंकने से यदि वह उन रजत पत्रों के साथ मिश्रित हो जाय तब उसको निरुत्थ कहते हैं ॥३१॥
अथ बीज लक्षणम्—
निर्वापणविशेषेण तत्तद्वर्णं भवेद्यदा ।
मृदुलं चित्रसंस्कारं तद्बीजमिति कथ्यते ॥ ३२ ॥
इदमेव विनिर्दिष्टं वैद्यैरुत्तरणं खलु ॥ ३३ ॥
किसी धातु को गलाकर उसमें अन्य धातु का निर्वापण करने से वह धातु कोमल और अद्भुत गुणों को करने वाली होजाती है इसी को बीज कहते हैं तथा वैद्य लोग इसको उत्तरण भी कहते हैं ॥ ३२–३३ ॥
ताडनस्वरूपम्—
संस्पृष्टलोहयोरेकलाहस्य परिनाशनम् ।
प्रध्मातं वङ्कनालेन तत्ताडनमुदाहृतम् ॥ ३४ ॥
दो धातु जब परस्पर मिली हो उनमें से एक धातु की शुद्धि करने के लिये और अन्य धातु को नष्ट करने के लिये उनको मूषायन्त्र में रखकर वङ्कनाल के द्वारा फूंकते हैं इसी को ताडन कहते हैं ॥ ३४ ॥
अथ धान्याभ्रलक्षणम्—
चूर्णाभ्रं शालिसंयुक्तं वस्त्रबद्धं हि काञ्जिके ।
निर्यातं मर्दनाद्वस्त्राद्धान्याभ्रमिति कथ्यते ॥ ३५ ॥
अष्टमोऽध्यायः । २३१
शुद्ध अभ्रक के छोटे २ टुकड़े ( चूर्ण ) बनाकर उसको धान के साथ ( भूषी युक्त चावल ) एक वस्त्र में रखकर पोटली बांध लेते हैं, फिर उस पोटली को काञ्जी में भिगोकर रख देते हैं । बाद में पोटली को कूटने से उसमें से जो अभ्रक का चूर्ण निकलता है उसको धान्याभ्रक कहते हैं ॥ ३५ ॥
अथ सत्त्वलक्षणम्—
क्षाराम्लद्रावकैर्युक्तं ध्मातमाकरकोष्ठके ।
यस्ततो निर्गतः सारः सत्त्वमित्यभिधीयते ॥ ३६ ॥
किसी धातु की भस्म को क्षार ( टंकण ) अम्ल ( काञ्जी ) और द्रावकवर्ग ( गुञ्जा, मधु, घृत, गुड़, ) के पदार्थों के साथ मिला कर कोष्ठिकायन्त्र में या मूषामें रखकर फूंक देने से जो उस भस्म का सार निकलता है उसको सत्त्व कहते हैं ॥ ३६ ॥
अथ एककोलिसकलक्षणम्—
कोष्ठिका शिखरापूर्णैः कोकिलैर्धमनियोगतः ।
मूषाकण्ठमनुप्राप्यैरेककोलीसको मतः ॥ ३७ ॥
एक कोष्ठिका को कोयलों से भरकर उन के बीच में द्रव्यों से भरी मूषा रखकर धौंकनी से फूंकना चाहिये । जब तक मूषा के भीतर का पदार्थ ( धातु ) उड़कर उसके कण्ठ में संलग्न न हो जाय तबतक यह क्रिया जारी रखनी चाहिए, इसी का नाम एककोलीसक है ॥ ३७ ॥
अथ द्रावणादिकर्मसाधने काष्ठनिर्देशः—
द्रावणे सत्त्वपाते च माधुकाः खादिराः शुभाः ।
दुर्द्भावे वंशजास्ते तु स्वेदने बादराः शुभाः ॥ ३८ ॥
किसी धातु के द्रावण या सत्त्वपातन करने के लिये महुए या खैरके काष्ठ या कोयले श्रेष्ठ हैं तथा जो वस्तु कठिनता से द्रव होती है उसके लिये बांस के काष्ठ या कोयले और स्वेदन कर्म में बैर के कोयलों अथवा लकड़ियों का प्रयोग करना चाहिए ॥ ३८ ॥
अथ हिङ्गुलाकृष्टरसः—
विद्याधराख्ययन्त्रस्थादार्द्रकद्रावमर्दितात् ।
समाकृष्टो रसो योऽसौ हिङ्गुलाकृष्ट उच्यते ॥ ३६ ॥
२३२ रसरत्नसमुच्चये—
हिङ्गुल को अदरक के स्वरस में घोटकर विद्याधरयन्त्र के द्वारा ( उसमें लेपकर ) उड़ाकर निकाले हुए पारद को हिङ्गुलाकृष्ट पारद कहते हैं ॥ ३९ ॥
अथ घोषाकृष्टताम्रलक्षणम्—
स्वल्पतालयुतं कांस्यं वङ्कनालेन ताडितम् ।
मुक्तवङ्गं हि तत्ताम्रं घोषाकृष्टमुदाहृतम् ॥ ४० ॥
कांस्य के अन्दर कुछ हरताल मिलाकर बङ्कनाल के द्वारा अग्नि में फूंकने से वङ्ग का भाग पृथक् हो जाता है और ताम्र पृथक् निकल जाता है इस ताम्र को घोषाकृष्ट ताम्र कहते हैं । कांस्य ताम्र और वंग के संयोग से बनता है उक्तविधि से ताम्र को पृथक् कर लेते हैं ॥ ४० ॥
अथ वरनागलक्षणम्—
तीक्ष्णनीलाञ्जनोपेतं ध्मातं हि बहुशो दृढम् ।
मृदु कृष्णं द्रुतद्रावं वरनागं तदुच्यते ॥ ४१ ॥
नाग को तीक्ष्ण लौह और नीलाञ्जन के साथ बहुत बार तेज आँच में फूंकने से जब वह अत्यन्त कोमल कृष्णवर्ण और अत्यन्त शीघ्र द्रुत होने लायक होजाय तब उसको वरनाग ( उत्तम सीस ) कहते हैं ॥ ४१ ॥
उत्थापनलक्षणम्—
मृतस्य पुनरुद्भूतिः सम्प्रोक्तोत्थापनाह्वया ॥ ४२ ॥
भस्म हुए लोह ( सप्तधातु ) को द्रावक वर्ग की औषधियों के साथ फूंकने से वह अपने स्वरूप में आजाता है इसी को उत्थापन कहते हैं ॥ ४२ ॥
ढालनलक्षणम्—
द्रुतद्रवस्य निक्षेपो द्रवे तद् ढालनं मतम् ॥ ४३ ॥
किसी धातु को अग्नि में द्रवित कर के द्रव में बुझाने से वह ढल (घन हो) जाती है, इसी को ढालन कहते हैं ॥ ४३ ॥
अथ नागसम्भूतचपलः—
त्रिंशत्पलमितं नागं भानुदुग्धेन मर्दितम् ।
विमर्द्य पुटयेत्तावद्यावत्कर्षावशेषितम् ॥ ४४ ॥
न तत्पुटसहस्रेण क्षयमायाति सर्वथा ।
चपलोऽयं समादिष्टो वार्तिकैर्नागसम्भवः ॥ ४५ ॥
अष्टमोऽध्यायः। २३३
अष्टमोऽध्यायः। २३३
३० पल ( १२० तो० ) नाग का चूर्ण बनाकर मदार के दुग्ध से भावित करके घोटलें, फिर गजपुट में उसे फूंकदें, इसविधि से बार २ मदार के दुग्ध से घोट-कर पुट देते देते जब उसकी मात्रा एक कर्ष (एक तोला) शेष रह जाती है उसी को वार्तिककारों ( रसशास्त्रपरिभाषानिर्माताविद्वानों ) ने नाग से उत्पन्न चपल कहा है । इस एक तोले का फिर यदि हजारों पुट भी दिये जावें तो भी वह नष्ट नहीं होता है ॥ ४४-४५ ॥
अथ वङ्गसम्भूतचपलः— इत्थं हि चपलः कार्यो वङ्गस्यापि न संशयः ॥ ४६ ॥
उपर्युक्त विधि से वङ्ग धातु को भी अर्कदुग्ध से भावित कर अनेक पुट द्वारा उससे चपल का निर्माण किया जाता है ॥ ४६ ॥
चपलकार्यम्— तत्स्पृष्टहस्तसंस्पृष्टः केवलो बध्यते रसः ॥ ४७ ॥
इस चपल को हाथों में मलकर पारद का स्पर्श मात्र करने से उसका बन्धन ( गोली ) हो जाता है, यह चपल का प्रभाव है ॥ ४७ ॥
बद्धरसोपयोगः— स रसो धातुवादेषु शस्यते न रसायने । अयं हि खर्वणाख्येन लोकनाथेन कीर्तितः ॥ ४८ ॥
चपल के द्वारा बद्ध हुए रस का उपयोग धातु वाद ( लोह से स्वर्ण बनाने ) में होता है । रसायन कर्म में इस पारे का उपयोग नहीं करना चाहिए । यह विधि खर्वण नामक लोकनाथ ने कही है ॥ ४८ ॥
अथ धौतम्— भूभुजङ्गशकृत्तोयैः प्रक्षाल्यापहृतं रजः । कृष्णवर्णं हि तत्प्रोक्तं धौताख्यं रसवादिभिः ॥ ४९ ॥
केञ्चुओं की विष्ठा को जल में घोल ( विलयन ) बना कर उस घोल में राख ( अर्थात् चपल बनाते समय जो नाग या वङ्ग का भाग राख में रह जाता है उसे ) को घुलाकर छानने से जो काले वर्ण का चूर्ण प्राप्त होता है उसको रसवादी धौत नाग और धौतवङ्ग कहते हैं । कुछ लोगों का यह अभिप्राय है कि केवल केञ्चुओं की विष्ठा को पानी में घोलकर छानने से जो कृष्ण वर्ण का चूर्ण प्राप्त होता है वह धौत कहा जाता है, परन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है ॥ ४९ ॥
२३४ : रसरत्नसमुच्चये—
अथ द्वन्द्धानम्— द्रव्ययोर्मर्दनाध्मानाद्द्वन्द्धानं परिकीर्तितम् ॥ ५० ॥ दो धातुओं को एक साथ मिलाकर फूंकने से या मर्दन करने से जो एकी करण किया जाता है उसको द्वन्द्धान् कहते हैं ॥ ५० ॥
अथ भजनी— भागाद्द्रव्याधिके क्षेपमनुवर्णंसुवर्णके द्रवैर्वा वह्निकाग्रासो भजनी वादिभिर्मता ॥ ५१ ॥ सुवर्ण आदि धातुओं को विद्रुत कर उनमें अन्य पदार्थों के मिलाने को अनुवर्ण या सुवर्णक कहते हैं और धातुओं को गर्म कर किसी द्रव पदार्थ ( स्वरस ) के द्वारा उनकी अग्नि हरण करने को भजनी कहते हैं ॥ ५१ ॥
अथ चुलका— पतङ्गीकल्कतो जाता लोहे तारे च हेमता । दिनानि कतिचित्स्थित्वा यात्यसौ चुलका मता ॥ ५२ ॥ लोह या चांदी में कुछ औषधियों के संसर्ग से जो सुवर्ण सदृश रङ्ग (हेमता) उत्पन्न हो जाता है उसको पतङ्गी कहते हैं और कुछ दिनों के पश्चात् वह हेमता नष्ट हो जाती है उस अवस्था को चुलका कहते हैं । कुछ लोगों का मत है कि पतङ्गी नामक औषधि के कल्क में तार या लोह को कुछ दिन रखने से उनमें एक तरह से सुवर्ण के समान वर्ण उत्पन्न हो जाता है इसको चुलका कहते हैं ॥ ५२ ॥
अथ पतङ्गीरागः— रञ्जिताद्धि चिराल्लोहाद्धमानाद्वा चिरकालतः । विनिर्यास स निर्दिष्टः पतङ्गीरागसंज्ञकः ॥ ५३ ॥ रञ्जित किये हुए लौह के कुछ दिन तक पड़े रहने से या उस को फूंक देने से जो सत्त्व निकलता है उसको पतङ्गीराग कहते हैं ॥ ५३ ॥
अथ आवापः— द्रुते द्रव्यान्तरक्षेपो लोहाद्ये क्रियते हि यः । स आवापः प्रतीवापस्तदेवाऽऽच्छादनं मतम् ॥ ५४ ॥ अग्नि में विद्रुत हुए लोह में जो अन्य द्रव्य का प्रक्षेप किया जाता है उसको आवाप, प्रतीवाप अथवा आच्छादन कहते हैं ॥ ५४ ॥
अष्टमोऽध्यायः ।
२३५
अथ अभिषेकः—
द्रुते वह्निस्थिते लोहे विरम्राष्टनिमेषकम् ।
सलिलस्य परिक्षेपः सोऽभिषेक इति स्मृतः ॥ ५५ ॥
वह्नि के संयोग से द्रुत हुए लोहादिक में आठ निमेष के पश्चात् जो जल का छिड़काव दिया जाता है या जल डाला जाता है उसको अभिषेक कहते हैं ॥ ५५ ॥
अथ निर्वापलक्षणम्—
तप्तस्याप्सु विनिक्षेपो निर्वापः स्नपनं च तत्॥ ५६॥
प्रतप्त लोह (सप्त या अष्ट धातु) को किसी औषधि के स्वरस में बुझाने को स्नपन या निर्वाप कहते हैं ॥ ५६ ॥
प्रतिवापसमयनिर्देशः—
प्रतीवापादिकं कार्यं द्रुते लोहे सुनिर्मले ॥ ५७ ॥
जब लोह अग्नि से द्रव होकर निर्मल हो जाय तभी उसका प्रतीवाप, स्नपन, और अभिषेक करना चाहिए ॥ ५७ ॥
अथ शुद्धावर्तः—
यदा हुताशो दीप्तार्चिः शुक्लोत्थानसमन्वितः ।
शुद्धावर्तस्तदा ज्ञेयः स कालः सत्त्वनिर्गमे ॥ ५८ ॥
जब अग्नि अच्छी तरह से प्रज्वलित हो जाय और उसमें से शुक्लता लिये हुए लालरंग की तीव्र लपटें निकलने लगें उस समय उसको शुद्धावर्त कहते हैं, धातुओं का सत्त्व इसी अवस्था में निकलता है, अर्थात् धातुओं के सत्त्व को उत्तम रीति से निकालने के लिये इतनी तेज आँच करनी आवश्यक है ॥ ५८ ॥
अथ बीजावर्तः—
द्राव्यद्रव्यनिभा ज्वाला दृश्यते धमने यदा ।
द्रावस्योन्मुखता सेयं बीजावर्तः स उच्यते ॥ ५९ ॥
किसी धातु का द्रावण करने के लिये उसको अग्नि में रख कर धौंकनी से धौंकते हैं, उस समय अग्नि में उस धातु के रंग के सदृश ज्वाला दिखाई देती है इसी समय में उस धातु का द्रव होना प्रारम्भ होता है इसको बीजावर्त कहते हैं ॥ ५९॥
अथ स्वाङ्गशीतलम्—
वह्निस्थमेव शीतं यत्तदुक्तं स्वाङ्गशीतलम् ॥ ६० ॥
२३६ रसत्नसमुच्चये—
किसी वस्तु को अग्नि पर पकाकर आंच देना बन्द कर देते हैं, जब वह वस्तु वायुमण्डल की शीतता से चूल्हे पर स्थित ही शीतल हो जाती है उसको स्वाङ्गशीतल कहते हैं ॥ ६० ॥
अथ वहिःशीतलम्— अग्नेराकृष्य शीतं यत्तद्वहिः शीतमुच्यते ॥ ६१ ॥ किसी वस्तु का अग्नि मे पाक कर फिर उसको अग्नि से नीचे रख कर शीतल करते हैं इसको बहिःशीत कहते हैं ॥ ६१ ॥
अथ स्वेदनलक्षणम्— क्षाराम्लैरौषधैर्वाऽपि दोलायन्त्रे स्थितस्य हि । पचनं स्वेदनाख्यं स्यान्मलशैथिल्यकारकम् ॥ ६२ ॥ क्षार (जवाखार, सुहागा, इत्यादि) तथा अम्ळवर्ग की औषधियों का स्वरस दोलायन्त्र में भर कर उस में पारद, लोह, शंख, शुक्ति इत्यादि पदार्थों को उनके साथ पाचन करते हैं, इसको स्वेदन संस्कार कहते हैं। स्वेदन संस्कार करने से उस धातु का कुछ मल भाग पृथक् हो जाता है ॥ ६२ ॥
अथ मर्दनलक्षणम्— उदितै रौषधैः सार्धं सर्वाम्लः काञ्जिकैरपि । पेषणं मर्दनाख्यं स्याद्वहिर्मलविनाशनम् ॥ ६३ ॥ भिन्न २ वस्तु के मर्दन के लिये कही हुई औषधियों के साथ या सर्वप्रकार के अम्ल पदार्थों के स्वरस द्वारा (जिसके लिये जिसका शास्त्र में निर्देश हो) अथवा काञ्जी के साथ पारद या अन्य पदार्थ का खरल में पेषण करते हैं। इसको मर्दन संस्कार भी कहते हैं, इस संस्कार से भी पारद या अन्य पदार्थों के बहिर्मल का विनाश होता है ॥ ६३ ॥
अथ मूर्च्छनलक्षणम्— मर्दनाऽऽदिष्टभैषज्यैर्नष्टपिष्टत्वकारकम् । तन्मूर्च्छनं हि वङ्गाहि-भुजङ्गकञ्चुकनाशनम् ॥ ६४ ॥ मर्दनसंस्कार में कही हुई औषधियों के चूर्ण, स्वरस या क्वाथ के साथ पारद को घोटकर उसकी कज्जली या पिण्ड अथवा सूक्ष्म चूर्ण कर लेते हैं इसको
अष्टमोऽध्यायः।
अष्टमोऽध्यायः। २३७
मूर्च्छन संस्कार कहते हैं । यह संस्कार पारद के नाग, वङ्ग आदि महादोषों (१) को नष्ट करता है । पारद के अतिरिक्त अन्य पदार्थों का भी मूर्च्छन संस्कार करने से गुणोत्कर्ष होता है ॥ ६४ ॥
अथोत्थापनादिलक्षणम्—
स्वेदातपादियोगेन स्वरूपापादनं हि यत् ।
तदुत्थापनमित्युक्तं मूर्च्छाव्यापत्तिनाशनम् ॥ ६५ ॥
मूर्च्छन संस्कार के कारण विरूपित हुए (नष्टपिष्ट हुए) पारद को फिर दोलायंत्र द्वारा स्वेदन करके या अग्नि और सूर्य के सन्ताप के द्वारा अपने पूर्व रूप में ले आते हैं, इसी को उत्थापन संस्कार कहते हैं । क्योंकि इस संस्कार से पारद पुनः स्वस्वरूप को ग्रहण कर लेता है ॥ ६५ ॥
बन्धलक्षणम्—
स्वरूपस्य विनाशेन पिष्टत्वादूध्वन्धनं हि तत् ।
विद्वद्भिर्निर्जितः सूतो नष्टपिष्टिः स उच्यते ॥ ६६ ॥
गन्धकादिक भिन्न २ पदार्थों के साथ पारद को घोटने से उसका श्वेत और चपलगुण नष्ट होकर चूर्ण या कज्जली बन जाती है और इस पेषण के कारण उसका बन्धन (मूर्तिबद्धरूप अथवा वह्निनाऽनुच्छिद्यमानत्व) हो जाता है । इस प्रकार से जीते हुए (स्वाधीन किये हुए) पारद का विद्वान् लोग नष्टपिष्टि कहते हैं ॥ ६६ ॥
अथ पातनलक्षणम् —
उक्तौषधैर्मर्दितपारदस्य यन्त्रास्थितस्योर्ध्वमधश्च तिर्यक् ।
निर्यातनं पातनसंज्ञमुक्तं वङ्गाहिसम्पर्कजकञ्चुकघ्नम् ॥ ६७ ॥
स्वेदन, मर्दनादिक संस्कार में बताई हुई तथा अन्य शास्त्रोक्त औषधियों के साथ पारद को खरल में घोट करके ऊर्ध्वपातन, अधः पातन और तिर्यक् पातन यन्त्रों में लेप कर के या चूर्ण रूप ही में रख कर क्रम से पारद को ऊपर, नीचे और तिर्यक् मार्ग से उड़ाते हैं, इस को पातन कहते हैं । इस पातन संस्कार से पारद के नाग और वङ्ग से उत्पन्न कंचुकादिक दोष नष्ट हो जाते हैं । वास्तव में खनिज पारद में नाग, वङ्ग हरताल आदि बहुत से पदार्थ मिले रहते हैं । उन
( १ ) नागो वङ्गो मलोवह्निश्वापल्यञ्च विषंगिरिः ।
असह्याग्निर्महादोषा निसर्गाः पारदे स्थिताः ॥
२३८ रसरत्नसमुच्चये—
पदार्थों से पारद को मुक्त करने के लिये शास्त्रकारों ने तीन प्रकार के पातनों का निर्देश किया है । पारद के अन्दर यह गुण है कि वह अग्नि लगते ही जिधर भी उसे मार्ग मिले उधर ही उड़ जाता है, किन्तु अन्य पदार्थ इस शक्ति से रहित हैं । जब पारद का ऊर्ध्वपातन करते हैं तब वह ऊपर उड़ जाता है किन्तु उसके साथ २ हरताल (आर्सेनिक) भी ऊपर उड़ता है इसलिये पारद का तिर्यक् पातन करते हैं । हरताल का तिर्यक् पातन नहीं होता है, इस तरह पारद हरताल से मुक्त हो जाता है। ऊर्ध्व पातन से अन्य नागादिक दोष नीचेही रह जाते हैं । इस वास्ते अशुद्ध पारद (हिङ्गुलोत्थ पारद से भिन्न) का तीनों प्रकार से पातन करना आवश्यक है ॥ ६७ ॥
अथ रोधनलक्षणम्—
जलसैन्धवयुक्तस्य रसस्य दिवसत्रयम् ।
स्थितिरास्थापनी कुम्भे याऽसौ रोधनमुच्यते ॥ ६८ ॥
मिट्टी के घड़े में पानी और सैन्धानमक भरकर पारद को किसी दृढ वस्त्र में बांधकर या ऐसे ही तीन दिन तक पड़ा रहने देते हैं । यह क्रिया स्वेदन मूर्च्छनादिक संस्कारों से षण्ढभावापन्न पारद के दोषों को नष्ट कर उत्कृष्टगुणों का उसमें आस्थापन (उत्पादन) करती है और इसको रोधनसंस्कार कहते हैं ॥ ६८ ॥
नियमनलक्षणम्—
रोधनाल्लब्धवीर्यस्य चपलत्वनिवृत्तये ।
क्रियते पारदे स्वेदः प्रोक्तं नियमनं हि तत् ॥ ६९ ॥
रोधन संस्कार से उत्कृष्ट शक्ति को प्राप्त हुए पारद के चपल दोष को नष्ट करने के लिये सर्पाक्षी इत्यादि नियामकगण(१) की औषधों के स्वरस में पारद का स्वेदन करते हैं, उसको नियमन संस्कार(२) कहते हैं ॥ ६९ ॥
( १ ) नियामकगण—
महाबला नागबला यमचित्रा पुनर्नवा ।
आखुकर्णी सहचरा वासिका काकमाचिका ॥ १ ॥
गोक्षुरः शरपुङ्खा च विष्णुक्रान्ता घनध्वनिः ।
मण्डूकपर्णी तुलसी बला च गिरिकर्णिका ॥ २ ॥
( २ ) यथा—
सर्पाक्षीचित्रिका कन्या भृङ्गारकनकाम्बुभिः ।
दिनं संस्वेदितः सूतो नियमात् स्थिरतां व्रजेत् ।
-अष्टमोऽध्यायः। २३९
— दीपनलक्षणम् — धातुपाषाणमूलाद्यैः संयुक्तो घटमध्यगः। ग्रासार्थं त्रिदिनं स्वेदो दीपनं तन्मतं बुधैः॥ ७० ॥ पारद का दोलायन्त्र के द्वारा धातु, उपधातु, पाषाण या अन्य दीपनद्रव्यों (औषध) के साथ स्वर्णादिक को ग्रास करने की शक्ति बढ़ाने के लिये तीन दिन तक स्वेदन किया जाता है, इसको विद्वान् दीपनसंस्कार कहते हैं ॥ ७० ॥
अथ ग्रासमानम्— इयन्मानस्य सूतस्य भोज्यद्रव्यात्मिका मितिः। इयतीत्युच्यते याऽसौ ग्रासमानं समीरितम् ॥ ७१ ॥ इतनी मात्रा में पारद इतनी मात्रा वाले स्वर्ण अभ्रक आदि पदार्थ को ग्रसित कर सकता है, इस प्रकार जो माननिर्देश किया जाता है उसको ग्रासमान कहते हैं ॥७१॥
अथ जरणाभेदनिर्देशः— ग्रासस्य चारणं गर्भे द्रावणं जारणं तथा। इति त्रिरूपा निर्दिष्टा जारणावरवार्तिकैः॥ ७२ ॥ ग्रासः पिण्डः परिणामस्तिस्रश्चाख्याः पराः पुनः॥ ७३ ॥ समुखा निर्मुखा चेति जारणा द्विविधा पुनः॥ ७४ ॥ पारद के अन्दर ग्रासयोग्य स्वर्ण आदि का विना अग्नि संयोग के मिलाने को चारण और अग्नि संयोग से ग्रास तथा योग्य पदार्थ को द्रव करके मिलाने को द्रावण तथा रस के अन्दर ग्रासयोग्य द्रवीभूत स्वर्णादिक को मिलाकर विड्यन्त्रादि योग से (किसी काष्ठ औषधि के साथ) पाक करने को जारण कहते हैं। इस तरह रस परिभाषा को बनाने वाले विद्वानों ने तीन प्रकार का जारणसंस्कार कहा है। इसी के अन्य नाम ग्रास (पारद अन्य वस्तु को कवलित कर ले), पिण्ड (पिण्ड स्वरूप का जारण) तथा परिणाम (अवस्थान्तरप्राप्तिरूपजारण) हैं फिर जारणा के संमुखजारणा और निर्मुखजारणा ये दो भेद होते हैं ॥ ७२-७४ ॥
शतावरी शङ्खपुष्पी श्वेतार्कः कनकाह्वयः। चक्रमर्दः करञ्जश्च ब्रह्मदण्डी शिखण्डिनी ॥ ३ ॥ गुडूची सैन्धवं पाठा मृगाक्षी सोमवल्लिका। नियामकगणो ह्येषः प्रोक्तो रसविशारदैः ॥ ४ ॥
२४० रसरत्नसमुच्चये—
निर्मुखजारणालक्षणम्—
निर्मुखा जारणा प्रोक्ता बीजाऽऽदानेन भागशः ॥ ७५ ॥
आगे कहे हुए मुख से रहित (अर्थात् पारद में चतुःषष्ठ्यंश भाग बीज न मिलाया जाय) भिन्न २ जारण में यथानिर्दिष्ट भाग से बीज का मिलाना या प्रक्षेप करना चाहिए, इसी को निर्मुखजारणा कहते हैं ॥ ७५ ॥
अथ बीजादिनिर्देशः—
शुद्धं स्वर्णं च रूप्यं च बीजमित्यभिधीयते ॥ ७६ ॥
शुद्ध स्वर्ण और शुद्ध रूपे को बीज कहते हैं ॥ ७६ ॥
मुखलक्षणम् —
चतुःषष्ठ्यंशतो बीजप्रक्षेपो मुखमुच्यते ॥ ७७ ॥
पारद के अन्दर शुद्ध स्वर्ण या शुद्ध रौप्य को पारद की अपेक्षा ६४ भाग की मात्रा में मिलाने को मुख कहते हैं ॥ ७७ ॥
सम्मुखजारणालक्षणम्—
एवं कृते रसो ग्रासलोलुपो मुखवान् भवेत् ।
कठिनान्यपि लोहानि क्षमो भवति भक्षितुम् ॥
इयं हि सम्मुखा प्रोक्ता जारणा मृगचारिणा ॥ ७८ ॥
इस तरह पारद के अन्दर ६४ वें भाग की मात्रा में बीज के मिला देने पर वह मुखवाला होकर अन्य लोह अभ्रक इत्यादि कठिन धातुओं को ग्रसित (भक्षण) करने के लिये समर्थ हो जाता है, इसी को मृगचारी नाम वाले किसी विद्वान् ने सम्मुखजारणा कही है ॥ ७८ ॥
अथ राक्षसवक्त्ररसलक्षणम्—
दिव्यौषधिसमायोगात्स्थितः प्रकटकोष्ठिषु ।
भुञ्जीताखिललोहाद्यं योऽसौ राक्षसवक्त्रवान् ॥ ७९ ॥
दिव्य औषधियों के साथ या मनःशिला के साथ मिलाकर खुले मुख वाली कोष्ठिका (यंत्र) में यदि पारा रखा जाय तो वह सम्पूर्ण लोहादि धातुओं को अपने अन्दर मिलाने में समर्थ हो जाता है, ऐसे पारद को राक्षसमुखी पारद कहते हैं अर्थात् जैसे राक्षस सबको खा जाता है उसी तरह पारद भी अत्यन्त बुभुक्षित हो जाता है ॥ ७९ ॥
अष्टमोऽध्यायः । २४१
अष्टमोऽध्यायः । २४१
चारणालक्षणम्— रसस्य जठरे ग्रासत्क्षपणं चारणा मता ॥ ८० ॥ पारद के अन्दर किसी ग्रास करने योग्य लोहादि धातु के मिलाने या रस के साथ उसको मिश्रित करने को चारणा कहते हैं ॥ ८० ॥
गर्भद्रुतिलक्षणम्— ग्रस्तस्य द्रावणं गभ गर्भद्रुतिरुदाहृता ॥८१ ॥ 'पारद के अन्दर ग्रसित हुआ लोहादिक पदार्थ अग्नि संयोग से द्रुत होकर उसमें मिल जाते हैं इस को गर्भद्रुति कहते हैं' ॥ ८१ ॥
बाह्यद्रुतिलक्षणम्— बहिरेवं द्रुतिं कृत्वा घनसत्त्वादिकं खलु । जारणाय रसेन्द्रस्य सा बाह्यद्रुतिरुच्यते ॥ ८२ ॥ अभ्रक का सत्त्व या अन्य लोहादिकों की भस्म को पृथक् द्रव कर के पारद के अन्दर जारण करने के लिये मिलाया जाता है, इस क्रियाको बाह्यद्रुति कहते हैं॥८२॥
द्रुतेर्भेदाः— निर्लेपत्वं द्रुतत्वं च तेजस्त्वं लघुता तथा । असंयोगश्च सूतेन पञ्चधा तिलक्षणम् ॥ ८३ ॥ १ द्रव पदार्थ के साथ अच्छी तरह मिल जाना या अन्य मलसंसर्ग से रहित होना, २ विशेष रूप से पतला हो जाना, ३ पूर्व स्वरूप की अपेक्षा उत्तम रूप हो जाना, ४ स्वाभाविक गुरुता से कुछ लघुता आजाना, ४ पारद के साथ पृथक होकर दिखाई देना, ये ५ द्रुति के लक्षण हैं ॥ ८३ ॥
द्रुतेः स्वरूपम्— औषधाध्मानयोगेन लोहधात्वादिकं तथा । सन्तिष्ठते द्रवाकारं सा द्रुतिः परिकीर्तिता ॥ ८४ ॥ द्रावक वर्ग की औषधियों के साथ सप्त या अष्ट प्रकार के लोह, रत्न, उपरत्न इत्यादि पदार्थ अग्नि में द्रव होकर किसी के साथ लिप्त न होते हुए उसी रूप में स्थित रहते हैं इसी को द्रुति कहते हैं ॥ ८४ ॥
अथ जारणाभेद-जारणालक्षणम्— द्रुतग्रासपरीणामो विडयन्त्रादियोगतः । रस० १६
२४२ | रसरत्नसमुच्चये—
जारणेत्युच्यते तस्याः प्रकाराः सन्ति कोटिशः ॥ ८५ ॥
आगे कहे जाने वाले विड्यंत्र मूषायन्त्र इत्यादि के द्वारा द्रुत हुए स्वर्णादिक प्रसित पदार्थ का पारे के साथ जो पाक किया जाता है उसको जारणा कहते हैं, इसके करोड़ों भेद हैं ॥ ८५ ॥
अथ विडादिलक्षणम्—
क्षारैरम्लैश्च गन्धाद्यैर्मूत्रैश्च पटुभिस्तथा ।
रसग्रासस्य जीर्णार्थं तद्विडं परिकीर्तितम् ॥ ८६ ॥
क्षार ( यवक्षारादिक ) अम्लपदार्थ ( काञ्जी ) गन्धक आदि धातु, गोमूत्र, और पांचो प्रकार के लवण इनके सहयोग से पारद में मिलि हुई स्वर्णादिक धातु का जारण करते हैं, इसको विडयन्त्र कहते हैं ॥ ८६ ॥
रञ्जनलक्षणम्—
सुसिद्धबीजधात्वादि-जारणेन रसस्य हि ।
पीतादिरागजननं रञ्जनं परिकीर्तितम् ॥ ८७ ॥
उत्तम प्रकार से सिद्ध किये हुए बीज ( स्वर्ण और रौप्य ) तथा धातुओं के साथ पारद का जारण करके उसमें जो पीत रक्त इत्यादि रंग उत्पन्न करते हैं इसको रञ्जन कहते हैं ॥ ८७ ॥
सारणालक्षणम्—
सूते सतैलयन्त्रस्थे स्वर्णादिक्षेपणं हि यत् ।
वेधाधिक्यकरं लोहे सारणा सा प्रकीर्तिता ॥ ८८ ॥
तैल से भरी हुई अन्धमूषा में पारद डाल कर उसमें स्वर्ण रौप्य आदि धातुओं को डाल कर उनमें वेध करते हैं अर्थात् अद्भुत गुणों का उद्भावन करते हैं इसी को सारणा कहते हैं ॥ ८८ ॥
वेधलक्षणं भेदाश्च—
व्यवायिभेषजोपेतो द्रव्ये क्षिप्तो रसः खलु ।
वेध इत्युच्यते तज्ज्ञैः स चानेकविधः स्मृतः ॥ ८९ ॥
लेपः क्षेपश्च कुन्तश्च धूमाख्यः शब्दसंज्ञकः ॥ ९० ॥
अफीम, भङ्गा, नागवल्ली, कुमारी, धस्तूर इत्यादि व्यवायशक्तिवर्धक पदार्थों के साथ पारद को स्वर्णादि के समान गुण उत्पन्न करने के लिये लोहादिक धातु
अष्टमोऽध्यायः। २४३
में डालते हैं इसको वेध कहते हैं, और यह वेध अनेक प्रकार का है। लेपवेध, क्षेपवेध,कुन्तवेध धूमवेध, शब्दवेध इस तरह से वेध पाँच प्रकार का होता है॥८९-९०॥
लेपवेधलक्षणम्—
लेपनं कुरुते लोहं स्वर्णं वा रजतं तथा ।
लेपवेधः स विज्ञेयः पुटमत्र च सौरकम् ॥ ९१ ॥
लोह आदि धातुओं पर वेधसामर्थ्य उत्पन्न करने वाली विशेष क्रिया से सिद्ध हुए पारद का लेप करके उस लोहादि धातु को स्वर्ण या रोप्य के रूप में परिवर्तित कर देते हैं इसी को लेपवेध कहते हैं। इस क्रिया में उस धातु पर पारद का लेप कर सौरक पुट ( सूर्य.पुट ) से उसे पकाते हैं ॥ ९१ ॥
क्षेपवेधलक्षणम्—
प्रक्षेपणं द्रते लोहे वेधः स्यात्क्षेपसंज्ञितः ॥ ९२ ॥
किसी रजत या ताम्र इत्यादि को द्रव कर के उस में पारद ( विशेषौषध मिश्रित ) को डालते हैं । इसको क्षेपवेध कहते हैं ॥ ९२ ॥
कुन्तवेधलक्षणम्—
सन्दंशधृतसूतेन द्रुतद्रव्याहतिश्च या ।
सुवर्णत्वादिकरणं कुन्तवेधः स उच्यते ॥ ९३ ॥
किसी धातु को अग्नि में द्रव करके उस द्रवित धातु में मूर्त्तिबद्ध पारद को संदशयंत्र से पकड़ कर डुबाते हैं इससे वह द्रुत धातु ( जिसमें पारद डुबाया जाता है ) सुवर्ण के समान रूप और गुणों को करने लायक हो जाती है इसी को कुन्तवेध कहते हैं ॥ ९३ ॥
धूमवेधलक्षणम्—
वह्नौ धूमायमानेऽन्तः प्रक्षिप्त रसधूमतः ।
स्वर्णाद्यापादनं लोहे धूमवेधः स उच्यते ॥ ९४ ॥
धूप से युक्त वह्नि की भट्टी पर एक कड़ाही रख देनी चाहिए, फिर इसमें पारद डाल देना चाहिए । जब कड़ाही के अन्दर रखे हुए पारद में धूआं निकलने लगे तब उस में अन्य भट्टी पर गले हुए लोह को डाल देते हैं इससे उस धातु में स्वर्ण के गुण धर्म उत्पन्न हो जाते हैं इसको धूमवेध कहते हैं ॥ ९४ ॥
२४४ | रसरत्नसमुच्चये—
शब्दवेधलक्षणम्—
मुखस्थितरसेनाल्पलोहस्य धमनात्खलु ।
स्वर्णरूप्यत्वजननं शब्दवेधः स कीर्त्तितः ॥ ९५ ॥
किसी लौह आदि धातु के कुछ भाग को अग्नि पर विद्रुत कर उसको मुख में रखे हुए पारद ( वेधसमर्थपारद गोली ) से एकनली के द्वारा फूंक के जोर से धमने से वह धातु स्वर्ण या रौप्य के रूप में परिवर्तित हो जाती है इसको शब्दवेध कहते हैं ॥ ९५ ॥
उद्घाटनलक्षणम्—
सिद्धद्रव्यस्य सूतेन कालुष्यादिनिवारणम् ।
प्रकाशनं च वर्णस्य तदुद्घाटनमीरितम् ॥ ९६ ॥
मृत किये हुए ( भस्म किये हुए ) लोहादिक द्रव्यों की कलुषता (मालिन्य) विशेष रूप से सिद्ध पारद के द्वारा दूर की जाती है और उस मृत लोहादिक के रङ्ग को भी पारद उत्कृष्ट करता है इस को उद्घाटन कहते हैं ॥ ९६ ॥
स्वेदनलक्षणम्—
क्षाराम्लैरौषधैः सार्द्धं भाण्डं रुद्ध्वाऽतियत्नतः ।
भूमौ निखन्यते यत्नात्स्वेदनं सम्प्रकीर्त्तितम् ॥ ९७ ॥
क्षार, अम्ल, ( काञ्जी ) तथा और भी अन्य औषधियों को भाण्ड में भरकर उसमें पारद या अन्य लोह इत्यादि धातु को रख करके भाण्ड का मुख सकोरे से ढक कर कपड़ मिट्टि करके बन्द करदेते हैं फिर उस भाण्ड को पृथ्विी में गाड़ देते हैं, इस को भी स्वेदन यन्त्र कहते हैं । क्योंकि भूमि की आन्तरिक उष्णता से स्वेदन की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है ॥ ९७ ॥
संन्यासलक्षणम् ।
रसस्यौषधयुक्तस्य भाण्डरुद्धस्य यत्नतः ।
मन्दाग्नियुतचुल्ल्यन्तः क्षेपः संन्यास उच्यते ॥ ९८ ॥
किसी भाण्ड में क्षार तथा अम्ल भरकर उसमें पारद रख देते हैं । फिर उस भाण्ड के मुख को कपड़मिट्टी से बन्द कर के मन्द २ आंच वाले चूल्हे के उपर रख देते हैं उसको सन्यास कहते हैं ॥ ९८ ॥