रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
.दशमोऽध्यायः। २६५
जो पारद आदि के दोषों को नष्ट करे उसको मूषा कहते हैं ॥ २ ॥
मूषाया उपादानम् ।
उपादानं भवेत्तस्या मृत्तिका लोहमेव च ॥ ३ ॥
मूषा का निर्माण लोह और मृत्तिका से होता है ॥ ३ ॥
अथ मूषाप्रशंसा—
मूषा मुखविनिष्क्रान्ता वरमेकापि काकिणी ।
दुर्जनप्रणिपातेन धिगलक्षमपि मानिनाम् ॥ ४ ॥
मूषा के मुख से निकाली हुई (भस्म होकर) एक कोड़ी भी उत्तम है किन्तु दुर्जन की बन्दना करने से प्राप्त हुए लक्ष रुपये भी मानियों के लिये हेय हैं ॥४॥
विमर्श—काकिणीशब्द की चर्चा भिन्न २ शास्त्रों में इस तरह है 'वराटकानां दशकद्वयं तत् साकाकिणी' इति लीलावती । 'पणगण्डकयोस्तुल्ये उदमानस्य काकिणी, इति रुद्रोक्तिः। काकिणी पणतुर्यांशे मानदण्डेऽपि दृश्यते। कृष्णलैकवराटयोः स्यादुन्मानल्यांशकेऽपिच ॥ इति मेदिनी ।
सन्धिलपस्य पर्यायाः—
मूषापिधानयोर्बन्धे बन्धनं सन्धिलपनम् ।
अन्ध्रणं रन्ध्रणं चैव संश्लिष्टं सन्धिवन्धनम् ॥ ५ ॥
मूषा और उसके आच्छादन करने के ढक्कन की सन्धियों को बन्द करने में 'बन्धन, सन्धिलपन, अन्ध्रण, रन्ध्रण, संश्लिष्ट और सन्धिवन्धन इतने शब्द प्रयुक्त होते हैं ॥ ५ ॥
अथ मूषोपयुक्तमृत्तिका
मृत्तिका पाण्डुरस्थूला शर्करा शोणपाण्डुरा ।
चिराध्मानसहा सा हि मूषार्थमतिशस्यते ॥
तदभावे च वाल्मीकी कौलाली वा समीर्यते ॥ ६ ॥
मूषा बनाने के लिये जो मिट्टी लेते हैं वह पीली और मोटी (ज्यादा महीन न हो) या लाल और पाण्डु वर्ण की तथा रेत जिसमें मिली हो और जो बहुत देर तक तेज आँच को फूंकने से भी फटे नहीं ऐसी होनी चाहिए । इस तरह की मृत्तिका मूषानिर्माण करने के लिये अत्यन्त श्रेष्ठ है। यदि उपर्युक्त लक्षणों वाली योग्य मिट्टी नहीं मिले तो उसके स्थान में दीमक अथवा कुम्हार के कार्य में आने वाली मिट्टी लेना चाहिए ॥ ६ ॥
२६६ रसरत्नसमुच्चये—
मतान्तरम्— या मृत्तिका दुग्धतुषैः शणेन शिखित्रकैर्वा हयलद्दिना च । लौहेन दण्डेन च कुट्टिता या साधारणा स्यात्खलु मूषिकार्थे ॥७॥ जलेहुए तुषों की राख ( भूसी की राख ), सनई, कोयले तथा घोड़े की लीद इन सब वस्तुओं को मिट्टी के बराबर लेकर उसमें मिला देवें, फिर एक लोहे के दण्डे से सबको खूब कूटकर बारीक कर लेना चाहिए। इस तरह की बनी हुई मृत्तिका मूषा बनाने के लिये साधारण तया ठीक होती है ॥ ७ ॥
मूषामृत्तिकायां संयोज्यद्रव्याणि— श्वेताश्मानस्तुषा दग्धाः शिखित्राः शणखर्परे । लद्धिः किट्टं कृष्णमृत्स्ना संयोज्या मूषिकामृदि ॥ ८ ॥ सफेद पत्थर, जले हुए तुष, कोयले, सनई ( शण ), खर्पर ( घटकपाल ) का चूर्ण, घोड़े की लीद, मण्डूर, कालीमिट्टी, इतनी वस्तुएं मूषा बनाने की मिट्टी, में मिलानी चाहिए ॥ ८ ॥
अथ वज्रमूषा— मृदस्त्रिभागाः शणलद्दिभागौ भागश्च निर्दग्धतुषोपलादेः । किट्टार्धभागं परिखण्ड्य वज्रमूषांविदध्यात्खलु सत्त्वपाते ॥ ९ ॥ मिट्टी के ३ भाग, सनई और लीद के दो भाग, जले हुए भूसे का १ भाग, श्वेत पत्थर का १ भाग, मण्डूर का आधाभाग, इन सब को अच्छी तरह कूट कर धातु वगैरहके सत्त्व पातन करनेके लिये मूषा तैयार करें। इसको वज्रमूषा कहते हैं॥९॥
अथ योगमूषा— दग्धाङ्गारतुषोपेताः मृत्स्ना वल्मीकमृत्तिका । तत्तद्बिडसमायुक्ता तत्तद्बिडविलेपिता ॥ १० ॥ तया या विहिता मूषा योगमूषेति कथ्यते । अनया साधितः सूतो जायते गुणवत्तरः ॥ ११ ॥ जले हुए तुष और कोयलों की राख, दीमक के घर की मिट्टी, पाण्डुरस्थूलादि गुणों वाली मिट्टी और बिड़ ( क्षार, अम्ल, गन्धक, लवण ). इन सब पदार्थों को एकत्रित कर ओखली में अच्छी प्रकार से कूट करके मूषा बना लेनी चाहिए। फिर इस मूषा को भीतर तथा बाहर से विड़ के घोल से लिप्त करके सुखा लेनी
दशमोऽध्यायः । २६७
चाहिए। इस प्रकार से बनाई हुई मूषा के अन्दर सिद्ध किया हुआ पारद अत्यन्त देहसिद्ध्यादि गुणों को करने लायक हो जाता है। इसको योगमूषा कहते हैं॥१०-११॥
अथ वज्रद्रावणीमूषा—
गारभूनागधौताभ्यां शणैर्दग्धतुषैरपि । समैः समा च मूषा मृन्महिषोदुग्धमर्दिता ॥ १२ ॥ क्रौञ्चिका यन्त्रमात्रं हि बहुधा परिकीर्त्तिता । तया विरचिता मूषा वज्रद्रावणिकोचिता ॥ १३ ॥
तालाव का चिकना गारा (मिट्टी), केन्चुओं का सत्त्व या उनकी मिट्टी, सनई, जले हुए तुषों की राख, इन सबको समान भाग लेकर तथा इनके बराबर मूषा बनाने की मिट्टी लेकर सबको एकत्रित करके भैंस के दुग्ध से घोट कर जिस यन्त्र में मूषा रखनी हो उस यन्त्र के अनुसार छोटी, बड़ी अनेक प्रकार की मूषा बनानी चाहिए। इस प्रकार की मूषा को वज्रद्रावणिका मूषा कहते हैं। यह मूषा हीरा आदि कठोर पदार्थों के द्रावण करने में उत्तम होती है ॥ १२-१३ ॥
अथ गारमूषा—
दुग्धषड्गुणगाराष्टकिट्टाङ्गारशणान्विता । कृष्णमृद्भिः कृता मूषा गारमूषेत्युदाहृता ॥ यामयुग्मपरिध्मानान्नासौ द्रवति वह्निना ॥ १४ ॥
जली हुई गार के ६ भाग तथा मण्डूर, कोयले, “सनई ९ ये प्रत्येक ८ भाग लेकर मूषोपयोगी काली मिट्टी में मिला कर के भैंस के दुग्ध में सबको खूब घोट कर मूषा बनानी चाहिए। इसको गारमूषा कहते हैं। यह गारमूषा दो प्रहर तक अग्नि में फूंकने से भी नहीं द्रुत होती है ॥ १४ ॥
अथ वरमूषा—
वज्राङ्गारतुषास्तुल्यास्तच्चतुर्गुणमृत्तिका । गारा च मृत्तिकातुल्या सर्वैरेतैर्विनिर्मिता ॥ वरमूषेति निर्दिष्टा याममग्निं सहेत सा ॥ १५ ॥
थूहर की लकड़ी के कोयले (या उनकी राख) और तुषों की राख ये दोनों समान भाग लेकर तथा इन दोनों से चौगुनी कालीमिट्टी तथा मिट्टी के बराबर
२६८ रसरत्नसमुच्चये—
गारा (तालाब मृत्तिका) इन सब के द्वारा बनाई हुई मूषा को वरमूषा कहते हैं। यह एक प्रहर तक अग्नि को सहन कर सकती है ॥ १५ ॥
अथ वर्णमूषा—
पाषाणरहिता रक्ता रक्तवर्गानुसाधिता ।
मृत्त्या साधिता मूषा क्षितिखेचरलेपिता ॥
वर्णमूषेति सा प्रोक्ता वर्णोत्कर्षे नियुज्यते ॥ १६ ॥
कंकड़ और पत्थर से रहित तथा रक्तवर्ग की औषधियों (कुसुम्भपुष्प, कत्था, लाक्षा, मजीठ इत्यादि) के स्वरस या क्वाथ से घोटी हुई लाल रंग की मृत्तिका से एक मूषा बना कर उसको इन्द्रगोप (वीरबहूटी) अथवा भूनागसत्त्व या काशीश के चूर्ण से लिप्त कर देनी चाहिए। इसको वर्णमूषा कहते हैं। इस मूषा के अन्दर पारद या अन्य लोहादिकों की भस्म करने से उस भस्म का उत्कृष्ट वर्ण हो जाता है ॥ १६ ॥
अथ रौप्यमूषा—
पाषाणरहिता श्वेता श्वेतवर्गानुसाधिता ।
मृत्त्या साधिता मूषा क्षितिखेचरलेपिता ॥
रौप्यमूषेति सा प्रोक्ता वर्णोत्कर्षे नियुज्यते ॥ १७ ॥
पाषाण से रहित और श्वेतवर्ग की औषधियों (तगर, कुड़े की छाल, चमेली, श्वेतगुञ्जा इत्यादि वर्गोक्त) के स्वरस या क्वाथ से घोटी हुई श्वेत मिट्टी की मूषा बना कर उसको क्षितिखेचर के चूर्ण से लिप्त कर देनी चाहिए। यह रौप्यमूषा है। इसके अन्दर चांदी आदि की सिद्ध की हुई भस्म अत्यन्त श्वेत होती है ॥ १७ ॥
अथ विड्मूषा—
तत्तद्भेदामृदोद्भूता तत्तद्विड्विलेपिता ।
देहलोहार्थयोगार्थं विड्मूषेत्युदाहृता ॥ १८ ॥
भिन्न २ प्रकार की मूषोपयोगी मृत्तिका से मूषा बनाकर उसको क्षार, अम्ल या गन्धक, लवण इत्यादि भिन्न २ प्रकार के विड़पदार्थों से लिप्त कर देना चाहिए। इस को विड़मूषा कहते हैं। इसका देह को लोह के समान दृढ करने वाले पारद या लोह आदि पदार्थों को सिद्ध करने के लिये उपयोग होता है ॥ १८ ॥
अथ वज्रद्रावणमूषा—
गारभूनागधौताभ्यां तुषमृष्टशणेन च ।
दशमोऽध्यायः।
दशमोऽध्यायः। २६९
समैः समा च मूषामृन्महिषीदुग्धमर्दिता ॥ १९ ॥
क्रोञ्चिका यन्त्रमात्रे हि बहुधा परिकीर्त्तिता ।
तया विरचिता मूषा लिप्ता मत्कुणशोणितैः ॥ २० ॥
बालाब्दध्वनिमूलैश्च वज्रद्रावणक्रौञ्चिका ।
सहतेऽग्निं चतुर्यामं द्रवेण व्याधिता सती ॥ २१ ॥
तालाब का चिकना गारा १ भाग, केंचुओं का सत्त्व १ भाग, तुषों (भूसे) की राख १ भाग, कूटा हुआ सन १ भाग तथा इन सबके बराबर मूषा के लायक काली या नीली मिट्टी लेकर सब को एकत्रित कूट कर भैंस के दुग्ध में घोटें। फिर जिस प्रकार की आकृति (स्वरूप) वाले यन्त्र में रखना हो उस स्वरूप की मूषा बनाकर उसको खट्मल (मत्कुण) के रक्त से लिप्त कर सुखा लेवें। फिर उस को नवीन (हरे) कांटेदार चौलाई की जड़ के स्वरस या काथ से अथवा सुगन्धवाला, नागरमोथा, अमरवेल (आकाशलता) के काढ़े से लिप्त कर सुखा लेनी चाहिए। फिर इसको द्रवपदार्थों से भरकर हीरा इत्यादि कठोर पदार्थों का इस में द्रव करते हैं। यह मूषा ४ प्रहर तक अग्नि को सहन कर सकती है। इस को वज्रद्रावणक्रौञ्चिकामूषा कहते हैं ॥ १९-२१ ॥
अथ मूषाऽऽप्यायनम्—
द्रवे द्रवीभावमुखे मूषाया ध्मानयोगतः ।
क्षणमुद्धरणं यत्तन्मूषाऽऽप्यायनमुच्यते ॥ २२ ॥
मूषायंत्र में रखे हुए द्रवण होने योग्य लोह, रत्न आदि पदार्थ अग्निके संयोग से फूंकने से जब द्रवित होने लगते हैं, उस समय उनको क्षण भर स्थायी करने के लिये चूल्हे पर से उतार लेते हैं। इस क्रिया को मूषाऽऽप्यायन कहते हैं ॥२२॥
अथ वृन्ताकमूषा—
वृन्ताकाकारमूषायां नालं द्वादशकाङ्गुलम् ।
धत्तूरपुष्पवच्चोर्ध्वं सुदृढं श्लिष्टपुष्पवत् ॥ २३ ॥
अष्टाङ्गुलञ्च सच्छिद्रं सा स्याद्वृन्ताकमूषिका ।
अनया खर्परादीनां मृदूनां सत्त्वमाहरेत् ॥ २४ ॥
बैगन (वृन्ताक या भण्टा) के समान आकार की मूषा बनाकर उसमें धत्तूरे के पुष्प के समान और दोनों प्रान्तभागों में छिद्रयुक्त ८ अङ्गुल की एक नलिका
२७० रसरत्नसमुच्चये—
जिस तरह पुष्प डण्ठल के साथ अच्छी तरह लगा रहता है उसी तरह अच्छी तरह से लगा देनी चाहिए। इसको वृन्ताकमूषा कहते हैं। इसके द्वारा कोमल खर्पर जैसे पदार्थों का सत्त्व निकाला जाता है ॥ २३-२४ ॥
अथ गोस्तनीमूषा— मूषा या गोस्तनाकारा शिखायुक्तपिधानका । सत्त्वानां द्रावणे शुद्धौ मूषा सा गोस्तनी भवेत् ॥ २५ ॥
जिस मूषा की आकृति (बनावट) गाय के स्तन के समान हो और उसका ढक्कन शिखा के समान नीचे से मोटा और ऊपर से पतला हो ऐसी मूषा को गोस्तनीमूषा कहते हैं। यह मूषा सत्त्वों के द्रवण करने और उनको शोधन करने के लिए उत्तम होती है ॥ २५ ॥
अथ मल्लमूषा— निर्दिष्टा मल्लमूषा या मल्लद्वितयसम्पुटात् । पर्पट्यादिरसादीनां स्वेदनाय प्रकीर्तिता ॥ २६ ॥
दो मिट्टी के सकोरों को परस्पर जोड कर कपड़मिट्टी से दोनों के मुख की सन्धि को बन्द कर देते हैं। इसको मल्लमूषा कहते हैं। यह मूषा पर्पटी तथा अन्य रसों के स्वेदन करने के लिये बनाई जाती है ॥ २६ ॥
अथ पक्वमूषा— कुलालभाण्डरूपा या दृढा च परिपाचिता । पक्वमूषेति सा प्रोक्ता पोट्टल्यादि विपाचने ॥ २७ ॥
कुम्हार के बनाये हुए भाण्ड (या उसके घट के लिये बनाये हुये भिन्न २ कपाल के) के समान आकृति की दृढ मूषा बना कर उसको अग्नि में पका लेनी चाहिए। इस को पक्वमूषा कहते हैं। यह मूषा हिरण्यगर्भ या रसगर्भ पोट्टली आदि के पकाने में काम आती है ॥ २७ ॥
अथ गोलमूषा— निर्वक्रगोलकाकारा पुटनद्रव्यगर्भिणी । गोलमूषेति सा प्रोक्ता सत्त्वरद्रवरोधिनी ॥ २८ ॥
मल्लमूषा के समान मूषा के दो गोल भाग पृथक् २ बनाकर उन में से एक में पुट देने योग्य पदार्थों को भर कर दोनों को परस्पर जोड़कर अच्छी तरह (मुख
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पर छिद्र न रह जाय) बन्द करके कपड़मिट्टी कर देनी चाहिए । इसको गोलमूषा कहते हैं । यह मूषा अग्नि में उड़ने लायक द्रव हुए पदार्थों को बाहर नहीं उड़ने देती है । अथवा द्रव्यों को शीघ्र ही निर्मल कर देती ॥ २८ ॥
अथ महामूषा—
तले या कूर्पराकारा क्रमादुपरि विस्तृता ।
स्थूलवृन्ताकवत्स्थूला महामूषेत्यसौ स्मृता ।
सा चायोऽभ्रकसत्त्वादेः पुटाय द्रावणाय च ॥ २९ ॥
जो मूषा तल भाग में कूर्परसन्धि ( एल्बो ज्वाइण्ट ) के समान पतली हो तथा क्रम से ऊपर को विस्तृत ( चौड़ी ) होती जाय और बैंगन के समान मोटी ( प्राय मध्य भाग में ) हो उसको महामूषा कहते हैं। यह मूषा लोह, अभ्रक, इत्यादि धातुओं के सत्त्व को पिघलाने तथा पुट देने के लिये उत्तम होती है ॥२९॥
अथ मण्डूकमूषा—
मण्डूकाकारमूषा या निम्नताऽऽयामविस्तरा ।
षडङ्गुलप्रमाणे मूषा मण्डूकसंज्ञिका ।
भूमौ निखन्य तां मूषां दद्यात्पुटमथोपरि ॥ ३० ॥
जो मूषा मेंढक के आकार के समान बीच में चौड़ी और दोनों भागों पर पतली हो तथा जिसकी लम्बाई और चौड़ाई ६ अंगुल हो ऐसी मूषा को मण्डूक मूषा कहते हैं। इस मूषा के अन्दर द्रव्य भर कर पृथ्वी में एक बिलस्त गहरी इसको गाड़ करके उसके ऊपर उपलों से पुट देवे ॥ ३० ॥
अथ मुसलाख्यमूषा—
मूषा या चिपिटा मूले वर्तुलाऽष्टाङ्गुलोच्छ्रया ।
मूषा सा मुसलाख्या स्याच्चक्रिवद्धरसे हिता ॥ ३१ ॥
जो मूषा तल भाग में चपटी तथा ऊपर की ओर गोल स्वरूपवाली तथा ८ अंगुल ऊंची हो उसको मूसलाख्यमूषा कहते हैं। यह मूषा आगे स्त्री रोगाधिकार में कथित चक्रिबद्व रस के बनाने में हितकर होती है ॥ ३१ ॥
अथ कोष्ठिकानिर्देशः—
सत्त्वानां पातनार्थाय पातितानां विशुद्धये ।
कोष्ठिका विविधाकारास्तासां लक्षणमुच्यते ॥ ३२ ॥
| २७२ | रसरत्नसमुच्चये— |
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लोह, अभ्रक, रत्न आदि अनेक पदार्थों के सत्त्वों को निकालने के लिये तथा निकले हुए सत्त्वों की शुद्धि करने के लिये अनेक स्वरूप की कोष्ठिकाएं शास्त्र में कही गई हैं, उनके लक्षण नीचे लिखे जाते हैं ॥ ३२ ॥
अथ अङ्गारकोष्ठी—
राजहस्तसमुत्सेधो तदर्द्धायामविस्तरा ।
चतुरस्रा च कुड्येन वेष्टिता मृण्मयेन च ॥ ३३ ॥
एकभित्तौ चरेद्द्वारं वितस्त्याभोगसंयुतम् ।
द्वारं सार्धवितस्त्या च सम्मितं सुदृढं शुभम् ॥ ३४ ॥
देहल्यधो विधातव्यं धमनाय यथोचितम् ।
प्रादेशप्रमिता भित्तिरुत्तरङ्गस्य चोर्ध्वतः ॥ ३५ ॥
द्वारं चोपरि कर्त्तव्यं प्रादेशप्रमितं खलु ।
ततश्चेष्टिकया रुद्ध्वा द्वारसंधिं विलिप्य च ॥ ३६ ॥
शिखित्रैस्तां समापूर्य्य धमेद्भस्त्राद्वयेन च ।
शिखित्रान् धमनद्रव्यमूर्ध्वद्वारेण निक्षिपेत् ॥ ३७ ॥
सत्त्वपातनगोलांश्च पञ्च पञ्च पुनः पुनः ।
भवेदङ्गारकोष्ठीयं खराणां सत्त्वपातिनी ॥ ३८ ॥
राजहस्त (साधारण मनुष्य के हस्त से सवाया हस्त राजहस्त मानना चाहिए, प्रायः साधारण मनुष्य का हस्त २४ अङ्गुल लम्बा होता है और राजहस्त तीस अङ्गुल लम्बा माना जाता है, राजहस्त ही को प्रायः गजहस्त कहते हैं) के समान ऊंची और उसकी आधी अर्थात् पन्द्रह अङ्गुल चौड़ो तथा चार मिट्टी की भित्तियों से युक्त एक चोकोर कोष्ठी बनाकर उसकी एक भित्ति में बीच के भाग से कुछ ऊपरी भाग में एक बालिस्त (बेंत) या डेढ बालिस्त चौड़ा द्वार बनावें, तथा देहली के नीचे धौंकनी के द्वारा फूंकने के लिये उचित द्वार बनावे, फिर उस कोष्ठी के ऊपरी भाग में प्रादेश (१) के समान मोटी भित्ति की छत बनाकर प्रादेश के समान चौड़ा एक द्वार छत में बनाकर ईंट से उसे ढककर सन्धिबन्धन कर देवे, फिर ऊपर के भाग में स्थित भित्ति के द्वार से कोयले तथा सत्त्वपातन
(१) अङ्गुष्ठ तथा तर्जनी अङ्गुली के मध्य के अवकाश को प्रादेश कहते हैं यथा—"अङ्गुष्ठस्य प्रदेशिन्या न्यासः प्रादेश उच्यते" ।