भारतकोश
रसार्णव (शैव रस-तन्त्र - प्राचीन भारतीय खनिज रसायन, धातुवाद एवं रस-चिकित्सा सटीक)

रसार्णव (शैव रस-तन्त्र - प्राचीन भारतीय खनिज रसायन, धातुवाद एवं रस-चिकित्सा सटीक)

Rasarnava: Tantric Chemistry and Alchemy with Commentary

शिव-पार्वती संवाद (सम्पादक: प्रफुल्लचन्द्र राय एवं हरीशचन्द्र कविराज) द्वारा

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१०६ रसार्णवे गोमांषे माहिषे मूत्रे¹ दध्यम्लतिलतैल्योः² । एकैकं त्रिदिनं पञ्चा न्निखिप्तेन भावयेत् ॥ ४८ ॥ दरदं पातनावन्त्रे³ पातयेत् सलिलाश्रये⁴ । सत्त्वं तु सूतसंकाशं⁵ जायते नात्र संशयः⁶ ॥ ४६ ॥ शबुकन्दरदो म्लेच्छो⁷ हिङ्गुलं चूर्णपारदम्⁸ । मञ्चिरामजमसैवं⁹ नाम चर्मारगन्धिकम्¹⁰ ॥ ५० ॥ तिक्तोष्णं हिङ्गुलं दिव्यं¹¹ रसगन्धकसम्भवम्¹² । लोहकुष्ठहरं दिव्य¹³-बलमेघाग्निदीपनम् ॥ ५१ ॥ (1) The portion commencing from this charaṇa and ending in घृताक्तकर्पटोपरि (48—70) is wanting in K. (2) दध्नं सतैलतैलयोः, a variant in M, which seems to be incorrect. (3) M has दरदः पात- येत् पात्रे, wherein the first term is gram. inc. [For पातनायन्त्र vide रस.स. Chap. IX. vs. 6—8.] (4) The term पातयेत् is wanting in B, which reads सलिलाश्रया. M reads सलिलाश्रयः. But as we see in रस.स., which nearly agrees with this śloka, the term जलाग्रये, we have adopted the above reading as correct one. [Vide Chap. III. v. 144.] (5) सत्व सूतकसङ्गाशं, a variant in M. [रस.स. reads तद्यत्त्व सूतसंकाशं. Chap. III. v. 144.] (6) रस.स. reads पातयेन्नात्र संशयः. [Chap. III. v. 144.] (7) M has an incorrect and incomplete reading—शबुकन्ददोम्लेन. (8) B reads पूर्वपारम. M reads पुर्वपारवम्. (9) मचिनान्करंदसैब, a variant in B. मञ्चिकाम्राकरं सैव, a variant in M. Both the readings seem to be inc. (10) B reads दावा. M reads नामा चर्मावरनिसिकम्. (11) M reads गुवं. (12) M reads संभवेत्, which is not correct. (13) B has लोहकुष्टहरं दिव्यं M has दोह्य, which has no sense.

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