रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 104, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ें६२ रसतस्रङ्गिणी
बनाना चाहिए। इसकी मूसली भी लोहे की बीस अंगुल लम्बी सुन्दर चिकनी होनी चाहिए। इस प्रकार के यन्त्र को विद्वान् लोग उलूखल (ऊखल) यन्त्र कहते हैं। सोनामाखी, रूपामाखी, लोहचूर्ण, ताम्रचूर्ण आदि कूटने के लिए इसे काम में लिया जाता है। इसके अतिरिक्त द्रव्य की मात्रा की अपेक्षा करके छोटे-बड़े अनेक अन्य यन्त्र भी बनाये जा सकते हैं। रस शास्त्र पढ़ने- वाले बालकों को जल्दी ही समझ में आनेवाले इन कुछ-कुछ यन्त्रों का यहाँ मार्ग दर्शन करा दिया है। अर्थात् शास्त्रों में और भी ढेकी आदि यंत्र पाये जाते हैं। उनको आवश्यकतानुसार शास्त्रविधि से बनाकर काम में लाना चाहिए ॥ ५८-६२ ॥
इष्टिकायन्त्र
जमीन में एक गोलाकार गर्त (गढ़ा) बनाकर उस पर एक मोटा शराव या प्याला रख दें, अब इसके ऊपर बीच में आवश्यकतानुसार दो अंगुल चौड़ा गहरा गढ़ा की हुई ईंट जमाकर ईंट के गर्त के चारों तरफ एक अंगुल ऊँची पालिक (थाँला, मेंड़) बना दें। पश्चात् ईंट के गढ़े में पारद भरकर गढ़े के मुँह पर एक दृढ़ वस्त्र बाँध दें, फिर इस वस्त्र के ऊपर गन्धक डालकर दूसरे शराव से ढक दें और शराव तथा पालि के बीच सन्धि को अच्छी तरह मिट्टी से बन्द कर दें। अब शराव के ऊपर जंगली उपलें रखकर कपोतपुट के रूप में अग्नि लगा दें। कपोतपुट में अग्नि तीव्र नहीं देनी चाहिए। क्योंकि तीव्र अग्नि से पारद- गन्धक उड़ जाने की सम्भावना रहती है। इसको इष्टिकायन्त्र कहते हैं। इसके द्वारा गन्धक का जारण किया जाता है। (र. र. स.)
जारणायन्त्र
बारह अंगुल प्रमाण लम्बी छः अंगुल चौड़ी लोहे की एक मूषा और पौने