रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थस्तरङ्गः ६३ मण्डूर, फाणित (सीरा) इन्हें एकत्र मिलाकर अच्छी तरह लेप कर दें और शुष्क कर लें । सूखने के बाद यन्त्र को चूल्हे पर चढ़ाकर जलाधार में जल भर दें । इसको 'पातनायन्त्र' कहते हैं । (र. र. स.) पातालयन्त्र का एक अन्य प्रकार चूल्हे पर एक मिट्टी की नाँद को औंधा रखें और नाँद के ऊपर लोहे या मिट्टी की एक परात रखें । बराबर परात और नाँद के बीच में एक छेद करें । अथवा चूल्हे पर औंधी परात रख इसके ऊपर दूसरी एक बड़ी परात रखें, फिर बराबर दोनों के बीच में छेद करें । अथवा एक ही परात रख उसमें छेदकर शीशी को लोहे की तार के आधार से सम्हाल कर रख लें ! छेद इतना बड़ा करें कि उसमें से शीशा का मुख नीचे चूल्हे में ४ अंगुल बाहर निकले, शीशी पर ५-७ कपड़मिट्टी करें । अब जिस औषधि का तेल निकालना हो उसे शीशी में भर शीशी के मुँह में लोहे के तारों की जाली डालकर मुख बन्द कर दें जिससे औषधि बाहर न गिर जाय और तेल बराबर झरता रहे । फिर इस शीशी को परात में रख दोनों की सन्धि को मिट्टी से बन्द कर दें और चूल्हे के भीतर शीशी के नीचे एक कांच का ग्लास रख दें जिसमें तेल गिरता रहे । शीशी और ग्लास दोनों एक नली के भीतर रहें । ऐसी लोहे के पत्र की नली बनाकर रखें जिससे तेल भाफ के साथ उड़ न जाय, किन्तु ग्लास में बराबर टपकता रहे । इस तरह करने के बाद ऊपर- वाली परात में अग्नि देते रहें जिससे तेल टपकता रहेगा । ऊपर अग्नि, जब तक तेल टपके, देते रहें । तेल निकलना बन्द होने पर अग्नि देना बन्द कर दें । चूल्हे पर नाँद रखकर यन्त्र तैयार करने से बाहर से तेल टपकता हुआ दिखाई दे सकता है । उष्मायन्त्र एक पात्र या हाँडी में जल काञ्जी भरें और पात्र के ऊपर एक लोह- शलाका रख दें । अब बादाम, पिस्ता अथवा अन्य तेल निकालने की औषधि को कूटकर पोटली बना बाँधकर एक डोरे से उक्त शलाका में लटका दें ।