रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमस्तरङ्गः ७१ जल भर दें। नीचे और जलाने पर जब डेगची का जल गरम हो जाय तो उसे निकालकर ठंडा जल भरते रहें कि जिससे औषधि का अर्क (भाफ बन कर) डेगची के पेंदे में लगकर भीतर के ग्लास में टपकता रहे। दो-तीन घण्टे अग्नि देने पर सब अर्क ग्लास में इकट्ठा हो जाता है। यन्त्र को खोलकर सावधानी से ग्लास के अर्क या द्रव को छानकर रख लें। इस तरह शंखद्राव आदि निकाले जाते हैं। इसे आकाशपातनयन्त्र कहते हैं। तप्त खरल यन्त्र तप्त खरलविधि के पारद का मर्दन करने के लिए एक लोहे की ६ अंगुल लम्बी, ६ अंगुल गहरी खरल बनानी चाहिए। इसकी मूसली आठ अंगुल लम्बी होनी चाहिए। इसमें पारद डालकर तप्तखरलविधि से मर्दन करना चाहिए। (र. र. स.) इति यंत्रविज्ञानीय नाम चतुर्थ तरङ्ग समाप्त हुआ। अथ पारदस्य अष्टसंस्कारविज्ञानीयः पञ्चमस्तरङ्गः । पारदस्य नामानि रसो रसेन्द्रः सूतश्च रसेशश्च रसेश्वरः । चपलो रसराजश्च पारदश्च शिवाह्वयः ॥१॥ रसनादभ्रकादीनां धातूनां कीर्तितो रसः। अभ्रकाद्यधिराजत्वाद्रसेन्द्र इति कथ्यते ॥२॥