रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ रसतरङ्गिणी देहलोहमयीं सिद्धिं सूतेऽतः सूत उच्यते । स्वभावाच्चपलो यस्मात् ततोऽसौ चपलः स्मृतः ॥३॥ आतङ्कपङ्कमग्नानां पारदानाच्च पारदः । अभ्रादिरसराजत्वाद्रासराजः स्मृतो बुधैः ॥४॥ अत्र पारदनामानि तन्त्रव्यवहारसाधनानि, शिवाह्वयो यावच्छिवनामभि- र्वाच्यः । नामनिरुक्तिः शिष्यबोधार्था । रसनात् भक्षणात्, अधिराजत्वात् प्रधानत्वात्, देहसिद्धिः नीरोगता, लोहसिद्धिः स्वर्णादिरूपा, चपलश्चञ्चलः, आतङ्क एव पङ्कः, तत्र मग्नानां पारदानात् पारद इति ॥ १-४ ॥ पारद के नाम भा.टी.—रस, रसेन्द्र, सूत, रसेश्वर, चपल, रसराज, पारद; ये सब पारे के नाम कहे जाते हैं । इसके अतिरिक्त शिव के जितने नाम हैं वे सभी पारे के नाम कहे जाते हैं । अभ्रक आदि महारसों तथा स्वर्णा आदि धातुओं का भक्षण करने के कारण पारद को रस शब्द से कहा जाता है । अभ्रक आदियों में सर्वोपरि होने के कारण इसे रसेन्द्र कहते हैं । शरीर में स्वास्थ्य उत्पादन करने तथा स्वर्णादि धातुओं को बनाने के कारण इसे सूत कहते हैं । यह स्वभावतः चंचल होता है, अतः इसे चपल भी कहते हैं । रोगरूपी कीचड़ में फँसे हुए प्राणियों का उद्धार करने से पारद और अभ्रक आदि उत्तम औषधियों में यह राजा के समान होने से इसे रसराज कहा जाता है ॥ १-४ ॥ विशुद्धाविशुद्धसूतस्य स्वरूपम् शुद्धः सूतो यतस्त्वन्तः सुनीलो बहिरुज्ज्वलः । सूर्य्यप्रभश्चाविशुद्धो धूम्रो वा परिपाण्डुरः ॥५॥ अविशुद्धसूतस्य हेयत्वम् सदोषो रसराजस्तु विदध्याद्विविधान् गदान् । तस्माद् दोषविहीनस्तु योगेषु विनियोजयेत् ॥६॥ तत्र शुद्धसूतस्वरूपम्—अन्तःसुनीलः मध्यावच्छेदेन नीलप्रभः । अविशुद्धस्तु परिपाण्डुरः ईषत्पीतवर्णः, स च त्याज्यः—"अन्तः सुनीलो बहिरुज्जवलो यो मध्याह्नसूर्यप्रतिमप्रकाशः । शस्तोऽथ धूम्रः परिपाण्डुरश्च चित्रो न योज्यो रस- कर्मसिद्धयै" इति प्राचीनसंवादात् ॥ ५-६ ॥