रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमस्तरङ्गः ७३
भा. टी.- धात्वन्तर संयोगरहित पारद बाहर से अत्यन्त स्वच्छ, चम- कीला, सूर्य के समान और भीतरी चमक में कुछ नीलप्रभ होता है । परन्तु अशुद्ध पारद धूम्रवर्ण या पाण्डुर ( कुछ पीतवर्ण ) का होता है ॥५॥ दोषयुक्त पारद सेवन करने से शरीर में अनेक प्रकार के रोगों को पैदा करता है । अतः दोषरहित पारद ही योगों में काम लाना चाहिए ॥६॥ अथ पारदस्य नैसर्गिका दोषाः नागवङ्गौ वह्निमलौ चापल्यं गरलं गिरिः । असह्याग्निश्च विज्ञेया दोषा नैसर्गिका रसे ॥७॥ नागाद् व्रणं भवेत्कुष्ठं वङ्गात्तापोऽग्निदोषतः । मलाज्जाड्यं तु चापल्याद् बोजनाशो विषान्मृतिः ॥८॥ गिरेः स्फोटोऽथ मोहश्च ह्यसह्याग्नेः प्रजायते । एतैर्दोषैर्विहीनञ्च रसेन्द्रमिह योजयेत् ॥ ६ ॥ पारददोषा नैसर्गिकाः, तापो देहसन्तापः जाड्यं चेष्टाहानिः । बीजनाशः शुक्रक्षयः, मोहो वैचित्यम् ॥ ७-६ ॥ आ.टी.-पारद में स्वभावतः नाग, वंग, वह्नि, मल, चापल्य, विष, गिरि, असह्याग्नि ये दोष उपस्थित रहते हैं । इनमें से नागदोष के कारण वह शरीर में व्रण, वंगदोष से कुष्ठ, अग्निदोष से तापवृद्धि, मलदोष से जड़ता, चाप- ल्यदोष से शुक्रक्षय, विषदोष से मृत्यु, गिरिदोप से शरीर में स्फोट और अस- ह्याग्नि से मोह विकारों को उत्पन्न करता है । अतः इन दोषों से रहित करके पारद को प्रयोग में लाना चाहिए ॥ ७-६ ॥ वक्तव्य—तन्त्रान्तर में पारदस्थित नाग और वंग दोष को यौगिक दोष माना है । "यौगिकौ नागवंगौ द्वौ-" परन्तु पारद में शीशा और राँगा स्व- भावतः खानों द्वारा पाया जाता है, अतः कई रसवैद्य इनको स्वाभाविक या नैसर्गिक दोष मानते हैं । व्यापार की दृष्टि से भी नाग और वंग को प्रायः पारद में मिलाया जाता है । इन धातुओं के मिलाने से पारद की उड़नशी- लता बहुत कम हो जाती है । अतएव तन्त्रान्तर में रससिन्दूरादि योगों के बनाते हुए पारद की शीघ्र उड़नशीलता को कम करने के लिये उसमें कुछ अंश शीशा का डालने को लिखा है—"भागो रसस्य त्रय एव भागा गन्धस्य माषः पवनाशनस्य ( नागस्य ) ।" इन बातों से पूर्वकालीन विज्ञान के साथ-